Sunday, December 7, 2008

अमृता प्रीतम की कहानी - "शाह की कंजरी" अंतिम भाग

पहला भाग

दूसरा भाग

कमरे के एक कोने में शाह भी था। दोस्त भी थे, कुछ रिश्तेदार मर्द भी। उस नाजनीन ने उस कोने की तरफ देख कर भी एक बार सलाम किया, और फिर परे गाव-तकिये के सहारे ठुमककर बैठ गयी। बैठते वक्त कांच की चूड़िया फिर छनकी थीं, शाहनी ने एक बार फिर उसकी बाहों को देखा, हरे कांच की और फिर स्वभाविक ही अपनी बांह में पड़े उए सोने के चूड़े को देखने लगी....

कमरे में एक चकाचौध सी छा गयी थी।  हरएक की आंखें जैसे एक ही तरफ उलट गयीं थीं, शाहनी की अपनी आंखें भी, पर उसे अपनी आंखों को छोड़ कर सबकी आंखों पर एक गुस्सा-सा आ गया...

वह फिर एक बार कहना चाहती थी - अरी बदशुगनी क्यों करती हो? सेहरे गाओ ना ...पर उसकी आवाज गले में घुटती सी  गयी थी। शायद ओरों की आवाज भी गले में घुट सी गयी थी। कमरे में एक खामोशी छा गयी थी। वह अधबीच रखी हुई ढोलक की तरफ देखने लगी, और उसका जी किया कि वह बड़ी जोर से ढोलक बजाये.....

खामोशी उसने ही तोड़ी जिसके लिये खामोशी छायी थी। कहने लगी, " मैं तो सबसे पहले घोड़ी गाऊंगी, लड़के का ’सगन’ करुंगी, क्यों शाहनी?" और शाहनी की तरफ ताकती, हंसती हुई घोड़ी गाने लगी, "निक्की निक्की बुंदी निकिया मींह वे वरे, तेरी मां वे सुहागिन तेरे सगन करे...."

शाहनी को अचानक तस्सली सी हुई - शायद इसलिये कि गीत के बीच की मां वही थी, और उसका मर्द भी सिर्फ उसका मर्द था - तभी तो मां सुहागिन थी....

शाहनी हंसते से मुंह से उसके बिल्कुल सामने बैठ गयी -जो उस वक्त उसके बेटे के सगन कर रही थी...

घोड़ी खत्म हुई तो कमरे की बोलचाल फिर से लौट आयी। फिर कुछ स्वाभाविक सा हो गया। औरतों की तरफ से फरमाईश की गयी - "डोलकी रोड़ेवाला गीत।" मर्दों की तरफ से फरमाइश की गयी "मिरजे़ दियां सद्दां।"

गाने वाली ने मर्दों की फरमाईश सुनी अनसुनी कर दी, और ढोलकी को अपनी तरफ खींच कर उसने ढोलकी से अपना घुटना जोड़ लिया। शाहनी कुछ रौ में आ गयी - शायद इस लिये कि गाने वाली मर्दों की फरमाईश पूरी करने के बजाये औरतों की फरमाईश पूरी करने लगी थी....

मेहमान औरतों में से शायद कुछ एक को पता नहीं था। वह एक दूसरे से कुछ पूछ रहीं थीं, और कई उनके कान के पास कह रहीं थीं - "यही है शाह की कंजरी....."

कहनेवालियों ने शायद बहुत धीरे से कहा था  - खुसरफुसर सा, पर शाहनी के कान में आवाज़ पड़ रही  थी, कानों से टकरा रही थी - शाह की कंजरी.....शाह की कंजरी.....और शाहनी के मूंह का रंग फीका पड़ गया।

इतने में ढोलक की आवाज ऊंची हो गयी और साथ ही गाने वाली की आवाज़, "सुहे वे चीरे वालिया मैं कहनी हां...." और शाहनी का कलेजा थम सा गया -- वह सुहे चीरे वाला मेरा ही बेटा है, सुख से आज घोड़ी पर चढ़नेवाला मेरा बेटा.....

