Thursday, September 17, 2009

सच और झूठ के बीच ---- कुछ जगह खाली है ....

नग्न आकाश के नीचे -
मैं कितनी ही देर---
तन के मेह में भीगती रही ,
वह कितनी ही देर
तन के मेह में गलता रहा
फिर बरसों के मोह को --
एक जहर की तरह पी कर
उसने कांपते हाथों से
मेरा हाथ पकडा !
चल ! क्षणों के सिर पर
एक छत डालें
वह देख !
परे --सामने ,उधर
सच और झूठ के बीच ----
कुछ जगह खाली है ....

अमृता के उपन्यास ३६ चक / नागमणि से आज कुछ पंक्तियाँ .यह उपन्यास पढने वाले को खुद में डुबो लेता है ..मैं यह कई बार पढ़ चुकी हूँ और हर बार इस के अलग अलग अर्थ मिले हैं मुझे ...

अलका को कुमार के स्टूडियो में आ कर काम करते हुए छः महीने हो गए थे .और अलका को छः महीने में नहीं पहले ही महीने में मालूम पढ़ गया था कि जिस समय कुमार काम करता हो ,अलका की कही किसी बात में या प्याले के चम्मच में अथवा खिड़की की सांकल में कोई अंतर नहीं रहता है ..इस लिए वह अक्सर चुप ही रहती ..करीब आधे घंटे के बाद कुमार ने मेज से सिर उठाया एक मिनट के लिए आँखे बंद करी और अलका की और देख कर कहा-- क्या एक कप काफी का प्याला मिलेगा ..?"

अलका ने स्टूल पर रखे हुए पहले काफी के कप को उठाया और गर्म काफी बना कर दूसरा कप बना लायी .कुमार मेज पर कागज़ को ध्यान से देख रहा था ..आज इतनी खुशबु कहाँ से आ रही है ?" कुछ इस तरह से उसने पूछा जैसे वह खुशबु को कागज़ पर तलाश रहा हो ..

अलका ने भी तस्वीर की और गर्दन घुमाई और फिर तस्वीर की लड़की के बालों में टंगे हुए फूलों की और देखती हुई बोली ..इन फूलों से आ रही होगी खुशबु |"

अलका के हाथ से काफी पकड़ते हुए कुमार ने हंसते हुए कहा "अभी मैंने अपना होश इतना नहीं खोया है कि कागज़ पर बनाए हुए फूलों से मुझे खुशबु आने लगे |"
अलका चुप साधे रही ..उसने दीवान के पाए के पास पड़ी हुई चौकी की देखा जैसे कह रही हो की इतना होश जरुर जाता रहा है कि कमरे में पड़े हुए ताजे फूल अभी तक न दिखाई दिए हों ..यह फूल अलका ने सुबह आते हो कमरे में सजा दिए थे ..
ओह्ह!! कुमार ने होश में होने का दावा वापस लिया और काफी का गर्म घूंट भरते हुए कहने लगा ..पर यह आदत नहीं डालनी चाहिए थी ..|"
कैसी आदत ?"
काफी की आदत ..फूलों की आदत .."
और ?
पैसों की आदत ..शोहरत की आदत ...औरत की आदत "
और अपने आप की आदत ?"
क्या मतलब ?"
अपने आप की भी आदत नहीं डालनी चाहिए /कभी किसी माइकल एन्जेलों को माइकल एन्जेलों रहना चाहिए ..और कभी उसको किसी बाजार के एक कोने में बैठा हुआ हलवाई भी बन जाना चाहिए .कभी नमक तेल बेचने वाला बनिया और कभी पान बीडी बेचने वाला .."
कुमार हंस दिया .तुम समझ नहीं पायी हो अलका ! एक अपने आपकी आदत भर के लिए बाकी कोई आदत नहीं डालनी चाहिए ..मैं सोचा हूँ कि अपने आपकी पूरी आदत केवल तभी पड़ सकती है जब आदमी बाकी आदतों से मुक्त हो जाय "
यह मैं मानती हूँ पर मेरे विचार में शोहरत और औरत में बहुत फर्क होता है "
किसी आदत और आदत में कोई अंतर नहीं मैं एक बार ..."
चुप क्यों हो गए ?"
तुम्हारी जगह अगर कोई दूसरी लड़की होती तो मैं शायद चुप रहता किसी को भी कुछ बताने की मुझे कोई जरूरत नहीं पड़ी ..जरूरत अब भी नहीं है बताने की ...शायद बताने में कोई हर्ज़ भी नहीं ..तुम मुझे गलत समझोगी "
मुझे खुद पर भरोसा है "
मैं यह बताने चला था कि एक बार मुझ में ऐसी भूख जगी कि मैं कई दिन तक सो ना सका ..यह सिर्फ जिस्म कि भूख थी ,एक औरत के जिस्म की भूख ..पर मैं किसी भी औरत के साथ अपनी ज़िन्दगी के साल बांधने को तैयार नहीं था ..कभी भी तैयार नहीं हो सकता .इस लिए मैं एक ऐसी औरत के पास जाता रहा जो रोज़ बीस रूपये लेती थी और मेरी स्वंत्रता कभी नहीं मांगती थी ....."

