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Monday, August 5, 2013

मर्द ने अपनी पहचान मैं लफ़्ज़ में पानी होती है, औरत ने मेरी लफ़्ज़ में...
‘मैं’ शब्द में ‘स्वयं’ का दीदार होता है, और ‘मेरा’ शब्द ‘प्यार’ के धागों में लिपटा हुआ होता है...

लेकिन अंतर मन की यात्रा रुक जाए तो मैं लफ़्ज़ महज अहंकार हो जाता है और मेरा लफ़्ज़ उदासीनता। उस समय स्त्री वस्तु हो जाती है, और पुरुष वस्तु का मालिक।
मालिक होना उदासीनता नहीं जानता, लेकिन मलकियत उसकी वेदना जानती है।

रजनीश जी के लफ़्ज़ों में ‘‘वेदना का अनुवाद दुनिया की किसी भाषा में नहीं हो सकता। इसका एक अर्थ ‘पीड़ा’ होता है, पर दूसरा अर्थ ‘ज्ञान’ होता है। यह मूल धातु ‘वेद’ से बना है, जिस से विद्वान बनता है—ज्ञान को जानने वाला। वेदना का अर्थ हो जाता है —जो दुख के ज्ञान को जानता है।’’ सो इस वेदना के पहलू से कुछ उन गीतों को देखना होगा, जो धरती की और मन की मिट्टी से पनपते हैं।

लोकगीत बहुत व्यापक दुख से जन्म लेता है, वह उस हकीकत की ज़मीन पर पैर रखता है, जो बहुत व्यापक रूप में एक हकीकत बन चुकी होती है।
इसी तरह कहावतें भी ऐसे संस्कारों से बनती हैं, जि पर्त दर पर्त बहुत कुछ अपने में लपेट कर रखती हैं। जैसे कभी बंगाल में कहावत थी—‘‘जो औरत पढ़ना लिखना सीखती है, वह दूसरे जन्म में वेश्या होकर जन्म लेती है।’’*

हमारे देश की अलग-अलग भाषाओं के होठों पर ऐसी कितनी कहावतें और गीत सुलगते हैं। आम स्त्री की हालत का अनुमान कुछ उन्हीं से लगाना होगा...

अमृता प्रीतम की इस कृति दीवारों के साए से यह पंक्तियाँ जिस में  संसार में नारी की स्थिति, पीड़ा, विडम्बना और विसंगतियों को मुखर किया गया है। इसमें वास्तविक नारी चरित्रों पर लिखी अनेक कहानियां भी हैं। जिनमें अमृता ने  समाज की और मन की दीवारों से आरंभ करके कारागार की दीवारों तक इन सभी में बंद स्त्री-पुरुषों का मार्मिक चित्रण किया है। 

Thursday, July 18, 2013

अमृता जब छोटी-सी थी, तब सांझ घिरने लगती, तो वह खिड़की के पास खड़ी-कांपते होठों से कई बार कहती-अमृता ! मेरे पास आओ।
शायद इसलिए कि खिड़की में से जो आसमान सामने दिखाई देता, देखती कि कितने ही पंछी उड़ते हुए कहीं जा रहे होते...ज़रूर घरों को-अपने-अपने घोंसलों को लौट रहे होते होंगे...और उनके होठों से बार-बार निकलता-अमृता, मेरे पास आओ ! लगता, मन का पंछी जो उड़ता-उड़ता जाने कहां खो गया है, अब सांझ पड़े उसे लौटना चाहिए...अपने घर-अपने घोसले में मेरे पास... अमृता के शब्दों में "वहीं खिड़की में खड़े-खड़े तब एक नज़्म कही थी-कागज़ पर भी उतार ली होगी, पर वह कागज़ जाने कहां खो गया, याद नहीं आता...लेकिन उसकी एक पंक्ति जो मेरे ओठों पर जम-सी गई थी-वह आज भी मेरी याद में है। वह थी-‘सांझ घिरने लगी, सब पंछी घरों को लौटने लगे, मन रे ! तू भी लौट कर उड़ जा ! कभी यह सब याद आता है-तो सोचती हूं-इतनी छोटी थी, लेकिन यह कैसे हुआ-कि मुझे अपने अंदर एक अमृता वह लगती-जो एक पंछी की तरह कहीं आसमान में भटक रही होती और एक अमृता वह जो शांत वहीं खड़ी रहती थी और कहती थी-अमृता ! मेरे पास आओ !
अब कह सकती हूं-ज़िंदगी के आने वाले कई ऐसे वक़्तों का वह एक संकेत था-कि एक अमृता जब दुनिया वालों के हाथों परेशान होगी, उस समय उसे अपने पास बुलाकर गले से लगाने वाली भी एक अमृता होगी-जो कहती होगी-अमृता, मेरे पास आओ !"

बरसों की राहें चीर कर
तेरी आवाज़ आयी है
सस्सी के पैरों को जैसे
किसी ने मरहम लगाई है...

आज किसी के सिर से
जैसे हुमा गुज़र गया
चाँद ने रात के बालों में
जैसे फूल टाँक दिया

नींद के होठों से जैसे
सपने की महक आती है
पहली किरण रात की
जब माँग में सिन्दूर भरती है...


Thursday, June 6, 2013


अमृता की कुछ बातें उनके कागज और अक्षर किताब से ........

नज़्म, कहानी या नावल,  एक माध्यम है, बात को कहने का। अमृता का  एक नावल था ‘दिल्ली की गलिया’ जिसका किरदार नासिर एक मुसव्विर है, और एक अखबार के लिए कार्टून भी बनाता है। उसी के एक कार्टून में, अंग्रेज़ी का एक प्रोफेसर अपने विद्यार्थियों से पूछता है, ‘आजकल कौन-सा लफ़्ज आम जिंदगी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है ?’’ तो एक गंभीर विद्यार्थी उठकर कहता है, ‘‘सह ! यह ‘ऐंटी’ लफ़्ज है, क्योंकि आजकल लोग ऐंटी मैरिट होते जा रहे हैं, ऐंटी विमैन, ऐंटी माईंड।’’बोधी गुंपा की तरफ से जब किसी कुसूरवार को सजा दी जाती है, तो वह पत्थरों पर, महात्माबुद्ध के श्लोक अंकित करने की सजा होती है। वह कितने दिन, कितने महीने या कितने साल हाथ में हथौड़ा-छेनी लेकर, पत्थरों पर वह श्लोक अंकित करता रहेगा उसके कसूर की गंभीरता से तय होता है।

मुझे लगता है मुहब्बत ने अपने सुनहरी गुंपा में बैठकर, बोधी गुंपा की तरह, मेरे लिए भी यही सज़ा सुना दी  और शायद मेरे तसव्वुर में मेरी मुहब्बत का कसूर बहुत बड़ा है, संगीन जुर्म, इसलिए पूरी जिन्दगी के लिए यह सज़ा मुझे दी गई, और मैं तमाम ज़िंदगी हाथ में कलम लेकर, कागज़ों पर वही लिखती रही जो मेरे चिंतन का और मेरे तरवैयुत का फरमान था....
अपने तरवैयुत से मेरी मुहब्बत का रिश्ता क्या है ? उसी की बात कहने के लिए कुछ पंक्तियाँ सामने आती हैं—
हमारे देश की तकसीम के वक्त बहुत कुछ भयानक हुआ। मेरे उपन्यास ‘डाक्टर देव’ के किरदार को जब ज़ख्मी लोगों की महरम पट्टी के लिए बुलाया जाता है तो वह तड़प कर कहता है, ‘‘मनु ! कौन–सा मुंह लेकर उन जख्मियों के पास जाऊं ? वे कहेंगे—आज इन्सान हमें पट्टी बांधने  के लिए आया है, इनकी मरहम पट्टी तब कहां थी, जब रास्ता चलते, इसने पीछे से हमारी पीठ पर छुरा घोंप दिया था ? कातिल का चेहरा भी तो मेरे चेहरे जैसा रहा होगा.....’’

इसी तरह ‘पिंजर’ नावल की पूरो, दो मज़हबों की टक्कर में टूट जाती है। लेकिन जानती है कि नफरत के दाग को, नफरत के पानी से नहीं धोया जा सकता, और जब दोनों देशों की अगवाशुदा लड़कियां, अपने-अपने देश को लौटाई जाती हैं, तो पूरो कहती है, ‘‘चाहे कोई लड़की हिन्दू हो या मुसलमान जो भी अपने ठिकाने पर पहुँच रही है, उसी के साथ मेरी आत्मा भी ठिकाने पर पहुंच रही है....’’औरत की पाकीज़गी का ताल्लुक, समाज ने कभी भी, औरत के मन की अवस्था से नहीं पहचाना, हमेशा उसके तन से जोड़ दिया। इसी दर्द को लेकर मेरे ‘एरियल’ नावल की किरदार ऐनी के अलफाज़ हैं, ‘‘मुहब्बत और वफा ऐसी चीज़ें नहीं है, जो किसी बेगाना बदन के छूते ही खत्म हो जाएं। हो सकता है—पराए बदन से गुज़र कर वह और मज़बूत हो जाएं जिस तरह इन्सान मुश्किलों से गुज़र कर और मज़बूत हो जाता है.....’’
औरत और मर्द का रिश्ता और क्या हो सकता था, मैं इसी बात को कहना चाहती थी कि एक कहानी लिखी, ‘मलिका’। मलिका जब बीमार है, सरकारी अस्पताल में जाती है, तो कागज़ी कार्रवाई पूरी करने के लिए डाक्टर पूछता है तुम्हारी उम्र क्या होगी ?

