Friday, August 19, 2011

अंतरव्यथा(अमृता प्रीतम की कहानी)


अंतरव्यथा(नीचे के कपडे )

जिसके मन की पीडा को लेकर मैंने कहानी लिखी थी-'नीचे के कपडे" उसका नाम भूल गई हूँ । कहानी में सही नाम लिखना नहीं था, और उससे एक बार ही मुलाकात हुई थी, इसलिए नाम भी याद से उतर गया है...

जब वह मिलने आई थी, बीमार थी। खूबसूरत थी, पर रंग और मन उतरा हुआ था। वह एक ही विश्वास को लेकर आई थी कि मैं उसके हालात पर एक कहानी लिख दूँ...

मैंने पूछा-इससे क्या होगा?

कहने लगी-जहाँ वह चिट्ठियाँ पडीं हैं जो मैं अपने हाथों से नहीं फाड सकती, उन्हीं चिट्ठियों में वह कहानी रख दूँगी...मुझे लगता है, मैं बहुत दिन जिंदा नहीं रहूँगी, और बाद में जब उन चिट्ठियों से कोई कुछ जान पाएगा, तो मुझे वह नहीं समझेगा जो मैं हूँ। आप कहानी लिखेंगी तो वहीं रख दूँगी। हो सकता है, उसकी मदद से कोई मुझे समझ ले मेरी पीडा को संभाल ले। मुझे और किसी का कुछ फिक्र नहीं है, पर मेरा एक बेटा है, अभी वह छोटा है, वह बडा होगा तो मैं सोचती हूँ कि बस वह मुझे गलत न समझे...

उसकी जिंदगी के हालात सचमुच बहुत उलझे हुए थे और मेरी पकड में नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें कैसे समेट पाऊँगी। लिखने का वादा तो नहीं किया पर कहा कि कोशिश करूँगी..

मैं बहुत दिन वह कहानी नहीं लिख पाई। सिर्फ एक अहसास सा बना रहा कि उसका बच्चा मेरे जेहन में बडा हो रहा है, इतना बडा कि अब बहुत सी चीजें उसके हाथ लगती हैं, तो वह हैरान उन्हें देखे जा रहा है..

कहानी प्रकाशित हुई और बहुत दिन गुजर गए। मैं जान नहीं पाई कि उसके हाथों तक पहुँची या नहीं। सब वक्त के सहारे छोड दिया। उसका कोई अता-पता मेरे पास नहीं था...

एक अरसा गुजर गया था, जब एक दिन फोन आया, दिल्ली से नहीं था, कहीं बाहर से था। आवाज थी-'आपका बहुत शुक्रिया! मैंने कहानी वहीं रख दी है जहाँ चाहती थी...

इतने भर लफ्जों से कुछ पकड में नहीं आया था, इसलिए पूछा-'आप कौन बोल रही हैं? कौन सी कहानी?

जवाब में बस इतनी आवाज थी-'बहुत दूर से बोल रही हूँ, वही जिसकी कहानी आपने लिखी है-'नीचे के कपडे...और फोन कट गया...

"नीचे के कपडे???"

अचानक मेरे सामने कई लोग आकर खडे हो गए हैं, जिन्होंने कमर से नीचे कोई कपडा नहीं पहना हुआ है।

पता नहीं मैंने कहाँ पढा था कि खानाबदोश औरतें अपनी कमर से अपनी घघरी कभी नहीं उतारती हैं। मैली घघरी बदलनी होतो सिर की ओर से नई घघरी पहनकर, अंदर से मैली घघरी उतार देती हैं और जब किसी खानाबदोश औरत की मृत्यु हो जाती है तो उसके शरीर को स्नान कराते समय भी उसकी नीचे की घघरी सलामत रखी जाती है। कहते हैं, उन्होंने अपनी कमर पर पडी नेफे की लकीर में अपनी मुहब्बत का राज खुदा की मखलूक से छिपाकर रखा होता है। वहाँ वे अपनी पसंद के मर्द का नाम गुदवाकर रखती हैं, जिसे खुदा की ऑंख के सिवा कोई नहीं देख सकता।

और शायद यही रिवाज मर्दों के तहमदों के बारे में भी होता होगा।

लेकिन ऐसे नाम गोदने वाला जरूर एक बार औरतों और मर्दों की कमर की लकीर देखता होगा। उसे शायद एक पल के लिए खुदा की ऑंख नसीब हो जाती है, क्योंकि वह खुदा की मखलूक की गिनती में नहीं जाता...

