Thursday, October 9, 2008

इश्क की मेहंदी का कोई दावा नहीं ....

अमृता प्रीतम से एक साक्षात्कार में पढ़ा कि ----उनसे किसी ने पूछा उनकी नज्म "मेरा पता " के बारे में .... जब उन्होंने मेरा पता जैसी कविता लिखी तो उनके मन की अवस्था कितनी विशाल रही होगी ..
आदम को या उसकी संभावना को खोज ले तो यही पूर्ण मैं को खोजने वाली संभावना हो जाती है ....यथा ब्रह्मांडे तथा पिंडे को समझने वाला मनुष्य कहाँ खो गया है ,सारा सम्बन्ध उस से से है ...

आज मैंने अपने घर का पता मिटाया है ..
और हर गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है ....


इस में हर यात्रा मैं से शुरू होती है और मैं तक जाती है ..तंत्र के अनुसार यह यात्रा दोहरी होती है ,पहली" अहम से अहंकार तक 'और दूसरी "अहंकार से अहम तक "....आपके अहम की और जाने वाली अवस्था के रास्ते में आज कोई सज्जाद नही ,कोई साहिर नही कोई इमरोज़ नही ...


अमृता ने कहा कि आपने मेरी नज्म मेरा पता नज्म की एक सतर पढ़ी है -----यह एक शाप है .एक वरदान है ..इस में मैं कहना चाहती हूँ कि यह सज्जाद की दोस्ती है ,और साहिर इमरोज की मोहब्बत जिसने मेरे शाप को वरदान बना दिया आपके लफ्जों में शिव का प्रतीक है और शक्ति का ..जिस में से शिव अपना प्रतिबिम्ब देख कर ख़ुद को पहचानते हैं और मैंने ख़ुद को साहिर और इमरोज़ के इश्क से पहचाना है ..वह मेरे है मेरी शक्ति के प्रतीक ...


और यह पढ़ कर जाना कि के इश्क उनके मन की अवस्था में लीन हो चुका है .और यही लीनता उनको ऊँचा और ऊँचा उठा देती है ...

उनके इसी "मैं "से फ़िर हम मिलते हैं उनकी कविता मैं जो तेरी कुछ नही लगती ..यह मैं वही हैं जिसका हाथ अंधेरे के मेले में खोये एक बच्चे ने पकड़ लिया था ...यहाँ इस कविता में इस मैं से हम भरपूर मिलते हैं ...

हथेली पर ,
इश्क की मेहंदी का कोई दावा नहीं ....
हिज्र का एक रंग है
और तेरे ज़िक्र की एक खुशबु

मैं जो तेरी कुछ नही लगती ..................

यह आखिरी पंक्ति लिखना कोई आसान काम नही है मैं जो तेरी कुछ नही लगती यानी पंडित के दो बोल ही सब कुछ है और हर्फे वफ़ा कुछ भी नहीं ..हमारे समाज में यही कुछ तो होता आया है .अगर ऐसा न होता तो प्यार की कोई कहानी भी नही सुनाई देती ,जिसका अंत सिर्फ़ मिलन पर होता ..हिज्र के रंग को कोई नही देखता है .....मेहँदी का रंग सब देख लेते हैं ..कोई नही सोचता है की मेहँदी का रंग ही सही में विरह का रंग भी होता है ......मैं जो तेरी कुछ नही लगती ..यह पंक्ति एक बार नहीं बार बार सुनाई देती है पढने में आती है ..कभी हौले से कभी तेज स्वर में ...

आसमान जब भी रात का
और रौशनी का रिश्ता जोड़ते हैं
सितारे मुबारकबाद देते हैं ..
क्यों सोचती हूँ मैं
अगर कहीं ..
मैं ..जो तेरी कुछ नही लगती ...

यहाँ आसमान .रात और अँधेरा धूप के टुकडे से मैं तक चला आया है ..शादी का वातावरण है ..गीतों के शोर में यह आवाज़ कभी दूर से कभी पास से सुनाई देती है कि मैं तेरी कुछ नही लगती ....आसमान ने रात और रोशनी का गठबंधन कर लिया है .सितारे भी मुबारकबाद दे रहे हैं ..और मैं ??

फ़िर इसी मैं की झलक हम देखते हैं इस कविता में ..