मलिका कहती है, ‘‘वही, जब इन्सान हर चीज के बारे में सोचना शुरू करता है, और फिर सोचता ही चला जाता है.....’’
डाक्टर पूछता है, ‘‘तुम्हारे मालिक का नाम ?’’
मलिका कहती है, ‘‘ मैं घड़ी या साइकिल नहीं, जो मेरा मालिक हो, मैं औरत हूं....’’
डाक्टर घबराकर कहता है, ‘‘मेरा मतलब है—तुम्हारे पति का नाम ?’’
मलिका जवाब देती है, ‘‘मैं बेरोज़गार हूं।’’
डाक्टर हैरान–सा कहता है, ‘‘भई, मैं नौकरी के बारे में नहीं पूछ रहा...’’
तो मलिका जवाब देती है, ‘‘वही तो कह रही हूं। मेरा मतलब है किसी की बीवी नहीं लगी हुई’’, और कहती है, ‘‘हर इन्सान किसी-न-किसी काम पर लगा हुआ होता है, जैसे आप डाक्टर लगे हुए हैं, यह पास खड़ी हुई बीबी नर्स लगी हुई है। आपके दरवाजे के बाहर खड़ा हुआ आदमी चपरासी लगा हुआ है।

इसी तरह लोग जब ब्याह करते हैं—जो मर्द शाविंद लग जाते हैं, और औरतें बीवियां लग जाती हैं...’’
समाज की व्यवस्था में किस तरह इन्सान का वजूद खोता जाता है, मैं यही कहना चाहती थी, जिसके लिए मलिका का किरदार पेश किया। जड़ हो चुके रिश्तों की बात करते हुए, मलिका कहती है, ‘‘क्यों डाक्टर साहब, यह ठीक नहीं ? कितने ही पेशे हैं—कि लोग तरक्की करते हैं, जैसे आज जो मेजर है, कल को कर्नल बन जाता है, फिर ब्रिगेडियर, और फिर जनरल। लेकिन इस शादी-ब्याह के पेशे में कभी तरक्की नहीं होती। बीवियां जिंदगी भर बीवियां लगी रहती है, और खाविंद ज़िंदगी भर खाविंद लगे रहते हैं....’’

उस वक्त डाक्टर पूछता है, ‘इसकी तरक्की हो तो क्या तरक्की हो ?’’
तब मलिका जवाब देती है, ‘‘डाक्टर साहब हो तो सकती है, पर मैंने कभी होते हुए देखी नहीं। यही कि आज जो इन्सान शाविंद लगा हुआ है, वह कल को महबूब हो जाए, और कल जो महबूब बने वह परसों खुदा हो जाए....’’
इसी तरह-समाज, मजहब और रियासत को लेकर वक्त के सवालात बढ़ते गए, तो मैंने नावल लिखा, ‘यह सच है’ इस नावल के किरदार का कोई नाम नहीं, वह इन्सान के चिन्तन का प्रतीक है, इसलिए वह अपने वर्तमान को पहचानने की कोशिश करता है, और इसी कोशिश में वह हज़ारों साल पीछे जाकर—इतिहास की कितनी ही घटनाओं में खुद को पहचानने का यत्न करता है—

उसे पुरानी घटना याद आई, जब वह पांच पांडवों में से एक था, और वे सब द्रौपदी को साथ लेकर वनों में विचर रहे थे। बहुत प्यास लगी तो युधिष्ठीर ने कहा था, ‘जाओ नकुल पानी का स्रोत तलाश करो !’’
जब उसने पानी का स्रोत खोज लिया था, तो किनारे पर उगे हुए पेड़ से आवाज़ आई थी, ‘‘हे नकुल ! मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए बिना पानी मत पीना, नहीं तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी’’—लेकिन उसने आवाज़ की तरफ ध्यान नहीं दिया, और जैसे ही सूखे हुए हलक से पानी की ओक लगाई, वह मूर्च्छित होकर वहीं गिर गया था....

और मेरे नावल का किरदार, जैसे ही पानी का गिलास पीना चाहती है, यह आवाज़ उसके मस्तक से टकरा जाती है, ‘‘हे आज के इन्सान ! मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए बिना गिलास का पानी मत पीना....’’
और उसे लगता है—वह जन्म-जन्म से नकुल है, और उसे मूर्च्छित होने का शाप लगा हुआ है...वह कभी भी तो वक्त के सवालों का जवाब नहीं दे पाया...

इसी नावल में उसे याद आता है, ‘‘मैंने एक बार जुआ खेला था। सारा धन, हीरे, मोती दांव पर लगा दिए थे, और मैं हार गया था मैंने अपनी पत्नी भी दांव पर लगा दी थी...’’
और हवा में खड़ी हुई आवाज़ उससे पूछती है, ‘‘मैं दुर्योधन की सभा में खड़ी हुई द्रौपदी हूं, पूछना चाहती हूं—कि युधिष्ठिर जब अपने आपको हार चुके, तो मुझे दांव पर लगाने का उन्हें क्या अधिकार था ?’’
मैं इस सवाल के माध्यम से कहना चाहती हूं, कि जब इन्सान अपने आपको दांव पर लगा चुका, और हार चुका है—तो समाज के नाम पर दूसरे इन्सानों को मजहब के नाम पर खुदा की मखलूक को, और रियासत के नाम पर अपने-अपने देश के वर्तमान भविष्य को दांव पर लगाने का उसे क्या अधिकार है ?

इन्सान जो है, और इन्सान जो हो सकता है—यही फासला ज़हनी तौर पर मैंने जितना भी तय किया, उसी की बात ज़िंदगी भर कहती रही....बहुत निजी अहसास को कितनी ही नज़्मों के माध्यम से कहना चाहा—
हथेलियों पर इश्क की मेंहदी का कुछ दावा नहीं
हिज्र का एक रंग है, खुशबू तेरे जिक्र की....
एक दर्द, एक ज़ख्म एक कसक दिल के पास थी
रात को सितारों की रकम—उसे ज़रब दे गई...

और वक्त-वक्त पर जितने भी सवालात पैदा होते रहे—उसी दर्द का जायज़ा लेते हुए कितनी ही नज़्में कहीं—
गंगाजल से लेकर, वोडका तक—यह सफरनामा है मेरी प्यास का...
सादा पवित्र जन्म के सादा अपवित्र कर्म का—सादा इलाज....
किसी महबूब के चेहरे को—एक छलकते हुए गिलास में देखने का यत्न....
और अपने बदन पर—बिलकुल बेगाना ज़ख्म को भूलने की ज़रूरत...
यह कितने तिकोन पत्थर हैं

जो किसी पानी की घूंट से—मैंने गले में उतारे हैं
कितने भविष्य हैं—जो वर्तमान से बचाए हैं
और शायद वर्तमान भी—वर्तमान से बचाया है....
इलहाम के धुएं से लेकर, सिगरेट की राख तक....
हर मज़हब बौराए
हर फलसफा लंगड़ाए
हर नज़्म तुतलाए—
और कहना-सा चाहे—

कि हर सल्तनत के सिक्के की होती है, बारूदी की होती है
और हर जन्मपत्री—आदम की जन्म की एक झूठी गवाही देती है...
बहुत दिनों से सोच रही थी-
रसीदी टिकट का कायाकल्प कर दूं
कई घटनाएं जब घट रही होती हैं ?
अभी-अभी लगे ज़ख्मों-सी
तब उनकी कोई कसक अक्षरों में उतर जाती है....
लेकिन वक़्त पा कर अहसास होता है कि ये बातें
लम्बे समय के लिए साहित्य को कुछ नहीं दे पाएंगी.
ये वक़्ती आंधिया होती हैं
इसलिए कई बातें इस तरह लगने लगीं,
जो मेरी अपनी नज़र में-
अपनी उम्र बिता चुकी हैं-
इस नज़र सानी से-
‘रसीदी टिकट’ के चिंतन में कोई कमी नहीं आई,
बल्कि कई और बातें, जो स्मरण हो आईं,
उसके साथ-साथ चल दी हैं....

