अमृता की कवितायेँ खुद में एक कहानी है ,एक एक लफ्ज़ अपनी बात इस तरह से कहता है जैसे ज़िन्दगी का एक सच मुकम्मल रूप से सच है ..और हर बार उनका लिखा कोई न कोई नया अर्थ दे जाता है ...आज इसी श्रृंखला में उनकी एक और कविता ..डेढ़ घंटे की मुलाकात ..जैसे ज़िन्दगी इसी लिखे में पूरी गुजर गयी हो ..और एक नया अर्थ दे गयी हो ....
डेढ़ घंटे की मुलाक़ात
जैसे बादल का एक टुकडा
आज सूरज के साथ टांका ,
उधेड़ हारी हूँ
पर कुछ नहीं बनता
और लगता है
कि सूरज के लाल कुरते में
यह बादल किसी ने बुन दिया है |
डेढ़ धंटे की मुलाक़ात
सामने उस चौक में
एक संतरी कि तरह खड़ी
और मेरी सोचों का गुजरना
उसने हाथ दे कर रोक दिया
खुदा जाने मैंने क्या कहा था
और जाने खुदा
तूने क्या सुन लिया |
डेढ़ घंटे की मुलाक़ात
सोचती हूँ
आदिवासी औरत की तरह
मैं एक चिलम सुलगा लूँ
और डेढ़ घंटे का तम्बाकू
इस आग में रख कर पी लूँ
इस से पहले
कि मेरी सोच घबरा जाए
और गलत मोड़ मुड जाए
इस से पहले
कि बादल को उतारते
यह सूरज टूट जाए
इस से पहले कि
मुलाक़ात की याद
एक नफरत में बदल जाए
डेढ़ धंटे का धुंआ
कुछ मैं पी लूँ
कुछ पवन पी ले
इस से पहले
कि इसका लफ्ज़
मेरी या तेरी जुबान पर आये
इससे पहले
कि मेरा या तेरा कान
इस जिक्र को सुने
और इस से पहले की मर्द
औरत जात की तौहीन बन जाए
और इस से पहले कि औरत
मर्द जात की ताक का का कारण बने
इस से पहले ......इस से पहले ........!!!!!!
Friday, November 6, 2009
डेढ़ घंटे की मुलाक़ात
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मोहब्बत जिस राह से गुजर कर आई है..अमृता प्रीतम
मोहब्बत जिस राह से गुजर कर आई है..अमृता प्रीतम
अमृता जी के बारे में जितना लिखा जाए मेरे ख्याल से उतना कम है , जैसा कि मैंने अपने पहले लेख में लिखा था कि मैंने इनके लिखे को जितनी बार पढ़ा है उतनी बार ही उसको नए अंदाज़ और नए तेवर में पाया है .।उनके बारे में जहाँ भी लिखा गया मैंने वह तलाश करके पढ़ा है ।एक बार किसी ने इमरोज़ से पूछा कि आप जानते थे कि अमृता जी साहिर से दिली लगाव रखती हैं और फ़िर साजिद पर भी स्नेह रखती है आपको यह कैसा लगता है ?
इस पर इमरोज़ जोर से हँसे और बोले कि एक बार अमृता ने..(Read Full..)
अमृता प्रीतम की कुछ कवितायें Poems by Amrita Pritam
अमृता प्रीतम की कुछ कवितायें Poems by Amrita Pritam
एक मुलाकात
मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी
सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था……फिर समुन्द्र को खुदा जाने
क्या ख्याल आया
उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी
मेरे हाथों में थमाई
और हंस कर कुछ दूर हो गया
हैरान थी….
पर उसका चमत्कार ले लिया
पता था कि इस प्रकार की घटना
कभी सदियों में होती है…..
लाखों ख्याल आये
माथे में झिलमिलाये (Read full..)




9 comments:
इस से पहले और इस से पहले
और Amrita Pritam ki dhadkanon ne ise jubaan de dee. adbhut
aur isase pahale... :) :)
arsh
डेढ़ घंटे की मुलाक़ात
सोचती हूँ
आदिवासी औरत की तरह
मैं एक चिलम सुलगा लूँ
और डेढ़ घंटे का तम्बाकू
इस आग में रख कर पी लूँ
उनका लिखा पढना स्तब्ध भी कर जाता है जैसे जादू कर दिया हो.
रामराम.
सोचती हूँ
आदिवासी औरत की तरह
मैं एक चिलम सुलगा लूँ
और डेढ़ घंटे का तम्बाकू
इस आग में रख कर पी लूँ
... क्या ख्वाहिश है... सुभानाल्लाह
और इस से पहले की मर्द
औरत जात की तौहीन बन जाए
और इस से पहले कि औरत
मर्द जात की ताक का का कारण बने
इस से पहले ......इस से पहले ........!!!!!!
इससे पहले संभल जाना चाहिए।
bahut hi gahan...........hamesha ki tarah........padhwane ka shukriya.
और डेढ़ घंटे का तम्बाकू
इस आग में रख कर पी लूँ
अमृता जी की लिखी हर पंक्ति अपने आपमें अनमोल है और आपके पास वह अनमोल खजाना है, जिन्हें आप हम सब के बीच बांटती है, इस रचना के लिये भी और आगामी अन्य रचनाओं के लिये भी आभार ।
डेढ़ घंटे की मुलाक़ात
जैसे बादल का एक टुकडा
आज सूरज के साथ टांका ,
उधेड़ हारी हूँ
पर कुछ नहीं बनता
और लगता है
कि सूरज के लाल कुरते में
यह बादल किसी ने बुन दिया है |
लाजवाब.....रंजू जी बहुत कुछ सिखने को मिला अमृता की इस नज़्म से .....चौथी पंक्ति को देखें क्या 'हारी' शब्द ही है ....??
इस से पहले
कि मेरी सोच घबरा जाए
और गलत मोड़ मुड जाए
इस से पहले
कि बादल को उतारते
यह सूरज टूट जाए
इस से पहले कि
मुलाक़ात की याद
एक नफरत में बदल जाए.....बहुत बढिया कविता ढूँढ कर लाई हो कभी- कभी मन कुछ भी पढने का नहीं करता ...और लग रहा है कुछ लिखूं ...भोपाल में आज हलकी बूंदा-बांदी है मौसम में ठंडक और माहौल में रूमानियत ....तुम कैसी हो बहुत दिनों बाद तुम्हे पढ़ रही हूँ ...आमीन
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