उम्र की सिगरेट जल गई
मेरे इश्क की महक
कुछ तेरी साँसों में
कुछ हवा में मिल गई

ज़िन्दगी की आधी से अधिक सिगरेट जल चुकी है .सिर्फ़ आखिरी टुकडा बचा है

देखो यह आखिरी टुकडा है

उँगलियों में से छोड़ दो
कहीं मेरे इश्क की आंच
तुम्हारी उँगली को न छू ले

सिगरेट पीने वाला यदि न संभले तो यह आखिरी टुकडा जरुर उसकी उंगलियाँ जला देगा ..पर यह मैं क्या करे ...इसके पास तो सिर्फ़ यादों के टुकड़े बचे हैं और एक औरत को तो सपने देखने का हक भी नही हैं ..

जीवन बाला ने कल रात
सपने का एक निवाला तोडा
जाने यह ख़बर कैसे
आसमान के कानों तक जा पहुँची

अमृता की कविता निवाला में यह बात कितनी सुंदर कही गई है ...यहाँ आसमान समाज का प्रतीक है और इसके कान बहुत तेज है यह तो दिल की धड़कने और सपनों की आहट भी सुन लेता है और ..

बड़े पंखों ने यह ख़बर सुनी
लम्बी चोंच ने यह खबर सुनी
तेज जुबानों ने यह ख़बर सुनी
तीखे नाखूनों ने यह ख़बर सुनी ..

कि एक औरत ख्वाब देखने का गुनाह कर रही है और ख़ुद ख्वाब का निवाला किस हाल में है..

इस निवाले का बदन नंगा
खुशबु की ओढनी फटी हुई
मन की ओट नही मिली
तन की ओट नहीं मिली

और फ़िर नतीजा क्या हुआ ..

एक झपट्टे में निवाला छिन गया
दोनों हाथ जख्मी हो गए
गालों पर खराशे आ गई

और सपने देखने वाले का हाथ खाली हो गया ..फ़िर

मुहं में निवाले की जगह
निवाले की बातें रह गयीं
और आसमान की काली रातें
चीलों की तरह उड़ने लगीं ......

फ़िर से वही रात आ गई ..फर्क सिर्फ़ यही है कि यहाँ राते चीलों की तरह उड़ रही है ..बदन की महक भी उड़ रही है ..सूरज बनने को सब तैयार हैं ..पर रोशनी बनने को कोई तैयार नही ..क्यों कि चीलें सूरज नही बन सकती है .....

इस तरह अमृता का लेखन हमें अमृता के और करीब ले जाता है ..क्यों कि हम उस में ख़ुद को महसूस कर लेते हैं ..इस तरह हर इंसान के अन्दर कितने ही तरह के लेवल्स हैं ..अगर इनको एक कर लिया जाए तो वही सबसे खूबसूरत है ..क्यों कि वही मन का संन्यास है और वही है तपस्या ...और वही है मैं से मैं तक की यात्रा

22 comments:

makrand said...

मुहं में निवाले की जगह
निवाले की बातें रह गयीं
और आसमान की काली रातें
चीलों की तरह उड़ने लगीं ......

bahut sunder line
regards

mehek said...

आसमान जब भी रात का
और रौशनी का रिश्ता जोड़ते हैं
सितारे मुबारकबाद देते हैं ..
क्यों सोचती हूँ मैं
अगर कहीं ..
मैं ..जो तेरी कुछ नही लगती
bahut hi sundar

Arvind Mishra said...

अच्छा लिखा है !

शोभा said...

रंजना जी,
आप तो सच मैं अमृता जी की दीवानी हैं. आपके मध्यम से हम भी अमृता जी को काफी जान गए हैं. आभार.

सजीव सारथी said...

बहुत बढिया आपका यह ब्लॉग कमाल का है

ravindra vyas said...

अमृताजी के प्रति आपकी मोहब्बत का अंदाजा लगाया जा सकता है। वस्तुतः कई बार हम कविता की व्याख्या नहीं कर रहे होते हैं बल्कि अपने उस रचनाकार की भीतरी दुनिया में मोहब्बत के परदों से झांक रहे होते हैं। इस परदे में उसकी दुनिया हमें कई बार ज्यादा खूबसूरत नजर आती है।
आप उसी परदे से एक निराले अंदाज से झांक रही हैं। बधाई स्वीकार करें।

सुशील कुमार छौक्कर said...
This comment has been removed by the author.
सुशील कुमार छौक्कर said...