Wednesday, September 26, 2012

अंगूरी, मेरे पड़ोसियों के पड़ोसियों के पड़ोसियों के घर, उनके बड़े ही पुराने नौकर की बिलकुल नयी बीवी है। एक तो नयी इस बात से कि वह अपने पति की दूसरी बीवी है, सो उसका पति ‘दुहाजू’ हुआ। जू का मतलब अगर ‘जून’ हो तो इसका मतलब  निकला ‘दूसरी जून में पड़ा चुका आदमी’, यानी दूसरे विवाह की जून में, और अंगूरी क्योंकि अभी विवाह की पहली जून में ही है, यानी पहली विवाह की जून में, इसलिए नयी हुई। और दूसरे वह इस बात से भी नयी है कि उसका गौना आए अभी जितने महीने हुए हैं, वे सारे महीने मिलकर भी एक साल नहीं बनेंगे।

पाँच-छह साल हुए, प्रभाती जब अपने मालिकों से छुट्टी लेकर अपनी पहली पत्नी की ‘किरिया’ करने के लिए गाँव गया था, तो कहते हैं कि किरियावाले दिन इस अंगूरी के बाप ने उसका अंगोछा निचोड़ दिया था। किसी भी मर्द का यह अँगोछा भले ही पत्नी की मौत पर आंसुओं से नहीं भीगा होता, चौथे दिन या किरिया के दिन नहाकर बदन पोंछने के बाद वह अँगोछा पानी से ही भीगा होता है, इस पर साधारण-सी गाँव की रस्म से किसी और लड़की का बाप उठकर जब यह अँगोछा निचोड़ देता है तो जैसे कह रहा होता है—‘‘उस मरनेवाली की जगह मैं तुम्हें अपनी बेटी देता हूँ और अब तुम्हें रोने की ज़रूरत नहीं, मैंने तुम्हारा आँसुओं भीगा हुआ अँगोछा भी सुखा दिया है।’’

इस तरह प्रभाती का इस अंगूरी के साथ दूसरा विवाह हो गया था। पर एक तो अंगूरी अभी आयु की बहुत छोटी थी, और दूसरे अंगूरी की माँ गठिया के रोग से जुड़ी हुई थी इसलिए भी गौने की बात पाँच सालों पर जा पड़ी थी।...फिर एक-एक कर पाँच साल भी निकल गये थे। और इस साल जब प्रभाती अपने मालिकों से छु्ट्टी लेकर अपने गाँव गौना लेने गया था तो अपने मालिकों को पहले ही कह गया था कि या तो वह बहू को भी साथ लाएगा और शहर में अपने साथ रखेगा, या फिर वह भी गांव से नहीं लौटेगा। मालिक पहले तो दलील करने लगे थे कि एक प्रभाती की जगह अपनी रसोई में से वे दो जनों की रोटी नहीं देना चाहते थे। पर जब प्रभाती ने यह बात कही कि वह कोठरी के पीछेवाले कच्ची जगह को पोतकर अपना चूल्हा बनाएगी, अपना पकाएगी, अपना खाएगी तो उसके मालिक यह बात मान गये थे। सो अंगूरी शहर आ गयी थी। चाहे अंगूरी ने शहर आकर कुछ दिन मुहल्ले के मर्दों से तो क्या औरतों से भी घूँघट न उठाया था, पर फिर धीरे-धीरे उसका घूँघट झीना हो गया था। वह पैरों में चाँदी के झाँझरें पहनकर छनक-छनक करती मुहल्ले की रौनक बन गयी थी। एक झाँजर उसके पाँवों में पहनी होती, एक उसकी हँसी में। चाहे वह दिन के अधिकरतर हिस्सा अपनी कोठरी में ही रहती थी पर जब भी बाहर निकलती, एक रौनक़ उसके पाँवों के साथ-साथ चलती थी।

‘‘यह क्या पहना है,  अंगूरी ?’’
‘‘यह तो मेरे पैरों की छैल चूड़ी है।’’
‘‘और यह उँगलियों में ?’’
‘‘यह तो बिछुआ है।’’
‘‘और यह बाहों में ?’’
‘‘यह तो पछेला है।’’
‘‘और माथे पर ?’’
‘‘आलीबन्द कहते हैं इसे।’’
‘‘आज तुमने कमर में कुछ नहीं पहना ?’’

‘‘तगड़ी बहुत भारी लगती है, कल को पहनूंगी। आज तो मैंने तौक भी नहीं पहना। उसका टाँका टूट गया है कल शहर में जाऊँगी, टाँका भी गढ़ाऊँगी और नाक कील भी लाऊँगी। मेरी नाक को नकसा भी था, इत्ता बड़ा, मेरी सास ने दिया नहीं।’’
इस तरह अंगूरी अपने चाँदी के गहने एक नख़रे से पहनती थी, एक नखरे से दिखाती थी।

पीछे जब मौसम फिरा था, अंगूरी का अपनी छोटी कोठरी में दम घुटने लगा था। वह बहुत बार मेरे घर के सामने आ बैठती थी। मेरे घर के आगे नीम के बड़े-बड़े पेड़ हैं, और इन पेड़ों के पास ज़रा ऊँची जगह पर एक पुराना कुआँ है। चाहे मुहल्ले का कोई भी आदमी इस कुएँ से पानी नहीं भरता, पर इसके पार एक सरकारी सड़क बन रही है और उस सड़क के मज़दूर कई बार इस कुएँ को चला लेते हैं जिससे कुएँ के गिर्द अकसर पानी गिरा होता है और यह जगह बड़ी ठण्डी रहती है।


‘‘क्या पढ़ती हो बीबीजी ?’’ एक दिन अंगूरी जब आयी, मैं नीम के पेड़ों के नीचे बैठकर एक किताब पढ़ रही थी ।
‘‘तुम पढ़ोगी ?’’
‘‘मेरे को पढ़ना नहीं आता।’’
‘‘सीख लो।’’
‘‘ना।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘औरतों को पाप लगता है पढ़ने से।’’
‘‘औरतों को पाप लगता है, मर्द को नहीं लगता ?’’
‘‘ना, मर्द को नहीं लगता ?’’
‘‘यह तुम्हें किसने कहा है ?’
‘‘मैं जानती हूँ।’’
फिर तो मैं पढ़ती हूँ मुझे पाप लगेगा ?’’
‘‘सहर की औरत को पाप नहीं लगता, गांव की औरत को पाप लगता है।’’

मैं भी हँस पड़ी और अंगूरी भी। अंगूरी ने जो कुछ सीखा-सुना हुआ था, उसमें कोई शंका नहीं थी, इसलिए मैंने उससे कुछ न कहा। वह अगर हँसती-खेलती अपनी जिन्दगी के दायरे में सुखी रह सकती थी, तो उसके लिए यही ठीक था। वैसे मैं अंगूरी के मुँह की ओर ध्यान लगाकर देखती रही। गहरे साँवले रंग में उसके बदन का मांस गुथा हुआ था। कहते हैं—औरत आंटे की लोई होती है। पर कइयों के बदन का मांस उस ढीले आटे की तरह होता है जिसकी रोटी कभी भी गोल नहीं बनती, और कइयों के बदन का मांस बिलकुल ख़मीरे आटे जैसा, जिसे बेलने से फैलाया नहीं जा सकता। सिर्फ़ किसी-किसी के बदन का मांस इतना सख़्त गुँथा होता है कि रोटी तो क्या चाहे पूरियाँ बेल लो।...मैं अंगूरी के मुँह की ओर देखती रही, अंगूरी की छाती की ओर, अंगूरी की पिण्डलियों की ओर .....वह इतने सख़्त मैदे की तरह गुथी हुई थी कि जिससे मठरियाँ तली जा सकती थीं और मैंने इस अंगूरी का प्रभाती भी देखा हुआ था, ठिगने क़द का, ढलके हुए मुँह का, कसोरे जैसा और फिर अंगूरी के रूप की ओर देखकर उसके ख़ाविन्द के बारे में एक अजीब तुलना सूझी कि प्रभाती असल में आंटे की इस घनी गुथी लोई को पकाकर खाने का हक़दार नहीं—वह इस लोई की ढककर रखने वाला कठवत है।....इस तुलना से मुझे खुद ही हंसी आ गई। पर मैंने अंगूरी को इस तुलना का आभास नहीं होने देना चाहती थी। इसलिए उससे मैं उसके गाँव की छोटी-छोटी बातें करने लगी।

माँ-बाप की, बहन-भाइयों की, और खेतों-खलिहानों की बातें करते हुए मैंने उससे पूछा, ‘‘अंगूरी, तुम्हारे गांव में शादी कैसे होती है ?’’
‘‘लड़की छोटी-सी होती है। पाँच-सात साल की, जब वह किसी के पाँव पूज लेती है।’’
‘‘कैसे पूजती है पाँव ?’’
‘‘लड़की का बाप जाता है, फूलों की एक थाली ले जाता है, साथ में रुपये, और लड़के के आगे रख देता है।’’
‘‘यह तो एक तरह से बाप ने पाँव पूज लिये। लड़की ने कैसे पूजे ?’’
‘‘लड़की की तरफ़ से तो पूजे।’’
‘‘पर लड़की ने तो उसे देखा भी नहीं ?’’
‘‘लड़कियाँ नहीं देखतीं।’’
‘‘लड़कियाँ अपने होने वाला ख़ाविन्द को नहीं देखतीं।’’
‘‘ना।’’
‘‘कोई भी लड़की नहीं देखती ?’’
‘‘ना।’’

पहले तो अंगूरी ने ‘ना’ कर दी पर फिर कुछ सोच-सोचकर कहने लगी, ‘‘जो लड़कियाँ प्रेम करती हैं, वे देखती हैं।’’
‘‘तुम्हारे गाँव में लड़कियाँ प्रेम करती हैं ?’’
‘‘कोई-कोई।’’
‘‘जो प्रेम करती हैं, उनको पाप नहीं लगता ?’’ मुझे असल में अंगूरी की वह बात स्मरण हो आयी थी कि औरत को पढ़ने से पाप लगता है। इसलिए मैंने सोचा कि उस हिसाब से प्रेम करने से भी पाप लगता होगा।
‘‘पाप लगता है, बड़ा पाप लगता है।’’ अंगूरी ने जल्दी से कहा।
‘‘अगर पाप लगता है तो फिर वे क्यों प्रेम करती हैं ?’’
‘‘जे तो...बात यह होती है कि कोई आदमी जब किसी की छोकरी को कुछ खिला देता है तो वह उससे प्रेम करने लग जाती है।’’

‘‘कोई क्या खिला देता है उसको ?’’
‘‘एक जंगली बूटी होती है। बस वही पान में डालकर या मिठाई में डाल कर खिला देता है। छोकरी उससे प्रेम करने लग जाती है। फिर उसे वही अच्छा लगता है, दुनिया का और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।’’
‘‘सच ?’’
‘‘मैं जानती हूँ, मैंने अपनी आँखों से देखा है।’’
‘‘किसे देखा था ?’’
‘‘मेरी एक सखी थी। इत्ती बड़ी थी मेरे से।’’
‘‘फिर ?’’

