Wednesday, February 1, 2012

मिट्टी के इस चूल्हे में से हम कोई चिनगारी ढूँढ़ लेंगे

 मिट्टी के इस चूल्हे में से
हम कोई चिनगारी ढूँढ़ लेंगे
एक-दो फूँफें मार लेंगे
बुझती लकड़ी फिर से बाल लेंगे

मिट्टी के इस चूल्हे में
इश्क़ की आँच बोल उठेगी
मेरे जिस्म की हँडिया में
दिल का पानी खौल उठेगा

आ साजन, आज पोटली खोल लें
हरी चाय की पत्ती की तरह
वहीं तोड़-गँवाई बातें
वही सँभाल सुखाई बातें
इस पानी में डाल कर देख,
इसका रंग बदल कर देख

गर्म घूँट इक तुम भी पीना,
गर्म घूँट इक मैं भी पी लूँ
उम्र का ग्रीष्म हमने बिता दिया,
उम्र का शिशिर नहीं बीतता
 
 
सोच की इकाई को तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी...

बात चाहे जिस्म की किसी क़ाबलियत की हो, या मस्तक की किसी क़ाबलियत की, पर दोनों तरह की क़ाबलियत को, एक दूसरी की मुख़ालिफ़ करार देकर, एक को ‘जीत गई’ और एक को ‘हार गई’ कहने वाली यह भयानक साज़िश थी, जो इकाई के चाँद सूर्य को हमेशा के लिए एक ग्रहण लगा गई...

और आज हमारी दुनिया मासूम खेलों के मुक़ाबले से लेकर भयानक युद्धों के मुक़ाबले तक ग्रहणित है...

पर इस समय मैं ज़हनी क़ाबलियत के चाँद सूर्य को लगे हुए ग्रहण की बात करूँगी, जिसे सदियों से ‘शास्त्रार्थ’ का नाम दिया जा रहा है।

अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने के लिए नहीं होते हैं। वे तो एक मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति को, दूसरी मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति में मिलाने के लिए होते हैं, ताकि हमारी प्राप्तियाँ बड़ी हो जाएँ...

अदबी मुलाक़ातें दो नदियों के संगम हो सकते हैं, पर एक भयानक साज़िश थी कि वे शास्त्रार्थ हो गए...

ज्ञान की नदियों को एक-दूसरे में समाना था, और एक महासागर बनना था, पर जब उनके बहाव के सामने हार-जीत के बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, तो वे नदियाँ सूखने लगीं... नदियों की आत्मा सूखने लगी...

जीत अभिमानित हो गई, और हार क्रोधित हो गई...
अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है, और क्रोध भी एक भयानक अग्नि है, जो हर प्राप्ति को राख कर देता है...शक्ति कणों की लीला से अमृता की लिखी कुछ पंक्तियाँ ....

7 comments:

सूत्रधार said...

आपके उत्‍कृष्‍ठ लेखन का आभार ।

सदा said...

अमृता जी को पढ़ना उसी तरह सुखद है जिसतरह आपका यह सराहनीय प्रयास ...

रश्मि प्रभा... said...

सोच की इकाई को तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी...!!! यही सोचा है मैंने भी अक्सर

वाणी गीत said...

अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है.
जीत अभिमानित हो गयी , हार क्रोधित हो गयी !
अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने के लिए नहीं होते हैं।

हर रिश्ते का प्यार तभी संभलता है !
अमृता के शब्दों के साथ आपके प्रस्तुतीकरण का आभार !

शारदा अरोरा said...

padhvane ka shukriya ...Amrita ji ko padh kar thodi der man nistabdh sa ho jata hai.

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर सार्थक प्रस्तुति। धन्यवाद।

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

सुंदर एवं सार्थक..

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..की-बोर्ड वाली औरतें।