Monday, February 2, 2009

तू जब गीत पढ़ती है....

तू जब गीत पढ़ती है
दिल का सूरज इस तरह दिखता
जैसे भरी दोपहर को
गीतों की आवाज़ इस तरह लगती
जैसे गंगा की लहर
जैसे बैजू का नगमा
पीड़ा अपनी बाहों में लेती है
तेरे हुनर का इक तारा बजता है
और तेरी मोहब्बत गाती है
तेरी दो आँखे इस तरह
जैसे ख्यालों के दो चश्मे
और चाँद के रेशम जैसी
दो देशों के गीत जोड़ दे
लोक पीड़ा की भट्ठी में
तेरा हर लफ्ज़ पक गया


अमृता की हर पंक्ति यही कहती लगती है ..यह कविता मिरवारद खानम दिलबाजी की लिखी हुई हैं ......यह पत्र अमृता ने सोवियत देश के अजरबाईजान की राजधानी बाकू से लिखा है .....उन्होंने हर जगह यहाँ लेखकों की याद में बने प्रतीक चिन्ह देखे पर यह बाकू एक ऐसा शहर देखा जहाँ एक शायरा का बुत बना हुआ था ..यह शायरा नातवां उन्न्सवी सदी की अपने लोगो में बहुत प्रसिद्ध शायरा थी .......इसी बाकू शहर में एक अजरबाई जानी औरत का बुत बनाया गया है.... जिस में वह अपने चेहरे से नकाब पर्दा उतारती दिखायी गई है ..यह इन्कलाब के बाद की औरत के मन का चिन्ह है कि वह कैसे जिन्दगी के सभी सृजनात्मक पहलू में अपनी मेहनत और अपने श्रम का हिस्सा डालने को तैयार है......


अमृता ने अपने इस ख़त को बाकू से लिखा है ...जब वह यहाँ से चालीस किलोमीटर दूर लोहे के रबर और मजदूरों के बस्ती देखने गई थी ,उस दिन इतवार था मर्द औरते और बच्चे छुट्टी मना रहे थे .....यह बस्ती समुंदर के किनारे हैं .....बस्ती क्या पूरा शहर है .....नई ऊँची इमारते ,उनके रहने के घर ,स्कूल ,क्लब ,थिएटर , सिनेमा घर और दुकाने शहर के चारो और एक छोटी सी रेलवे लाइन हैं .....जिस पर एक छोटे से इंजन वाली गाड़ी एक बड़े से खूबसूरत डिब्बे के साथ चलती है ......यह गाड़ी बच्चे ही चलते हैं और इस से बच्चे ही सैर करते हैं .....यह रेलवे विभाग की और से मजदूर बच्चो को तोहफा है...

औरतो का पुराना पहरावा एक फ्राक नुमा लम्बी और खुली कमीज और सर्दियों में ऊनी और गर्मियों में रेशमी और सूती चाद्दर है .....आज का पहरावा फ्राक या स्कर्ट और सीर पर रेशमी रुमाल है .......मर्द और औरतों ने अक्सर दो तीन दांतों में सोने का पतरा चढ़वाया हुआ है .......जैसा पहले पंजाब में में एक या दो दांतों पर सोने चढ़वाने का रिवाज होता था .....इस तरह से लोग सोचते थे कि मरते दम तक सोना जिस्म के साथ रहेगा .....इसको मरने के बाद कोई नही उतार सकेगा इस लिए यह अगली दुनिया में भी साथ जाता है ...यहाँ भी शायद इसी धारणा के तहत यह रिवाज चला हो ..पर अब यह रिवाज कम हो गया है .जवान लड़के -लडकियां अब सोना नही चढ़वाते हैं ....
बाजू पर अपन नाम और कोई तस्वीर खुदाने का भी रिवाज है यहाँ
आज यहाँ मर्द और औरत समुन्दर के किनारे रेत पर लेटे हैं ...वह थोडी थोडी देर में जा जा कर समुन्द्र में डुबकी लगा आते हैं और फ़िर आ कर रेतपर लेट जाते हैं ... अपना इतवार मना रहे हैं ..मुझे देखते ही बहुत सी औरतों ने कहा हिन्दुस्तानी शायरा .पिछली रात मैंने टेलीविजन पर अपनी दो नज्में पढ़ी थी ,इस लिए इन्होने मुझे पहचान लिया है

श्रामिक जीवन की यह खुशहाली सचमुच यहाँ की व्यवस्था की बहुत बड़ी कामयाबी है ..हर मजदूर की औसत तनख्वाह सतासी रूबल है . ...हिन्दुस्तानी रुपये के हिसाब से करीब साढे चार सौ रूपए ..... रिहायश , डाक्टरी मदद और स्कूल ,कालेज पढ़ाई के खर्चे का सवाल ही नहीं ...इस तनख्वाह से लोगों ने सिर्फ़ खाने पहनावे का खर्च चलाना होता है बेकारी की फ़िक्र से यह लोग पूरी तरह से स्वंतंत्र है
बच्चे रंग बिरंगे कपड़े पहने साईकल चला रहे हैं ... रंग बिरंगी छतरी ले कर आइस क्रीम खा रहे हैं ... कितनी बार मुझे भुलावा हुआ कि अभी तुम भागे भागे हाथो में आईस क्रीम ले कर कहीं से आ जाओगे ......कुछ मजदूर माताएं मेरे पास आ कर कहती है कि हमारे बच्चे आपसे हाथ मिलाना चाहते हैं और हिन्दुस्तान के मजदूर बच्चो को सलाम भेजते हैं
मेरी आँखे इस प्यार से छलक आई और मैं छोटे छोटे बच्चो को दुलारती अपने देश के मजदूर बच्चो के भविष्य के लिए दुआंए मांगती रही .....