‘‘फिर क्या ? वह तो पागल हो गयी उसके पीछे। सहर चली गयी उसके साथ।’’
‘‘यह तुम्हें कैसे मालूम है कि तेरी सखी को उसने बूटी खिलायी थी ?’’
‘‘बरफी में डालकर खिलायी थी। और नहीं तो क्या, वह ऐसे ही अपने माँ-बाप को छोड़कर चली जाती ? वह उसको बहुत चीज़ें लाकर देता था। सहर से धोती लाता था, चूड़ियाँ भी लाता था शीशे की, और मोतियों की माला भी।’’
‘‘ये तो चीज़ें हुईं न ! पर यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि उसने जंगली बूटी खिलायी थी !’’
‘‘नहीं खिलायी थी तो फिर वह उसको प्रेम क्यों करने लग गयी ?’’
‘‘प्रेम तो यों भी हो जाता है।’’
‘‘नहीं, ऐसे नहीं होता। जिससे माँ-बाप बुरा मान जाएँ, भला उससे प्रेम कैसे हो सकता है ?’’
‘‘तूने वह जंगली बूटी देखी है ?’’

‘‘मैंने नहीं देखी। वो तो बड़ी दूर से लाते हैं। फिर छिपाकर मिठाई में डाल देते हैं, या पान में डाल देते हैं। मेरी माँ ने तो पहले ही बता दिया था कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खाना।’’
‘‘तूने बहुत अच्छा किया कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खायी। पर तेरी उस सखी ने कैसे खा ली ?’’
‘‘अपना किया पाएगी।’’
‘‘किया पाएगी।’’ कहने को तो अंगूरी ने कह दिया पर फिर शायद उसे सहेली का स्नेह याद आ गया या तरस आ गया, दुखे मन से कहने लगी, ‘‘बावरी हो गयी थी बेचारी ! बालों में कंघी भी नहीं लगाती थी। रात को उठ-उठकर गाती थी।’’
‘‘क्या गाती थी ?’’

‘‘पता नहीं, क्या गाती थी। जो कोई जड़ी बूटी खा लेती है, बहुत गाती है। रोती भी बहुत है।’’
बात गाने से रोने पर आ पहुँची थी। इसलिए मैंने अंगूरी से और कुछ न पूछा।
और अब थोड़े ही दिनों की बात है। एक दिन अंगूरी नीम के पेड़ के नीचे चुपचाप मेरे पास आ खड़ी हुई। पहले जब अंगूरी आया करती थी तो छन-छन करती, बीस गज़ दूर से ही उसके आने की आवाज़ सुनाई दे जाती थी, पर आज उसके पैरों की झाँझरें पता नहीं कहाँ खोयी हुई थीं। मैंने किताब से सिर उठाया और पूछा, ‘‘क्या बात है, अंगूरी ?’’
अंगूरी पहले कितनी ही देर मेरी ओर देखती रही और फिर धीरे से बोली मुझे पढना सीखा दो बीबी जी !!..और चुप चाप फिर मेरी आँखों में देखने लगी .....
लगता है इसने भी जंगली बूटी खा ली ...........
क्यूँ अब तुम्हे पाप नहीं लगेगा अंगूरी ...यह दोपहर की बात थी शाम को जब मैं बाहर आई तो वह वही नीम के पेड के नीचे बैठी थी और उसके होंठो पर गीत था पर बिलकुल सिसकी जैसा ......मेरी मुंदरी में लागो नागीन्वा ,हो बैरी कैसे काटूँ जोबनावा ..अंगूरी ने मेरे पैरों की आहत सुन ली और चुप हो गयी ..
तुम तो बहुत मीठा गाती हो ..आगे सुनाओ न गा कर...
अंगूरी ने आपने कांपते आंसू वही पलकों में रोक लिए और उदास लफ़्ज़ों में बोली मुझे गाना नहीं आता है 
आता तो है ..
यह तो मेरी सखी गाती थी उसी से सुना था ..
अच्छा मुझे भी सुनाओ पूरा ..

ऐसे ही गिनती है बरस की ..चार महीने ठंडी होती है ,चार महीने गर्मी और चार महीने बरखा ..और उसने बारह महीने का हिसाब ऐसे गिना दिया जैसे वह अपनी उँगलियों पर कुछ गिन रही हो ...
अंगूरी ?
और वह एक टक मेरे चेहरे की तरफ देखने लगी ..मन मैं आया की पूछूँ की कहीं तुमने जंगली बूटी तो नहीं खा ली है ...पर पूछा की तुमने रोटी खायी ..?

अभी नहीं
सवेरे बनायी थी ? चाय पी तुने ?
चाय ? आज तो दूध ही नहीं लिया
क्यों नहीं लिया दूध ?
दूध तो वह रामतारा ............."
वह हमारे मोहल्ले का चौकीदार था ,पहले वह हम से चाय ले कर पीता था पर जब से अंगूरी आई थी वह सवेरे कहीं से दूध ले आता था अंगूरी के चूल्हे पर गर्म कर के चाय बनाता और अंगूरी ,प्रभाती और रामतारा तीनो मिल कर चाय पीते ..और तभी याद आया की रामतारा तो तीन दिन से अपने गांव गया हुआ है ....

मुझे दुखी हुई हंसी आई और कहा की क्या तुने तीन दिन से चाय नही पी है ?
न और रोटी भी नहीं खायी है .न ..
अंगूरी से कुछ बोला न गया ..बस आँखों में उदासी भरे वही खड़ी रही ..
मेरी आँखों के सामने रामतारे की आकृति घूम गयी ....बड़े फुर्तीले हाथ पांव ,अच्छा बोलने ,पहनने का सलीका था ..........
अंगूरी ...कहीं जंगली बूटी तो नहीं खा ली तुने ?
अंगूरी के आंसू बह निकले और गीले अक्षरों से बोली मैंने तो सिर्फ चाय पी थी ..कसम लगे न कभी उसके हाथ से पान खाया ,न मिठाई ...सिर्फ चाय ...जाने उसने चाय में ही ...और अंगूरी की बाकी आवाज़ आंसुओ में डूब गयी



अमृता प्रीतम के लिखे का यह असाधारण गुण है कि जब वह कविता लिखती हैं तो अपनी अनुभूति की तरलता को ऐसा रूप देती हैं जो गद्य की तरह सहजता से हृदय में उतर जाती है, और जब वह उपन्यास या कहानी लिखती हैं तो भाषा में कविता की लय लहराने लगती है।उनकी यह जंगली बूटी कुछ इस तरह की ही कहानी है जो हर पढने पर एक अलग अंदाज़ से सामने आती है और जंगली बूटी के मायने समझ आने लगते हैं ....

Wednesday, April 18, 2012

एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,
लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं।
सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक है
और चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का।
सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती है
और चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति।
दोनों शक्तियाँ स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक हैं
अन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,
इंसान के भीतर पड़ी पनपती रहती है।
यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती है
और पिता-पितामह के करमों से भी।
हमारे अपने देश में, कई जातियों में
एक बड़ी रहस्यमय बात कही जाती है,
हर बच्चे के जन्म के समय,
कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना।
इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,
किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रिय
से रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती है
और आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती है...
मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथा
बहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मत
की लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए,
पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,
ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियों
से न रूठने का संकेत है।...........

मर्द ने अपनी पहचान मैं लफ़्ज़ में पानी होती है, औरत ने मेरी लफ़्ज़ में...
‘मैं’ शब्द में ‘स्वयं’ का दीदार होता है, और ‘मेरा’ शब्द ‘प्यार’ के धागों में लिपटा हुआ होता है...