अलका ने कुछ नहीं कहा .सिर्फ नजरे गढा कर कुमार के चेहरे को देखती रही ..
तुम मेरे मन की बात समझी हो क्या ?
हाँ "
या तुम सोचती हो कि मैं अच्छा आदमी नहीं हूँ ?"
नहीं मैं ऐसा कुछ नहीं सोचती हूँ "
पर तुम कुछ सोच रही हो .."
हाँ "
क्या ?
कि मैं वह औरत होती जिसके पास आप रोज़ बीस रूपये दे कर जाया करते थे "
अलका !!
कुमार के हाथ में पकडा हुआ काफी का कप कांप गया पर अलका उसी तरह निष्कम्प खड़ी रही जिस तरह से पहले खड़ी थी ..कुमार घबरा कर दीवान पर बैठ गया ..

हाँ तो मैं कह रही थी कि औरत और शोहरत में बहुत बड़ा फर्क होता है ..."
मैं समझा नहीं ?"

शोहरत किसी को अपने आपको समझने में मदद नहीं करती और न ही ऐसा पैसा करता है पर औरत किसी को अपने आपको समझने में उसी तरह मदद करती है किस तरह से किसी की कला उसकी मदद करती है "
कला व्यक्ति का ही एक अंग होती है अपनी आँखों की तरह या अपनी जुबान की तरह शायद इस से भी अधिक यह आँखे नहीं आँखों की नजर होती नजर भी नहीं _ एक नुक्ता नजर होती हैं ..
मेरा नुक्ता नजर बिलकुल अलग है अलका !"
वह मैं जानती हूँ .."
यह तुम्हारे नुक्ता नजर से मेल नहीं खा सकता "
शायद "?
शायद नहीं यह सच है "
मैंने यहाँ कहा भी नहीं कि यह कभी मेल खा जाए "
फिर ??
मैंने कुछ नहीं कहा ..."
पर तुमें यह क्यों कहा कि तुम ............."
रुपये कमाने के लिए .."
यह कह कर अलका हँस पड़ी पर कुमार की हँसी उसके गले में अटक कर रह गयी
क्यों यह क्या काम है बीस रुपये रोज़ के ?"
तुम सी गंभीर लड़की "
मैं सच मुच गंभीर हूँ "
हाँ अपने काम में सच ही .."
मैं ज़िन्दगी में भी वैसी ही हूँ "
फिर तुमने यह बात कैसे कही "
इस लिए कि मैं बहुत गंभीर हूँ "
वह गंभीर बात है ?
इतनी कि इस से अधिक गंभीर कोई और बात हो ही नहीं सकती है "
मैं इसको यूँ नहीं समझ पाऊंगा अलका ! नहीं तो दिल में दुखी होता रहूँगा ."
फिर भूल जाये कि मैंने यह बात कही थी "
तुम भूल सकोगी इस बात को ?"
मैं कभी याद नहीं दिलाउंगी "
हम रोज़ वैसे ही काम करेंगे जैसे करते हैं "
हम रोज़ वैसे ही काम करेंगे जैसे करते हैं "
हम कभी व्यक्तिगत बाते नहीं करेंगे "
हम कभी व्यक्तिगत बाते नहीं करेंगे "
हम सिर्फ अपने काम से वास्ता रखेंगे "
हम सिर्फ अपने काम से वास्ता रखेंगे "
तुम मेरी ज़िन्दगी में कोई दखल नहीं दोगी "
मैं आपकी ज़िन्दगी में कभी कोई दखल नहीं दूंगी "
विशेषकर मोहब्बत की कोई बात नहीं करोगी "
विशेषकर मोहब्बत की कोई बात नहीं करुँगी
अलका !"
जी !"
तुम यूँ क्यों बोलती जा रही हो जैसे कोई बच्ची मास्टर के सामने दो दुनी चार का पहाडा पढ़ रही हो .तुम सीरियस क्यों नहीं हो ?"
मैं बिलकुल सिरियस हूँ ..मैं सारे वचन इस तरह से दोहरा रही हूँ जैसे गुरु से कोई मन्त्र लेते समय गुरु के शब्दों को दोहराता है
कुमार ने परेशान हो कर अपने माथे को मला और कहा कि मैं तुम्हे बिलकुल नहीं समझ सका हूँ अलका !"
पर मैं आपको समझ सकती हूँ !"
और उस रात से पहले जब भी कुमार को किसी औरत का सपना आता था तो उसका कोई चेहरा नहीं होता था पर उस रात जो सपना आया उस में उसको औरत का चेहरा दिखाई दिया उसने उस चेहरे को पहचाना था और उसको डर था कि कहीं यह पहचान उसकी तलाश ना बन जाये ..तलाश हमेशा रिश्ते को बांधती है और वह अपनी कला के सिवा किसी चीज से कोई रिश्ता नहीं बांधना चाहता था ...