हर बार की तरह गहराई से सोचते हुए लिखी गई पोस्ट। कहने को बहुत कुछ है। पर वक्त की कमी की वजह ज्यादा ना कहते हुए बस .....। फिर कभी।

आसमान जब भी रात का
और रौशनी का रिश्ता जोड़ते हैं
सितारे मुबारकबाद देते हैं ..
क्यों सोचती हूँ मैं
अगर कहीं ..
मैं ..जो तेरी कुछ नही लगती

विश्व दीपक ’तन्हा’ said...

नि:शब्द हूँ मैं।

आप जब भी अमृता जी के बारे में कुछ लिखती हैं,तो कहने को कुछ बचना नहीं, बस एकटक निहार कर पढते रहने का दिल करता है।

बधाई स्वीकारें।

makrand said...

rajana ji
dashare ki subkamnaye
nice to read
two years back i personnaly meet imroj ji
during his indore visit
regards

मीत said...

हथेली पर ,
इश्क की मेहंदी का कोई दावा नहीं ....
हिज्र का एक रंग है
और तेरे ज़िक्र की एक खुशबु

मैं जो तेरी कुछ नही लगती ..................

अमृता जी को पढ़ना अक अलग ही अनुभव है. सबसे अलग, सब से जुदा. बहुत अच्छी लगी पोस्ट.

डॉ .अनुराग said...

देखो यह आखिरी टुकडा है
उँगलियों में से छोड़ दो
कहीं मेरे इश्क की आंच
तुम्हारी उँगली को न छू ले

बस निशब्द हूँ......

ज़ाकिर हुसैन said...

हथेली पर ,
इश्क की मेहंदी का कोई दावा नहीं ....
हिज्र का एक रंग है
और तेरे ज़िक्र की एक खुशबु

मैं जो तेरी कुछ नही लगती ..................

शानदार !!!!
अमृता जी की काव्य दुनिया में ले जाने के लिए आपका बेहद आभारी हूँ.

अशोक पाण्डेय said...

''एक झपट्टे में निवाला छिन गया
दोनों हाथ जख्मी हो गए
गालों पर खराशे आ गई

मुहं में निवाले की जगह
निवाले की बातें रह गयीं
और आसमान की काली रातें
चीलों की तरह उड़ने लगीं ......''

रंजू जी, बात कहने का इतना खूबसूरत अंदाज कम ही देखने को मिलता है। अमृता जी की कुछ रचनाएं सरसरी तौर पर पहले जरूर पढ़ी थीं, लेकिन उन्‍हें इतना करीब से अनुभव करने का अहसास आपके जरिए ही हो रहा है। आपके हर आलेख के साथ यह अहसास गहरा होता जा रहा है। आभार।

रंजना said...

अमृता प्रीतम पर लिखा आपका लेख पहली बार ही पढ़ा,पर समझ आ गया कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में कितने गहरे डूबकर आपने सब कुछ देखा गुना है.
अधिक क्या कहूँ,बस अद्भुत.........

जितेन्द़ भगत said...

आपने क्‍या मोहक व्‍याख्‍या की है इन पंक्‍ति‍यों की-
हिज्र का एक रंग है
और तेरे ज़िक्र की एक खुशबु

मैं जो तेरी कुछ नही लगती ..................

बाकी, आपके लेखन में अमृता जी के जि‍क्र से ही जादुई आभा फैल जाती है।

Nitish Raj said...

बहुत ही अच्छे तरीके से समझाया है आपने मैं से मैं तक को।

फ़िरदौस ख़ान said...

हथेली पर ,
इश्क की मेहंदी का कोई दावा नहीं ....
हिज्र का एक रंग है
और तेरे ज़िक्र की एक खुशबु

मैं जो तेरी कुछ नही लगती ..................

बहुत अच्छी पोस्ट है...अपने ब्लॉग में आपके ब्लॉग का लिंक दे रही हूं...

अभिषेक ओझा said...

ये लेख एक दूसरी दुनिया में ले जाकर छोड़ देते हैं जहाँ से निकल कर निशब्द हो जाना स्वाभाविक ही है.

Manish Kumar said...

सुंदर विश्लेषण...

Nitin said...

वाह वाह आज इस ब्लॉग को पड़ के प्यार के मायने समझ में आने लेगे हैं. जारी रखे रंजनाजी.

शिवराज गूजर. said...

amritaji ke baare main likh kar aapne jo nek kaam kiya hai uske liye bahut bahut badhai. mere blog per bhi visit kijiye kabhi.
shivraj