लेकिन अंतर मन की यात्रा रुक जाए तो मैं लफ़्ज़ महज अहंकार हो जाता है और मेरा लफ़्ज़ उदासीनता। उस समय स्त्री वस्तु हो जाती है, और पुरुष वस्तु का मालिक।
मालिक होना उदासीनता नहीं जानता, लेकिन मलकियत उसकी वेदना जानती है।

रजनीश जी के लफ़्ज़ों में ‘‘वेदना का अनुवाद दुनिया की किसी भाषा में नहीं हो सकता। इसका एक अर्थ ‘पीड़ा’ होता है, पर दूसरा अर्थ ‘ज्ञान’ होता है। यह मूल धातु ‘वेद’ से बना है, जिस से विद्वान बनता है—ज्ञान को जानने वाला। वेदना का अर्थ हो जाता है —जो दुख के ज्ञान को जानता है।’’ सो इस वेदना के पहलू से कुछ उन गीतों को देखना होगा, जो धरती की और मन की मिट्टी से पनपते हैं।

लोकगीत बहुत व्यापक दुख से जन्म लेता है, वह उस हकीकत की ज़मीन पर पैर रखता है, जो बहुत व्यापक रूप में एक हकीकत बन चुकी होती है।
इसी तरह कहावतें भी ऐसे संस्कारों से बनती हैं, जि पर्त दर पर्त बहुत कुछ अपने में लपेट कर रखती हैं। जैसे कभी बंगाल में कहावत थी—‘‘जो औरत पढ़ना लिखना सीखती है, वह दूसरे जन्म में वेश्या होकर जन्म लेती है।

हमारे देश की अलग-अलग भाषाओं के होठों पर ऐसी कितनी कहावतें और गीत सुलगते हैं। आम स्त्री की हालत का अनुमान कुछ उन्हीं से लगाना होगा...  अमृता के लिखे शब्द उनकी लिखी पुस्तकों से ....

Friday, November 18, 2011

 
कोरे काग़ज़ एक युवा मन की कितनी कातरता, कितनी बेचैनी उसमें उभरकर आयी है इसका अनुमान आप उपन्यास प्रारम्भ करते ही लगा लेगें। चौबीस वर्षीय पंकज को जब यह पता चलता है कि उसकी माँ उसकी माँ नहीं है तब अपनी असली माँ अपने असली बाप को जानने की तड़प उसे दीवानगी की हदों तक ले जाती है।


यह सत्ताईस अक्टूबर का दिन था-माँ की ज़िन्दगी का बचा-खुचा-सा।
माँ की देह में अभी पाँचों तत्त्व जुड़े हुए थे, पर जोड़नेवाले प्राणों के धागें की गाँठ बस खुलने को ही थी। उसने काँपते होठों से पाँच ख़्वाहिशें ज़ाहिर कीं-
शायद एक-एक तत्त्व की एक-एक ख़्वाहिश थी। सबसे पहली ख़्वाहिश कि मैं पीपलवाले मन्दिर में जाकर पण्डित निधि महाराज को बुला लाऊँ। और साथ ही, दूसरी ख़्वाहिश थी कि लौटते हुए ताज़े फूलों का एक हार ख़रीद लाऊँ।

पीपलवाला मन्दिर दूर नहीं, हमारी गली के मोड़ पर है, इसलिए तेज़ क़दमों से जाने में सिर्फ़ तीन मिनट लगे, और लौटते हुए लगभग अस्सी बरस के निधि महाराज को कन्धे का सहारा देकर चलने में लगभग पन्द्रह मिनट। एक फूलवाला मन्दिर के चबूतरे के पास ही बैठकर फूल बेचता है, इसलिए फूलों का हार उतनी देर में ख़रीद लिया, जितनी देर में निधि महाराज ने उठकर पावों में खड़ाऊँ पहनी...
माँ ने प्राणों के धागे की गाँठ शायद कसकर पकड़ी हुई थी। मैं जब वापस आया, माँ की देह के पाँचों तत्व अभी भी जुड़े हुए थे...

निधि महाराज को आसन देकर, मैंने माँ की तरफ़ देखा। मां ने काँपते हुए हाथों से सामने दीवार पर लगी हुई, मेरे पिता की तस्वीर की ओर इशारा किया। मैंने दीवार से तस्वीर उतारी और माँ के बिस्तर पर ले आया।
तस्वीर को छाती के पास टिकाकर, माँ ने सिरहाने की ओर इशारा किया, सिरहाने के नीचे पड़ी हुई चाबी की ओर। और फिर कमरे के कोने में गड़े हुए लकड़ी के सन्दूक़ की ओर।

अब माँ की अगली दो ख़वाहिशें और थीं। यह कि सन्दूक़ में से मैं मौलियों से बँधे हुए काग़ज़ भी निकाल लाऊँ, और किनारीवाला एक दुपट्टा भी।
माँ है सो माँ ही कहूँगा, पर उम्र के लिहाज़ से नानी या दादी भी कह सकता था। हैरानी इसलिए हुई, जब माँ ने वह किनारी जड़ा दुपट्टा अपने सिर पर ओढ़ लिया।
मौलियों में बँधे हुए काग़ज़ उसने एक बार अपने हाथों में भरे, फिर मेरी दोनों हथेलियों पर रख दिये। कहा, ‘‘तुम्हारी अमानत है।’’

उस वक़्त माँ ने नहीं, निधि महाराज ने कहा, ‘‘पंकज बेटा ! यह मकान की वसीयत है। दूसरे काग़ज़ भी ज़रूरी हैं। सँभालकर रखना है।’’ साथ ही, माँ का इशारा पाते ही निधि महाराज ने मेरे सिर पर हाथ रखा, कुछ कहा, कुछ आशीर्वाद जैसा। पर संस्कृत का वह श्लोक मेरी समझ से दूर मात्र मेरे कानों का स्पर्श पाकर रह गया।
फिर माँ ने पतझड़ के पत्तों जैसे हाथों में फूलों का हार थामा और मेरे पिता की तस्वीर पर चढ़ा दिया। फिर निधि महाराज की ओर देख टूटती-सी आवाज़ में कहने लगी, ‘‘आज सत्ताईस तारीख़...आज बृहस्पति तुला में आया है...आज मेरा संजोग है...’’

निधि ने दोनों हाथ आशीष की मुद्रा में ऊपर उठाये।
माँ ने अभी-अभी जब एकटक मेरी ओर देखा था, उसकी देह का स्पन्दन-शायद सारे अंगों में से निकलकर, उसकी आँखों में इकट्ठा हो गया था। पर अब उसकी आँखें बन्द थीं....
अपनी साँस मुझे चलती हुई नहीं, रुकती हुई-सी लगी।
घर की यह कोठरी शायद शान्त समाधि की अवस्था में पहुँच जाती, पर निधि महाराज के संस्कृत के श्लोकों ने सारी कोठरी में एक हलचल-सी पैदा कर दी....

हार के फूलों की सुगन्ध भी एक हलचल की तरह कमरे में फैल रही थी...
माँ के हाथ हिले-नमस्कार की मुद्रा में, और निधि महाराज के पैरों की तरफ़ जा झुके। साथ ही, हाथों में पहनी हुई सोने की दो चूड़ियाँ निधि महाराज के चरणों के पास रख दीं...
माँ के होंठ-चेहरे की झुर्रियों में दो झुर्रियों की तरह ही सिकुड़े हुए थे, पर उनमें से जैसे एक आवाज़ झरी, ‘‘मेरा पंकज मुझे अग्नि देगा...’’

जवाब में निधि महाराज ने श्लोकों की लय को थामकर कहा, ‘‘इच्छा पूरी होगी।’’
लगा-माँ के चेहरे की खिंची हुई झुर्रियाँ शान्त और सहज हो गयी हैं। आवाज़ भी सहज लगी, ‘‘गंगाजल....’’
जानता था-माँ ने आले में गंगाजल का लोटा रख छोड़ा है, मैंने चम्मच से माँ के मुँह में गंगाजल डाला।
होंठों में स्पन्दन-सा हुआ, जो पानी की कुछ बूँदों के साथ शान्त हो गया।
फिर कोई आवाज़ नहीं आयी। यहीं गंगाजल की कुछ बूँदें शायद माँ की पाँचवीं और आख़िरी ख़्वाहिश थी...
और लगा-प्राणों का धागा अब पाँच तत्त्वों को खोल रहा था...

पाँच तत्त्व-अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश हैं, और माँ की पाँच ख़्वाहिशें शायद एक-एक तत्त्व की एक-एक इच्छा की तरह थीं, पर नहीं जान पाया कि कौन-सी ख़्वाहिश कौन-से तत्त्व ने की थी...सिर्फ़ यही जाना कि पाँचों ख़्वाहिशें पूरी हो गयीं थीं, और अब पाँचों तत्त्व खुल-बिखर रहे थे...
निधि महाराज ने घी का एक दीया जलाकर माँ के सिरहाने के पास रख दिया।
बाहरवाले कमरे में अचानक किसी के आने की आहट महसूस हुई, शायद माँ की पड़ोसन रक्खी मौसी आयी थी, और साथ में गली-मोहल्ले का कोई और भी...पर मैं उधर देखता कि तभी दहलीज़ की ओर एक अपरिचित-सी आवाज़ सुनाई दी, ‘‘नमस्कार महाराज !’’

निधि महाराज ने दरवाज़े की ओर देखा, दोनों हाथ उठाकर नमस्कार स्वीकार किया, और आसन से उठकर उस ओर बढ़े....
मैंने अपरिचित आवाज़ वाले को पहचान लिया। दूर के रिश्ते से मेरा चाचा है वह-जनक चाचा। दो गलियों के फ़ासले पर रहता है। पता था कि उन लोगों का हमारे घर आना-जाना नहीं था, तो भी हैरानी नहीं हुई। ऐसे वक़्त शायद उसका आना स्वाभाविक ही था।
पर हैरानी हुई-इस शोक में शरीक होने के लिए आया है चाचा। अन्दर कोठी की तरफ़ नहीं आया वह। दरवाज़े में से ही पीछे बाहर के कमरे की ओर लौटता हुआ, निधि महाराज से कहने लगा, ‘‘पता लगा था कि बचेगी नहीं, इसलिए मैं आपसे बात करने के लिए मन्दिर गया था...’’