लेकिन मेरी ऑंख को खुदा की ऑंख वाला शाप क्यों मिल गया? मैं अपने सामने ऐसी औरतें और मर्द क्यों देख रहा हूँ, जिन्होंने कमर से नीचे कोई कपडा नहीं पहन रखा है, जिन्हें देखना सारी मखलूक के लिए गुनाह है?

कल से माँ अस्पताल में है। उसके प्राण उसकी साँसों के साथ डूब और उतरा रहे हैं। ऐसा पहले भी कई बार हुआ है और दो बार पहले भी उसे अस्पताल ले जाया गया था, पर इस बार शायद उसके मन को जीने का विश्वास नहीं बँध रहा है। अचानक उसने उंगली में से हीरे वाली अंगूठी उतारी और मुझे देकर कहा कि मैं घर जाकर उसकी लोहे वाली अलमारी के खाने में रख दूँ।
अस्पताल में अभी दादी भी आई थी, पापा भी, मेरा बडा भाई भी, लेकिन माँ ने न जाने क्यों, यह काम उन्हें नहीं सौंपा। हम सब लौटने लगे थे, जब माँ ने इशारे से मुझे ठहरने के लिए कहा। सब चले गए तो उसने तकिए के नीचे से एक मुसा हुआ रुमाल निकाला, जिसके कोने से दो चाबियाँ बँधी हुई थीं। रुमाल की कसी हुई गाँठ खोलने की उसमें शक्ति नहीं थी, इसलिए मैंने वह गाँठ खोली। तब एक चाभी की ओर इशारा करके उसने मुझे यह काम सौंपा कि मैं उसकी हीरे की अंगूठी अलमारी के अंदर खाने में रख दूँ। यह भी बताया कि अंदर वाले की चाभी मुझे उसी अलमारी के एक डिब्बे में पडी हुई मिल जाएगी।

और फिर माँ ने धीरे से यह भी कहा कि मैं बम्बई वाले चाचाजी को एक खत डाल दूँ, दिल्ली आने के लिए। और दूसरी चाभी उसने उसी तरह रुमाल में लपेटकर अपने तकिए के नीचे रख ली।और जिस तरह तकदीरें बदल जाती हैं उसी तरह चाभियाँ भी बदल गई...
                   घर में रोज के इस्तेमाल की माँ की एक ही अलमारी है, लेकिन फालतू सामान वाली कोठरी में लोहे की एक और भी अलमारी है, जिसमें फटे-पुराने कपडे पडे रहते हैं। पापा के ट्रांसफर के समय वह अलमारी लगभग टूट ही गई थी, पर माँ ने उसे फेंका नहीं था और साकड-भाकड वाली उस अलमारी को फालतू कपडों के लिए रख लिया था।

घर पहुँचकर जब मैं माँ की अलमारी खोलने लगा, तो वह खुलती ही न थी। चाभी मेरी तकदीर की तरह बदली हुई थी। हाथ में थामी हुई हीरे की अंगूठी को कहीं संभालकर रखना था, इसलिए मैंने सामान वाली कोठरी की अलमारी खोल ली। यह चाभी उस अलमारी की थी। इस अलमारी में भी अंदर का खाना था। मैंने सोचा, उसकी चाभी भी जरूर इसी अलमारी के किसी डिब्बे में ही मिलनी थी...

और मैं फटे-पुराने कपडों की तहें खोलने लगा...

पुराने, उधडे हुए सलमे के कुछ कपडे थे, जो माँ ने शायद उनका सुच्चा सलमा बेचने के लिए रखे हुए थे और पापा के गर्म कोट भी थे, जो शायद बर्तनों से बदलने के लिए माँ ने संभालकर रखे हुए थे। मैंने एक बार गली में बर्तन बेचने वाली औरतों से माँ को एक पुराने कोट के बदले में बर्तन खरीदते हुए देखा था।

पर मैं हैरान हुआ-माँ ने वे सब टूटे हुए खिलौने भी रखे थे, जिनसे मैं छुटपन में खेला करता था। देखकर एक दहशत सी आई-चाभी से चलने वाली रेलगाडी इस तरह उलटी हुई थी, जैसे पटरी से गिर गई हो और उस भयानक दुर्घटना से उसके सभी मुसाफिर घायल हो गए हों-प्लास्टिक की गुडिया, जो एक ऑंख से कानी हो गई थी, रबड का हाथी, जिसकी सूंड बीच में से टूट गई थी, मिट्टी का घोडा, जिसकी अगली दोनों टाँगें जैसे कट गई हों और कुछ खिलौनों की सिर्फ टाँगें और बाहें बिखरी पडी थीं-जैसे उनके धड और सिर उडकर कहीं दूर जा पडे हों- और अब उन्हें पहचाना भी नहीं जा सकता था..

