Tuesday, February 16, 2010

राँझा -राँझा कहन्दी नि मैं आपे रांझा होई


जवानी आई रे
मेरे बचपन के इस गांव में
बातें उडती है
इन बहती हुई हवाओं में

वह ऊँचे ऊँचे पहाड़ों में घिरी हुई वादी थी ,जहाँ सूरज तेजी से उतर जाता है .लेकिन वहां अभी उसके सुर्ख रंग ने नदी के पानी में एक तिलस्म बिछाया हुआ था | देखा वादी के गांव की एक मासूम सी लड़की नदी के पानी से खेलती हुई यह गा रही थी .और हवा के एक झोंके से याद आया यही वह वक़्त है जो कभी मुझ पर आया था .लेकिन नहीं जानती ,वह कब मुझे छोड़ कर चला गया ,कहाँचला गया -अब लगा ,वह तो इस नदी के किनारे से बेगाना हो कर मुझसे खेल रहा है ..
तभी पास से एक गडरिया गुजरा ,मैंने रास्ते के मुसाफिर की तरह उस से दुआ सलाम कहा.... उसने कहा उस लड़की को देख रही हो वह मेरी बेटी है ,बहुत मासूम है अभी नहीं जानती कि अगर कभी उसने भी मेरी तरह दरवेशों के टीले पर जाना है तो उसका रास्ता बहुत मुश्किल है ....दुश्वार रास्ता
मुझे लगा ,मुझे इस रास्ते पर जाने वाला कोई मित्र मिल गया .पूछा ..बाबा !क्या तुम दरवेशों के टीले का रास्ता जानते हो ?
वह बदन की झुरियों तक हँस पड़ा ,पूछने लगा --तुम वहां जाने के लिए आई हो ?

मैंने कहा हाँ बाबा ,बरसों से चली हूँ वहां जाने के लिए |
कहने लगा मैं तो रोज़ जाता हूँ वहां भेड़ों का दूध ले कर लेकिन तुम्हे एक बात बताना ....खाली हाथ आई हो न ?
हाँ बाबा देखो मैं खाली हाथ आई हूँ ..
गडरिया बाबा मुझे गौर से देखता रहा और कहने लगा -तुमने शोहरत का कोई छाप छल्ला तो नहीं पहना न ?
मैंने दोनों हाथ आगे किये ,खाली उँगलियों और खाली बाहों वाले
वह फिर मेरे माथे की तरफ देखता रहा ,और पूछने लगा --कोई मगरुरी का कण तो माथे पर नहीं रखा हुआ है ना ?
मैं हँस दी और कहा --राँझा -राँझा कहन्दी नि मैं आपे रांझा होई
अब गडरिया बाबा भी हंसने लगा और कहा लोग कितना कितना भार उठाये फिरते हैं ,तभी तो टीले तक नहीं पहुँच पाते .अच्छा फिर अंजुरी आगे कर
मैंने दोनों हाथों की अंजुरी बना कर आगे की तो उसने कंधे पर डाली हुई छोटी सी मश्क से मेरी अंजुरी को दूध से भर दिया साथ ही कहा कि पीती जाओ जाओ जितना पी सकती फिर चल देना उस सफ़ेद पर्वतकी पगडण्डी पर ..
डूबते सूरज की लाली अब जाने पहाड़ों की ओट में हो गयी थी ,रास्ता बिलकुल अँधेरा हो गया और मैं पगडण्डी को पैरों से टटोलती चलने लगी
आसमान पर चाँद भी खो गया था कोई बताने पूछने वाला वहां नहीं था
इतने में दूर से आवाज़ आई आज तो शगुनों वाली रात है ...
मैंने चारों तरफ दूर तक देखा ,कोई नहीं था लेकिन आवाज़ वाले ने कहा सूरज की बेटी ने जब चाँद को देख लिया ,तो उसको चाँद का विरह सताने लगा बाप ने जब बेटी की यह हालत देखी तो इक रथ तैयार किया जिसमें बुध और शुक्र नाम के दो धोड़े बंधे हुए थे ,और बाप ने बेटी को रथ में बैठा कर चाँद के घर भेज दिया वह रात थी जब चाँद के पास सूरज की बेटी आई तो उसको गले से लगा कर वह किसी कन्दरा में चला गया
मैंने कहा तभी चाँद की फांक भी कहीं नहीं दिखाई देती और और पूछा --देवी तुम कौन हो ?जो अँधेरी रात में राह गीरों का दिल रखने के लिए यहकहानी सुनाती हो ?
वह हँस दी और कहने लगी तुमने मुझे पहचाना नहीं ?मैं सूर्य सावित्री हूँ ,वही ऋग्वेद की सूर्य सावित्री
मेरा सिर नमन से झुक गया .अब कोई आवाज़ कहीं नहीं थी ..मुश्किल पगडण्डी वाले रास्ते पर भी दोनों तरफ पेड़ उगे हुए थे कभी कभी हाथ डालने के लिए और चढ़ाई वाले रास्ते पर जरा साँस लेने के लिए ....

आगे जारी है .....

7 टिप्पणियाँ:

वन्दना said...

bahut hi gahan.........aage ka intzaar hai.

वाणी गीत said...

यह शायद अमृता के सपनों की कोई इबारत है ....कैसे शब्द ..कैसा बयान ....हर बार मैं इस दहलीज़ पर आकर ठिठक जाती हूँ ....शब्द सिहरते हैं ....
अगली कड़ी का इंतिजार रहेगा ...!!

डॉ. मनोज मिश्र said...

शब्द भाव गहरे हैं,आगे की उत्सुकता बन गयी .

Priya said...

ultimate Raju mam .......waiting for next post

Udan Tashtari said...

पढ़ते पढ़ते ही इन्तजार लग गया अगली कड़ी का.

निर्मला कपिला said...

शब्दों को देखें या भावों की गहराई मे झाँकें यही समझ नही पाती अमृ्ता थी या भावनाओं का झोँका उसके दिल मे संवेदनाओं का रिस्ता हुया लावा था शायद। लाजवाब धन्यवाद्

Vidhu said...

अमृता का अमृतपान करके भला कैसे महसूस कर सकती हूँ ..हर बार कुछ दिल में गहराई से उतर जाने वाले शब्द और अहसास ...तुम ठीक तो हो बहुत दिनों से कोई बात भी नहीं हो पाई ...बधाई

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