निधि महाराज दहलीज़ को लाँघकर बाहर के कमरे में जाकर खड़े हो गये। उन्हीं की आवाज़ आयी, ‘‘कहिए !’’
जवाब में चाचा की आवाज़ सुनाई दी, ‘‘आप वेदों के ज्ञाता हैं महाराज ! आपसे भी कहना होगा ? आप सब जानते हैं।’’
निधि महाराज की मुस्कराहट दिखाई नहीं दी, पर जितनी भी अक्षरों में से दिखाई दे सकती है, वह दिख गयी। कह रहे थे,‘‘यदि सब जानता हूं, तो फिर कुछ कहने की ज़रूरत नहीं ।’’
निधि महाराज ने कुछ न कहने का जैसे आदेश ही दिया था, पर कहनेवाले ने फिर भी कहा, ‘‘बस यही शंका निवृत करनी थी, महाराज ! कि देह को अग्नि देनी होगी, जिसके लिए कुल के बेटे को बुलाने के लिए अभी सन्देश भेजना होगा। आप जानते हैं कि मेरा बेटा शहर में नहीं रहता....’’

निधि महाराज की उम्र अस्सी के क़रीब है, इसलिए उनकी आवाज़ में एक लड़खड़ाहठ-सी रहती है, पर इस वक़्त जो आवाज़ सुनी वह ऊँची नहीं थी, लेकिन बहुत सख़्त थी-
‘‘कुल का बेटा उसके पास खड़ा है, कहीं से बुलाना नहीं पड़ेगा।’’
जवाब में चाचा का स्वर काँप उठा, ‘‘क्या कह रहे हैं महाराज ! क्या पंकज अग्नि देगा ?’’
‘‘हाँ, पंकज अग्नि देगा।’’ निधि महाराज ने जवाब दिया, और साथ ही कहा, ‘‘आप लोग शव-यात्रा में आना चाहें तो ज़रूर आएँ ! मृतक आपके कुल की गृहलक्ष्मी है।’’

‘‘क्या कह रहे हैं महाराज !’’-लगा, चाचा की आवाज़ हकला गयी। कह रहा था, ‘‘यह अधर्म होगा महाराज ! गृहलक्ष्मी को दत्तक पुत्र अग्नि नहीं दिखा सकता....दत्तक पुत्र वंश का नाम धारण कर सकता है, ज़मीन-जायदाद में से हिस्सा ले सकता है, पर अग्नि नहीं दे सकता...’’
‘‘दे सकता है...’’ निधि महाराज का स्वर उठा। शायद उन्हें कुछ और कहना था, पर उनकी बात को काटती-सी चाचा की आवाज़ आयी, ‘‘यह कौन से वेद में लिखा हुआ है, महाराज ?’’
निधि महाराज का स्वर जितना धीमा था, उतना ही सहज और सख़्त भी, ‘‘जिस दिन वेदों के पठन के लिए आओगे, उस दिन बताऊँगा। इस वक़्त जा सकते हो। चार बजे शव-यात्रा के लिए आ जाना।’’

लगा-एक मृत देह के सिरहाने जल रहे दीये की बाती की तरह, मैं भी चुपचाप जल रहा था...
मैं कौन हूँ ? यह दत्तक पुत्र क्या होता है ? माँ ने निधि महाराज को बुलाकर यह क्यों कहा कि पंकज अग्नि देगा ? क्या उसे मालूम था कि कोई चाचा आकर मुझे अग्नि देने से रोकेगा ?
कुछ समझ में नहीं आया-सिर्फ़ यही जान पाया कि कुछ दीये आरती के थाल में रखने के लिए होते हैं, और कुछ दीये सिर्फ़ मरनेवालों के सिरहाने के पास रखने के लिए...
और मैं शायद आरती के थाल में रखा जानेवाला दीया नहीं हूँ...
आज अचानक कोई पाताल-गंगा, धरती पर आकर, मेरे पैरों के आगे बहने लगी है..
लगता है-मेरी उम्र के पूरे चौबीस बरस, मेरे सामने एक-एक करके इस नदी में बहते जा रहे हैं...
आज घर में बहुत-सी आवाज़ें इकट्ठी हो गयी थीं। रक्खी मौसी की आवाज़ भी। मेरे सिर को सलहाकर रोती रही। गली के और जाने किस-किस घर से आये मर्दों की आवाजें भी थीं...पर इस वक़्त तक, साँझ सँवला जाने तक, वे सारी आवाज़ें उस पाताल-गंगा में बहती हुई मुझमें बहुत दूर निकल गयी हैं.....

लेकिन सुबह जो जनक चाचा अग्नि देने का अधिकार लेकर आया था, उसकी आवाज़ फिर नहीं फूटी...शायद पाताल-गंगा के किसी पिछले मोड़ पर ही पानी में गिर गयी थी, मैंने देखी नहीं।
निधि महाराज ने मेरे हाथ से माँ के पार्थिव शरीर को अग्नि दिखायी। उस वक़्त उनकी आवाज़ नहीं काँपी, हाँ मेरा हाथ अवश्य काँप गया था..

लगा-‘माँ’ लफ़्ज़ भी पाताल-गंगा में बह रहा है।
नहीं जानता कि कोई रिश्ता किस तरह पानी में बह सकता है...
आज सन्ध्या-पूजन के बाद निधि महाराज आये थे। उनके अँगोछे में कुछ फल थे, मिठाई भी। मुझे ज़बरदस्ती कुछ खिलाया। बोले-यह मन्दिर का प्रसाद है...
पूछा, ‘‘महाराज ! जो बता सकती थी, वह चौबीस बरस चुप रही। अब हमेशा के लिए चुप हो गयी है। आप बताइए ! वह मेरी कौन थी ?’’

‘‘वह तुम्हारी माँ थी पंकज !’’ निधि महाराज ने मेरे पास बैठकर मेरे सिर पर हाथ रखा।
मैंने कहा, ‘‘जानता हूँ, उसकी पहचान इसी लफ़्ज़ में है। पर आज अचानक मुझसे यह पहचान क्यों छीनी जा रही है ?’’
निधि महाराज हँस दिये। जवाब देने की बजाय पूछने लगे, ‘‘पहचान कौन देता है बेटा ?’’
कहा, ‘‘शायद जन्म ही यह पहचान देता है....’’

कहने लगे, ‘‘अन्तरात्मा यह पहचान देती है। तुम उससे पूछो कि वह तुम्हारी कौन थी ?’’
कहा, ‘‘पर अन्तरात्मा उसी ने बनायी थी। उसी ने यह अक्षर सिखाया। मेरे लिए वह पूर्ण सत्य था, पर आज किसी ने उस पूर्ण सत्य को झूठ क्यों कहना चाहा ?’’
‘‘झूठ, लोभ सिखाता है बेटा ! अन्तरात्मा नहीं सिखाती।’’
‘‘किस चीज़ का लोभ ?’’
‘‘इस मकान का, पैसे का....’’

‘‘पर बात धर्म की हुई थी, पैसे की नहीं....’’
‘‘पैसे का लोभ धर्म की आड़ लेता है...’’
‘‘पर उसने मुझे दत्तक पुत्र कहा था। दत्तक पुत्र क्या होता है ?’’
निधि महाराज जवाब को सवाल में बदलना जानते हैं। कहने लगे, ‘‘पीरों-फ़कीरों ने जिस्म को ख़ुदा का हुजरा कहा है, आत्मा की कोठरी। तुम बताओ, महान कोठरी होती है कि आत्मा ?’’
कहा, ‘‘कोठरी महान होती है, लेकिन आत्मा के कारण।’’

निधि महाराज फिर मुस्कराये। कहने लगे, पुत्र तन की कोठरी से भी जन्म ले सकता है, आत्मा से भी। पर यह दुनिया कोठरी को मान्यता देती है, आत्मा को नहीं। भूल जाती है कि कोठरी, आत्मा के कारण महान होती है...
‘‘मैं निधि महाराज का दर्शन-शास्त्र समझने की अवस्था में नहीं था, इसलिए फिर पूछा, ‘‘क्या मैंने इस माँ की कोख से जन्म नहीं लिया था ?’’

‘‘तुमने उसकी आत्मा से जन्म लिया था..’’
‘‘सो गोद लिये गये पुत्र को दत्तक पुत्र कहते हैं ?’’
‘‘कहने दो, जो कहते हैं...’’
लगा-पाताल गंगा में मैंने अपने बहते हुए रिश्ते को उस लकड़ी की तरह थामा हुआ है जिसके सहारे मैं शायद डूबने से बच सकता हूँ...

पूछा, ‘‘मेरी यह माँ और मेरा यह बाप मुझे कहाँ से लाया था ?’’
निधि महाराज क्षण-भर के लिए अन्तर्धान हो गये, फिर कहने लगे, ‘‘पिता को तुम्हारा सुख नसीब नहीं था। उनके निधन के बाद तुम्हारी माँ ने तुम्हें पाया था।’’

कहाँ से ? यह सवाल पाताल-गंगा में गोता लगाने जैसा सवाल था, इसलिए होंठों में हरकत नहीं हुई।
निधि महाराज ही कहने लगे, ‘‘उस वक़्त भी तुम्हारे इस चाचा ने बहुत मुसीबत खड़ी की थी। इस मकान का लोभ जो था ! सो उसने धर्म की आड़ ली कि विधवा स्त्री कोई पुत्र गोद नहीं ले सकती...’’
‘‘क्या ऐसी भी कोई वेद-आज्ञा है ?’’