मेरे शरीर में एक कंपन सी दौड गई-देखा कि इन घायल खिलौनों के पास ही मिट्टी की बनी शिवजी की मूर्ति थी, जो दोनों बाहों से लुंजी हो गई थी और ख्याल आया -जैसे देवता भी अपाहिज होकर बैठा हुआ है।

जहाँ तक याद आया, लगा कि मेरा बचपन बहुत खुशी में बीता था। बडे भाई के जन्म के सात बरस बाद मेरा जन्म हुआ था, इसलिए मेरे बहुत लाड हुए थे। तब तक वैसे भी पापा की तरक्की हो चुकी थी, इसलिए मेरे वास्ते बहुत सारे कपडे और बहुत सारे खिलौने खरीदे जाते थे...लेकिन पूरी यादों के लिए इन टूटे हुए खिलौनों की माँ को क्या जरूरत थी, समझ में नहीं आया...

सिर्फ खिलौने ही नहीं, मेरे फटे हुए कपडे भी तहों में लगे हुए थे-टूटे हुए बटनों वाले छोटे-छोटे कुरते, टूटी हुई तनियों वाले झबले और फटी हुई जुराबें भी...

और फिर मुझे एक रुमाल में बँधी हुई वह चाभी मिल गई, जिसे मैं ढूँढ रहा था। अलमारी का अंदर वाला खाना खोला, ताकि हीरे की अंगूठी उसमें रख दूँ।

यही वह घडी थी जब मैंने देखा कि उस खाने में सिर्फ नीचे पहनने वाले कपडे पडे हुए थे..

और अचानक मेरे सामने वे लोग आकर खडे हो गए हैं जिनके सिर भी ढँके हुए हैं, बाहें भी, ऊपर के शरीर भी- लेकिन कमर से नीचे कोई कपडा नहीं है...

प्रलय का समय शायद ऐसा ही होता होगा, मालूम नहीं। मेरे सामने मेरी माँ खडी हुई है, पापा भी, बम्बई वाले चाचा भी और कोई एक मिसेज चोपडा भी और एक कोई मिस नंदा भी- जिन्हें मैं जानता नहीं।

और खोए हुए से होश से मैंने देखा कि उनके बीच में कहीं भी मैं भी गुच्छा सा बनकर बैठा हुआ हूँ...

न जाने यह कौन सा युग है, शायद कोई बहुत ही पुरानी सदी, जब लोग पेडों के पत्तों में अपने को लपेटा करते थे..और फिर पेडों के पत्ते कागज जैसे कब हो गए, नहीं जानता...

अलमारी के खाने में सिर्फ कागज पडे हुए हैं, बहुत से कागज जिन पर हरएक के तन की व्यथा लिखी हुई है-तन के ताप जैसी, तन के पसीने जैसी, तन की गंध जैसी...

ये सब खत हैं, बम्बई वाले चाचाजी के और सब मेरी माँ के नाम हैं...

तरह-तरह की गंध मेरे सिर को चढ रही है..

किसी खत से खुशी और उदासी की मिली-जुली गंध उठ रही है। लिखा है, 'वीनू! जो आदम और हव्वा खुदा के बहिश्त से निकाले गए थे-वह आदम मैं था और हव्वा तुम थीं...

किसी खत से विश्वास की गंध उठ रही है-'वीनू ! मैं समझता हूँ कि पत्नी के तौर पर तुम अपने पति को इंकार नहीं कर सकती, लेकिन तुम्हारा जिस्म मेरी नजर में गंगा की तरह पवित्र है और मैं शिवजी की गंगा को जटा में धारण कर सकता हूँ...

किसी खत से निराशा की गंध उठ रही है-'मैं कैसा राम हूँ, जो अपनी सीता को रावण से नहीं छुडा सकता...न जाने क्यों, ईश्वर ने इस जनम में राम और रावण को सगे भाई बना दिया!

किसी खत से दिलजोई की गंध उठ रही है-'वीनू! तुम मन में गुनाह का अहसास न किया करो। गुनाह तो उसने किया था, जिसने मिसेज चोपडा जैसी औरत के लिए तुम्हारे जैसी पत्नी को बिसार दिया था..

