जो पेड़ों के पत्तों की तरह
चुपचाप उगते हैं और
झड़ जाते हैं !
मुँह कहीं नहीं दिखता है
तेरा मुँह, जो रात को
इक़रार देता है
तू यह नहीं जानती
किसी पर कोई अपनी
ज़िन्दगी क्यों निसार करता है
कोई दाँव पर लगाता है
नामुराद हँसता है
और हार जाता है
शहज़ाही ओ शहज़ादी!
इस तरह लाखों ख्याल
आयेंगे, चले जायेंगे
अमृता ने अपने जीवन के संदर्भ में लिखा हैः-
तेरा साँस चलता रहा
धरती गवाही देगी
धुआं निकलता रहा
मेरे इश्के की महक
कुछ तेरी सान्सों में
कुछ हवा में मिल गयी,
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
कायनात के कण होते हैं
मैं तुझे फिर मिलूँगी
अमृता के आज जन्मदिन पर विशेष यादें ...............इनको कितना भी दुहरा लो ...पर यह हमेशा कुछ नयी सी बात कहती लगती है