‘‘इन्होंने वेद कब पढ़े हैं ! विधवा का धन, उसके दूर-नजदीक के सम्बन्धियों के हाथों से न निकल जाए, इसलिए ब्राह्मण-पूजा के वेदों में बारह प्रकार के पुत्र माने गये हैं। एक, जिसे जन्म दिया जाए। दूसरा, अपनी बेटी का पुत्र। तीसरा, अपनी पत्नी का दूसरे पुरुष से पैदा हुआ पुत्र। चौथा, अपनी कुँवारी कन्या का पुत्र। पाँचवाँ, पत्नी के पुनर्विवाह से हुआ पुत्र। छठा, दूसरे को गोद दिया गया पुत्र। सातवाँ, किसी माता-पिता से ख़रीदा हुआ पुत्र। आठवाँ, शुभ गुणों के कारण किसी को माना हुआ पुत्र। नौवाँ, किसी अनाथ बच्चे को पुत्र समान सोचा गया पुत्र। दसवाँ, विवाह के वक़्त गर्भवती स्त्री का पुत्र। ग्यारहवाँ, अपनी स्त्री से ऐसे पुरुष द्वारा उत्पन्न हुआ पुत्र जिसका पता न लगाया जा सके। और बारहवाँ, किसी कारण माँ-बाप का त्याग दिया गया पुत्र, जिसका पालन-पोषण किया जाए।’’

साँसें गोता खाने लगीं। पाताल, गंगा में नहीं, हैरानी में। मन आस-पास के समाज से निकलकर उस वक़्त की तरफ़ देखने लगा-जब कुँवारी कन्या का पुत्र भी दम्पती के लिए पुत्र हुआ करता था, और जब विवाह के वक़्त गर्भवती पत्नी का पुत्र भी पुत्र होता था...
आजकल के अख़बारों में मैंने प्रायः उन नालियों का ज़िक्र पढ़ा हुआ है, जिनमें सद्यःजात शिशु मृत अथवा जीवित मिलते हैं...
शायद माथा नहीं पर मन ज़रूर निधि महाराज के ज्ञान के आगे झुक गया।

सिर्फ़ इतना ही कहा, ‘‘माँ कई बार अपनी एक परलोक सिधार गयी बेटी का ज़िक्र किया करती थी। कहा करती थी, मरकर वही तुम्हारी सूरत में पैदा हो गयी-वही आँखें वही माथा वह हँसी...’’
साथ ही, ख़याल आया-जब माँ मेरी सूरत मृत बहन की सूरत के साथ मिलाती थी; तब सब स्वाभाविक लगता था। उसने मुझे कभी नहीं बताया कि मैं उसका गोद लिया हुआ पुत्र था। पर...
मुझे जैसे हँसी आ गयी। निधि महाराज से कहा, ‘‘आत्मा पुत्र को जन्म देती है, पर साथ ही शायद भ्रम भी पातली है। माँ यह भूल गयी कि उसकी मृत बेटी की सूरत लेकर मैं कैसे जन्म ले सकता हूँ।’’

निधि महाराज कुछ नहीं बोले। मैं ही माँ के उदास मन की बातें सुना-सुना कर माँ के भ्रम पर हँसता-सा रहा।
उन्होंने सिर्फ़ यह बताया कि तुम्हें गोद लेते वक़्त, तुम्हारे दूर के इस चाचा ने जो दुहाई दी थी, उस बात का खण्डन भी धर्म के नाम पर किया गया था। वह सच भी था। तुम्हारे पिता की मृत्यु अचानक हुई थी, मृत्यु से पहले उन्होंने तुम्हें गोद लेने का निश्चय किया हुआ था। इसलिए माँ भले ही विधवा थी, जब उसने तुम्हें गोद लिया तो उसके निश्चय में तुम्हारे पिता का निश्चय भी शामिल था। दोष मुझ पर भी लगाया गया था कि मैंने पूजा के लोभ में आकर तुम्हारी माँ को इस अधर्म से रोका नहीं था, पर झूठे दोष से क्या होता है...

उस वक़्त निधि महाराज ने अपने अँगोछे की गाँठ में बँधी हुई सोने की चूड़ियाँ मेरी हथेली पर रख दीं, जो आज सुबह माँ ने उनके चरणों में चढ़ायी थीं। कहने लगे, ‘‘चूड़ियाँ तुम्हारी माँ को बहुत प्यारी थीं। उसकी चल बसी बेटी की निशानी थीं ये। यह निशानी अब तुम्हारे पास रहनी चाहिए...’’
संकोच-सा हुआ। कहा, ‘‘पर यह माँ का दान है...’’

निधि महाराज हँस दिये-‘‘दान का हक़ सिर्फ़ तुम्हारी माँ को था, मुझे नहीं है ? तुम यह मेरा दान समझ लो। यह मेरी अन्तरात्मा की आवाज़ है कि चूड़ियाँ इसी घर में रहनी चाहिए। इस घर में जब घर की बहू आएगी, ये उसके हाथों में होनी चाहिए....’’
आज तक ब्राह्मण-लोभ की बात, जो भी देखी-सुनी थी, निधि महाराज ने मेरी आँखों के सामने उसका खण्डन कर दिया। इसलिए मन फिर एक बार उनके आगे झुक गया।

आज के तूफान के बाद, मैं इस सुख का पल सँभालकर अंजुलि में भर लेना चाहता था, पर हाथों में सामर्थ्य नहीं थी। मुँह से निकला, ‘‘आपने माँ से कभी नहीं पूछा था कि मैं कौन हूँ ?’’
निधि महाराज ने नज़र भरकर मेरी ओर देखा। बोले, ‘‘मैं सिर्फ़ यह जानता हूँ कि तुम एक धर्म-प्राण माँ के पुत्र हो। आज तुमने अपनी माँ के शब्द सुने थे,

जब उसने तुम्हारे पिता की तस्वीर को फूलों का हार पहनाया था ? वह फूलों की जयमाला थी। उसने कहा था-आज सत्ताईस तारीख़ है, आज बृहस्पति तुला में आया है, आज मेरा संजोग है...’’
माँ ने कहा था, पर उसकी बात मेरी समझ से बाहर रही आयी। इस वक़्त भी याद नहीं थी। निधि महाराज ने उसके शब्द दोहराये, तो याद आयी। मैंने पूछा, ‘‘मैं कुछ नहीं समझा था, इसका क्या मतलब था ?’’

‘‘वह तुम्हारे पिता के निधन के बाद सिर्फ़ तुम्हारा मुँह देखकर जीती रही। तुम्हें पालने के लिए, तुम्हें पढ़ाने के लिए, तुम्हें बड़ा करने के लिए। वैसे वह तुम्हारे पिता से बिछुड़कर जीना नहीं चाहती थी। वह इस दुनिया से विदा होकर, अगली दुनिया में तुम्हारे पिता से मिलने का इन्तज़ार कर रही थी...उसे मालूम था कि आज के दिन बृहस्पति तुला राशि में आएगा, और जिनके विवाह बहुत देर से रुके हुए हैं, उनके संजोग बनेंगे। उसने अपनी मृत्यु को भी तुम्हारे पिता के साथ संयोग का दिन माना। सोचा, अब वह अगली दुनिया में जाकर तुम्हारे पिता से मिल सकेगी। इसीलिए उसने किनारीवाला दुपट्टा ओढ़ा। तुम्हें पालकर बड़ा करनेवाले कर्तव्य से वह मुक्त हो गयी थी। उसके लिए यह मृत्यु उसके संयोग का दिन था। इसलिए कहता हूँ कि वह धर्मात्मा थी...’’

मैं बोल नहीं सका। मन का सवाल गूँगा-सा होकर निधि महाराज के मुँह की ओर ताकता रहा...
वह चले गये हैं...
सामने फिर अँधेरे की पाताल-गंगा बह रही है।
नहीं जानता कि मन का कौन-सा चिन्तन इस पाताल-गंगा में डूब जाएगा, और कौन-सा उस दूसरे किनारे पर जा लगेगा।

Monday, November 7, 2011

बृहस्पतिवार का व्रत’ कहानी उस ज़मीन पर खड़ी है, जिससे मैं वाकिफ नहीं थी। एक बार एक अजनबी लड़की ने आकर मिन्नत-सी की कि मैं उसकी कहानी लिख दूँ। और एक ही साँस में उसने कह दिया—‘मैं कॉलगर्ल हूँ।’ उसी से, तन-बदन बेचने वाली लड़कियों के रोज़गार का कुछ अता-पता लिया, और उसके अंतर में पलती हुई उस पीड़ा को जाना, जो घर का एक स्वप्न लिए हुए, मन्नत-मुराद माँगती हैं किसी आने वाले जन्म के लिए....