आगे जारी है .....

13 comments:

मीनू खरे said...

धन्यवाद इतनी अच्छी कविता और उपन्यास के अंश पढ़वाने के लिए.

फ़िरदौस ख़ान said...

नग्न आकाश के नीचे -
मैं कितनी ही देर---
तन के मेह में भीगती रही ,
वह कितनी ही देर
तन के मेह में गलता रहा
फिर बरसों के मोह को --
एक जहर की तरह पी कर
उसने कांपते हाथों से
मेरा हाथ पकडा !
चल ! क्षणों के सिर पर
एक छत डालें
वह देख !
परे --सामने ,उधर
सच और झूठ के बीच ----
कुछ जगह खाली है ....

बहुत सुन्दर...अमृता प्रीतम की दिलकश कविता और उपन्यास की प्रस्तुति के लिए आभार...

Udan Tashtari said...

डूब जाते हैं जब भी आप अमृता जी से जुड़ी कड़ियाँ प्रस्तुत करती हैं, बहुत आभार.

pallavi trivedi said...

उपन्यास के इस अंश ने ही इतना बाँध लिया की पूरा पढने को जी कर रहा है.....

Nirmla Kapila said...

बहुत सुन्दर कविता और उप्न्यास है अगली कडी का इन्तजार रहेगा अमृता जी को पढना हमेशा अच्छा लगता है आभार्

Harkirat Haqeer said...

कहीं भीतर तक छू जातीं हैं अमृता की पंक्तियाँ जब भी आप इतनी खूबसूरती से पेश करती हैं ......

Krishna Kumar Mishra said...

क्या बात है आप रिव्यू बहुत बेह्तर लिख सकती है वैसे मुझे अमृता जी के एक उपन्यास ने झकझोर दिया, हर्दत्त का जिन्दगी नामा

Dr. Tripat said...

bahut bahut shukriya aapki is lekhni ka
i m a great fan of amrita pritam ji
once again thanks a lot
and congrates

singhsdm said...

kya kahooon..............sirf itna ki behatren

Nirmla Kapila said...

बहुत दिन बाद आयी बिमार थी ।ामृता जी के लिये तो बस हमेशा ही निशब्द हूँ । बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनायें । आपसे बात करने का भी मन थ मगर आप दिखी नहीं

How do we know said...

nagmani jitni baar padhti hoon, utni baar nayi lagti hai..

Monu Awalla said...

Amrita pritam ji ka bahut naam suna hai par abhi tak mene unki rachnaayein nahi padhi...ab zaroor padhunga.

singamaraja said...

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