और अचानक एक हैरानी की गंध मेरे सिर को चढी, जब एक खत पढा-'तुम मुझसे खुशनसीब हो वीनू! तुम अपने बेटे को बेटा कह सकती हो, लेकिन मैं अपने बेटे को कभी भी अपना बेटा नहीं कह सकूँगा।

और अधिक हैरानी की गंध से मेरे सिर में एक दरार पड गई, जब एक दूसरे खत में मैंने अपना नाम पढा। लिखा था-'मेरी जान वीनू! अब तुम उदास न हुआ करो। मैं नन्हें से अक्षय की सूरत में हर वक्त तुम्हारे पास रहता हूँ। दिन में मैं तुम्हारी गोद में खेलता हूँ और रात को तुम्हारे पास सोता हूँ...

सो मैं..मैं...

जिंदगी के उन्नीस बरस मैं जिसे पापा कहता रहा था, अचानक उस आदमी के वास्ते यह लफ्ज मेरे होठों पर झूठा पड गया है...

बाकी खत मैंने पूरे होश में नहीं पढे, लेकिन इतना जाना है कि जन्म से लेकर मैंने जो भी कपडा शरीर पर पहना है, वह माँ ने कभी भी अपने पति की कमाई से नहीं खरीदा था। मिट्टी का खिलौना तक भी नहीं। मेरे स्कूल की और कॉलेज की फीसें भी वह घर के खर्च में से नहीं देती थी..

यह भी जाना है कि बम्बई में अकेले रहने वाले आदमी से कुछ ऐसी बातें भी हुई थीं, जिनके लिए कई खतों में माफियाँ माँगी गई हैं, और उस सिलसिले में कई बार किसी मिस नंदा का नाम लिखा गया है, जो खत लिखने वाले की नजरों में एक आवारा लडकी थी, जिसने मेनका की तरह एक ॠषि की तपस्या भंग कर दी थी...और कई खतों में माँ की झिडकियाँ सी दी गई हैं कि ये सिर्फ उसके मन के वहम हैं, जिनके कारण वह बीमार रहने लगी है...

यह माँ, पापा, चाचा,मिसेज चोपडा, मिस नंदा-कोई भी खानाबदोशों के काफिलों में से नहीं है- पर खानाबदोशों की परंपरा शायद सारी मनुष्य जाति पर लागू होती है, सबकी घघरियों और सबके तहमदों पर, जहाँ उनके शरीर पर पडी उनके नेफे की लकीर पर लिखा हुआ नाम ईश्वर की ऑंख के सिवा किसी को नहीं देखना चाहिए।...और पता नहीं लगता कि आज मेरी ऑंख को ईश्वर की ऑंख वाला शाप क्यों लग गया है..

सिर्फ यह जानता हूँ कि ईश्वर की ऑंख ईश्वर के चेहरे पर हो तो वरदान है, लेकिन इन्सान के चेहरे पर लग जाए तो शाप हो जाती है...।








8 comments:

सदा said...

आज आपके माध्‍यम से उनकी यह कहानी पढ़ने का अवसर मिला ...आपका बहुत-बहुत आभार ।

अशोक कुमार शुक्ला said...

Bahut khoob

डॉ. मनोज मिश्र said...

कुछ नया जाननें को मिला ,आभार.

Maheshwari kaneri said...

आज आपके माध्‍यम से कुछ नया जाननें को मिला ,आभार...

om sapra said...

amrita pritam'sb'rthdayfalls on 30 th august,
let us remmember her excptional literary personality and creativity.
her books and writings are not only lovable and inspiring and also have emotional touch too.
GOD may bless her in Heaven
-om sapra, delhi-9
9818180932

Anju said...

"अंतर व्यथा " अंतर को छू लेने वाली कहानी .....अंतर की गहराईयों तक पहुंचना अमृता जी की खासियत है ....आपका प्रयास सफल है .....क्या यहाँ सिर्फ आप की पोस्ट ही प्रकाशित होती है ,या अमृता जी के बारे में कोई और भी कुछ लिख कर भेज सकता है ,हाँ तो कैसे...कृपया रौशनी डालें

फ़िरदौस ख़ान said...

बेहद उम्दा कहानी है...

Anonymous said...

A DD serial called 'Zindagi' was based on the novel by Amrita Pritam. Supriya Pathak, Sharmila Tagore and Sadashiv Amrapurkar had acted in it. Can anyone help me find the name of Amrita Pritam's novel?