फरमाइश का अंत नहीं था। एक गीत खत्म होता, दूसरा गीत शुरू हो जाता। गाने वाली कभी औरतों की तरफ की फरमाईश पूरी करती, कभी मर्दों की। बीच बीच में कह देती, "कोई और भी गाओ ना, मुझे सांस दिला दो।" पर किसकी हिम्मत थी, उसके सामने होने की, उसकी टल्ली सी आवाज़ .....वह भी शायद कहने को कह रही थी, वैसे एक के पीछे झट दूसरा गीत छेड़ देती थी।

गीतों की बात और थी पर जब उसने मिरजे की हेक लगायी, "उठ नी साहिबा सुत्तिये! उठ के दे दीदार..." हवा का कलेजा हिल गया। कमरे में बैठे मर्द बुत बन गये थे। शाहनी को फिर घबराहट सी हुई, उसने बड़े गौर से शाह के मुख की तरफ देखा। शाह भी और बुतों सरीखा बुत बना हुआ था, पर शाहनी को लगा वह पत्थर का हो गया था....

शाहनी के कलेजे में हौल सा हुआ, और उसे लगा अगर यह घड़ी छिन गयी तो वह आप भी हमेशा के लिये बुत बन जायेगी..... वह करे, कुछ करे, कुछ भी करे, पर मिट्टी का बुत ना बने.....

काफी शाम हो गयी, महफिल खत्म होने वाली थी.....

शाहनी का कहना था, आज वह उसी तरह बताशे बांटेगी, जिस तरह लोग उस दिन बांटते हैं जिस दिन गीत बैठाये जाते हैं।  पर जब गाना खत्म हुआ तो कमरे में चाय और कई तरह की मिठायी आ गयी.....

और शाहनी ने मुट्ठी में लपेटा हुआ सौ का नोट निकाल कर, अपने बेटे के सिर पर से वारा, और फिर उसे पकड़ा दिया, जिसे लोग शाह की कंजरी कहते थे।

"रहेने दे, शाहनी!  आगे भी तेरा ही खाती हूं।" उसने जवाब दिया और हंस पड़ी। उसकी हंसी उसके रूप की तरह झिलमिल कर रही थी।

शाहनी के मुंह का रंग हल्का पड़ गया।  उसे लगा, जैसे शाह की कंजरी ने आज भरी सभा में शाह से अपना संबंध जोड़ कर उसकी हतक कर दी थी। पर शाहनी  ने अपना आप थाम लिया। एक जेरासा किया कि आज उसने हार नहीं खानी थी। वह जोर से हंस पड़ी। नोट पकड़ाती हुई कहने लगी, "शाह से तो तूने नित लेना है, पर मेरे हाथ से तूने फिर कब लेना है? चल आज ले ले......."

और शाह की कंजरी नोट पकड़ती हुई, एक ही बार में हीनी सी हो गयी.....

कमरे में शाहनी की साड़ी का सगुनवाल गुलाबी रंग फैल गया.......

8 comments:

Udan Tashtari said...

आभार इस कथा को प्रस्तुत करने का.

ताऊ रामपुरिया said...

तीन भागों में -अमृता प्रीतम की कहानी - "शाह की कंजरी" का आज अंतिम भाग पढ़वाने के लिए आपका आभार ! कहानी पर क्या कमेन्ट करे ? ये तो कालजयी रचनाए हैं ! बस जैसे बहता पानी है ! इनको पढ़ते पढ़ते पाठक भी उस काल खंड में बहने लगता है !

रामराम !

Red Soul said...

wow. thx for sharing! It is a very touching story. Both the ladies presented so well, reading about them makes us feel as if we've known them forever.

सुशील कुमार छौक्कर said...

आपका बहुत शुक्रिया। आखिरकार मेरा इंतजार खत्म हुआ और मैंने तीसरा भाग भी पढा। अपनी किताबों में ढूढा था वो कहानी नही मिली। तब इंतजार के अलावा कोई चारा नही था। कहानी के किरदार की कशमकश जिदंगी की कशमकश को दिखाती है इसलिए कहानी दिल को छू जाती है यह कहानी।

विनीता यशस्वी said...

amrita pritam ji ki kahaniya padhwane ke liye abhar.

bahut achha laga apka blog dekhkar.

डॉ .अनुराग said...

आभार इस कथा को प्रस्तुत करने का.

shruti said...

बहुत दिनों बाद ट्रेन के सफर में वक्त मिला...हफ्ताभर भी नहीं हुआ नागमणी का अस्वादन किए..आज एक साथ शाह की कंजरी के तीनों भाग पढ़ लिए। आपका बहुत-बहुत आभार...अमृताजी की हर रचना कालजयी है। इन्हें बार-बार पढ़ने का मन करता है।

Jimmy said...

suriyaa tesra bag likne ki liye


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