बाकू
अजरबाईजान
१४ मई १९६१


इस पत्र में जो उस वक्त की तस्वीर दिखी , उस से अब सोवितय रूस दूर हो चुका है .....भारत के मजदूरो का जीवन इस से कितना अलग है ..रहने को ठीक से घर नही ..खाना नही ..बच्चो की शिक्षा की बात तो दूर हैं ...यह पहले लिखे ख़त आसानी से पहले और अब के माहौल का अन्तर बता देते हैं ...वक्त आगे चला गया है पर हम कहीं बहुत पीछे रह गए हैं कई मामलों में ..सोने के दांत ..अब एक सपना है ....असलियत है एक रोटी वो भी अब कड़ी मेहनत के बाद नसीब नही होती ....आओ दुआ करे कि सब शुभ हो .........आने वाला वक्त कुछ शिक्षा की रौशनी ले कर आए ..और २८० रुपये के लिए एक आठ साल की बच्ची को वहशी तरह से पीटा न जाए .उस के भविष्य के लिए कुछ सोचा जाए ....

11 comments:

PN Subramanian said...

सोविएत संघ का वो जमाना कुछ और था. अमृता प्रीतम पर समाजवादी बल्कि साम्यवादी विचारधारा हावी रही है. पूरा एक चक्र चल चुका है. अब खुले बाज़ार की नीतियां हावी हैं. दुःख की बात यह है की पुनः उन सब सोविएत गणराज्यों में जो अब स्वंत्र देश बन गए हैं, वही रूढिवादी परम्पराएँ वापस आ रही हैं. अजरबैजान हो या तुर्कमेनिस्तान बुरका वापस आ गया. समझ में नहीं आता कि सब क्या हो रहा है. आभार..

mehek said...

baapre bharat aur russ ke majdoor mein itna farak,kaash yaha ke bachhe bhi yuhi rangon ki cycle par khelte,har lekh ke saath amrutaji ka naya pehlu milta hai,kahi sihq mein dubichandani to kabhi samajik baatein,bahut khub.hamne kabhi marathi sahitya aur english nawal chod kuchpadha nahi thahindi mein.aapki kalam e kuch kuch jaan paa rahe hai.

सुशील कुमार छौक्कर said...

इस पोस्ट से वाकई उस वक्त के सोवियत रुस की झलक मिलती है। पर मेरी समझ ये कभी नही आया कि वो रुस क्यों कैसे टूट गया? लगता आज सुबह आपने टीवी पर समाचार देखा है। और हाँ आज की कविता सुन्दर गहरी है।

विनीता यशस्वी said...

ek baar fir ek achhi post parwane ke liye dhanyawaad

दिगम्बर नासवा said...

अमृता जी के खयालात शुरू से ही साम्यवाद के पक्ष में रहे हैं, ऐसा उनकी अनेक कहानियो और उपन्यासों से भी लगता है, परन्तु उन्होंने आँखे बंद कर इसको नही माना.........हर तरह से इंसानियत और रिश्तों की बारीकी को समझा है.......मजदूर चाहे इधर के हों या उधर के व्यवस्था से पिसते ही हैं.

अमृता जी की पारखी नज़रों से देखना एक सुंदर संस्मरण है

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत कुछ उस वक्त के हालात झलकते हैं इस में शायद हर इन्सान अपने समय के हालातों से प्रभावित तो रहता ही है. बहुत आभार आपका.

रामराम.

pritima vats said...

कविता बहुत अच्छी है। अमृता जी क्रांतिकारी विचार और उनकी पारखी नजर को एक बार फिर ताजा कर दिया है।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

सच बहुत भाव पूर्ण पोस्ट.
======================
शुक्रिया
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

बवाल said...

लोक पीड़ा की भट्ठी में
तेरा हर लफ्ज़ पक गया
बहुत बेहतर पोस्ट, दिलबाज़ी का गीत प्रीतम का पत्र रूस से बाकू के लिए और अन्त २८० रुपए की ख़ातिर हैवानियत आह! आज तो दिल ही टूट गया रंजू जी, तार तार हो गया इतनी सी बच्ची के साथ ५० साल का पुलिस वाला अरे राम राम । चीर के दो कर देना ही सज़ा है उस नराधम के लिए। मालिक ऎसे मंज़र दिखाने से पहले जान ले ले हमारी। सच दिल तड़प के रह गया जी आज।

अभिषेक ओझा said...

एक और अच्छा पत्र... अमृता की लेखनी के साथ-साथ तत्कालीन सोवियत रूस की भी जानकारी मिल रही है.

Abhishek said...

हमारे यहाँ भी वो सपनीली सुबह आए जो कई बच्चों की आंखों में बसी है.