आज बृहस्पतिवार था, इसलिए पूजा को आज काम पर नहीं जाना था...
बच्चे के जागने की आवाज़ से पूजा जल्दी से चारपाई से उठी और उसने बच्चे को पालने में से उठाकर अपनी अलसाई-सी छाती से लगा लिया, ‘‘मन्नू देवता ! आज रोना नहीं, आज हम दोनों सारा दिन बहुत-सी बातें करेंगे...सारा दिन....’’
यह सारा दिन पूजा को हफ्ते में एक बार नसीब होता था। इस दिन वह मन्नू को अपने हाथों से नहलाती थी, सजाती थी, खिलाती थी और उसे कन्धे पर बिठाकर आसपास के बगीचे में ले जाती थी।
यह दिन आया का नहीं, माँ का दिन होता था...
आज भी पूजा ने बच्चे को नहला-धुलाकर और दूध पिलाकर जब चाबी वाले खिलौने उसके सामने रख दिए, तो बच्चे की किलकारियों से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया.....
चैत्र मास के प्रारम्भिक दिन थे। हवा में एक स्वाभाविक खुशबू थी, और आज पूजा की आत्मा में भी एक स्वाभाविक ममता छलक रही थी। बच्चा खेलते-खेलते थककर उसकी टाँगों पर सिर रखकर ऊँघने लगा, तो उसे उठाकर गोदी में डालते हुए वह लोरियों जैसी बातें करने लगी—‘मेरे मन्नू देवता को फिर नींद आ गई...मेरा नन्हा-सा देवता...बस थोड़ा-सा भोग लगाया, और फिर सो गया...’’

पूजा ने ममता से विभोर होकर मन्नू का सिर भी चूम लिया, आँखें भी, गाल भी, गरदन भी—और जब उसे उठाकर चारपाई पर सुलाने लगी तो मन्नू कच्ची नींद के कारण रोने लगा।
पूजा ने उसे उठाकर फिर कन्धे से लगा लिया और दुलारने लगी, ‘‘मैं कहीं नहीं जा रही, मन्नू ! आज मैं कहीं नहीं जाऊँगी...।’’
लगभग डेढ़ वर्ष के मन्नू को शायद आज भी यह अहसास हुआ था कि माँ जब बहुत बार उसके सिर व माथे को चूमती है, तो उसके बाद उसे छोड़कर चली जाती है।
और कन्धे से कसकर चिपटे हुए मन्नू को वह हाथ से दुलारती हुए कहने लगी, ‘‘हर रोज तुम्हें छोड़कर चली जाती हूँ न...जानते हो कहाँ जाती हूँ ? मैं जंगल में से फूल तोड़ने नहीं जाऊँगी, तो अपने देवता की पूजा कैसे करूँगी ?’’
और पूजा के मस्तिष्क में बिजली के समान वह दिन कौंध गया, जब एक ‘गेस्ट हाउस’ की मालकिन मैडम डी. ने उसे कहा था—‘‘मिसिज़ नाथ ! यहाँ किसी लड़की का असली नाम किसी को नहीं बताया जाता। इसलिए तुम्हें जो भी नाम पसन्द हो रख लो।’’

और उस दिन उसके मुँह से निकला था—‘‘मेरा नाम पूजा होगा।’’
गेस्ट हाउस वाली मैडम डी. हँस पड़ी थी—‘‘हाँ, पूजा ठीक है, पर किस मन्दिर की पूजा ?’’
और उसने कहा था—‘‘पेट के मन्दिर की।’’
माँ के गले से लगी बाँहों ने जब बच्चे को आँखों में इत्मीनान से नींद भर दी, तो पूजा ने उसे चारपाई पर लिटाते हुए, पैरों के बल चारपाई के पास बैठकर अपना सिर उसकी छाती के निकट, चारपाई की पाटी पर रख दिया और कहने लगी—‘‘क्या तुम जानते हो, मैंने अपने पेट को उस दिन मन्दिर क्यों कहा था ? जिस मिट्टी में से किसी देवता की मूर्ति मिल जाए, वहाँ मन्दिर बन जाता है—तू मन्नू देवता मिल गया तो मेरा पेट मन्दिर बन गया....’’
और मूर्ति को अर्ध्य देने वाले जल के समान पूजा की आँखों में पानी भर आया, ‘‘मन्नू, मैं तुम्हारे लिए फूल चुनने जंगल में जाती हूँ। बहुत बड़ा जंगल है, बहुत भयानक, चीतों से भरा हुआ, भेड़ियों से भरा हुआ, साँपों से भरा हुआ...’’
और पूजा के शरीर का कंपन, उसकी उस हथेली में आ गया, जो मन्नू की पीठ पर पड़ी थी...और अब वह कंपन शायद हथेली में से मन्नू की पीठ में भी उतर रहा था।

उसने सोचा—मन्नू जब खड़ा हो जाएगा, जंगल का अर्थ जान लेगा, तो माँ से बहुत नफरत करेगा—तब शायद उसके अवचेतन मन में से आज का दिन भी जागेगा, और उसे बताएगा कि उसकी माँ किस तरह उसे जंगल की कहानी सुनाती थी—जंगल की चीतों की, जंगल के भेड़ियों की और जंगल के साँपों की—तब शायद....उसे अपनी माँ की कुछ पहचान होगी।
पूजा ने राहत और बेचैनी का मिला-जुला साँस लिया। उसे अनुभव हुआ जैसे उसने अपने पुत्र के अवचेतन मन में दर्द के एक कण को अमानत की तरह रख दिया हो....
पूजा ने उठकर अपने लिए चाय का एक गिलास बनाया और कमरे में लौटते हुए कमरे की दीवारों को ऐसे देखने लगी जैसे वह उसके व उसके बेटे के चारों ओर बनी हुई किसी की बहुत प्यारी बाँहें हों...उसे उसके वर्तमान से भी छिपाकर बैठी हुई....

पूजा ने एक नज़र कमरे के उस दरवाजे की तरफ देखा—जिसके बाहर उसका वर्तमान बड़ी दूर तक फैला हुआ था....
शहर के कितने ही गेस्ट हाउस, एक्सपोर्ट के कितने ही कारखाने, एअर लाइन्स के कितने ही दफ्तर और साधारण कितने ही कमरे थे, जिनमें उसके वर्तमान का एक-एक टुकड़ा पड़ा हुआ था....
परन्तु आज बृहस्पतिवार था—जिसने उसके व उसके वर्तमान के बीच में एक दरवाज़ा बन्द कर दिया था।
बन्द दरवाज़े की हिफाजत में खड़ी पूजा को पहली बार यह खयाल आया कि उसके धन्धे में बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है ?
इस बृहस्पतिवार की गहराई में अवश्य कोई राज़ होगा—वह नहीं जानती थी, अतः खाली-खाली निगाहों से कमरे की दीवारों को देखने लगी...
इन दीवारों के उस पार उसने जब भी देखा था—उसे कहीं अपना भविष्य दिखाई नहीं दिया था, केवल यह वर्तमान था...जो रेगिस्तान की तरह शहर की बहुत-सी इमारतों में फैल रहा था....
और पूजा यह सोचकर काँप उठी कि यही रेगिस्तान उसके दिनों से महीनों में फैलता हुआ—एक दिन महीनों से भी आगे उसके बरसों में फैल जाएगा।

और पूजा ने बन्द दरवाज़े का सहारा लेकर अपने वर्तमान से आँखें फेर लीं।
उसकी नज़रें पैरों के नीचे फर्श पर पड़ीं, तो बीते हुए दिनों के तहखाने में उतर गईं।
तहखाने में बहुत अँधेरा था....बीती हुई ज़िन्दगी का पता नहीं क्या-क्या, कहाँ-कहाँ पड़ा हुआ था, पूजा को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।
परन्तु आँखें जब अँधेरे में देखने की अभ्यस्त हुईं तो देखा—तहखाने के बाईं तरफ, दिल की ओर, एक कण-सा चमक रहा था।
पूजा ने घुटनों के बल बैठकर उसे हाथ से छुआ।
उसके सारे बदन में एक गरम-सी लकीर दौड़ गई और उसने पहचान लिया—यह उसके इश्क का ज़र्रा था, जिसमें कोई आग आज भी सलामत थी।

और इसी रोशनी में नरेन्द का नाम चमका—नरेन्द्रनाथ चौधरी का जिससे उसने बेपनाह मुहब्बत की थी।
और साथ ही उसका अपना नाम भी चमका—गीता, गीता श्रीवास्तव।
वह दोनों अपनी-अपनी जवानी की पहली सीढ़ी चढ़े थे—जब एक-दूसरे पर मोहित हो गए थे।
परन्तु चौधरी और श्रीवास्तव दो शब्द थे-जो एक-दूसरे के वजूद से टकरा गए थे
उस समय नरेन्द्र ने अपने नाम से चौधरी व गीता ने अपने नाम से श्रीवास्तव शब्द झाड़ दिया था।
और वह दोनों टूटे हुए पंखों वाले पक्षियों की तरह हो गए थे।
चौधरी श्रीवास्तव दोनों शब्दों की एक मजबूरी थी—चाहे-अलग-अलग तरह की थी। चौधरी शब्द के पास अमीरी का गुरूर था। इसलिए उसकी मजबूरी उसका यह भयानक गुस्सा था, जो नरेन्द्र पर बरस पड़ा था। और श्रीवास्तव के पास बीमारी और गरीबी की निराशा थी—जिसकी मजबूरी गीता पर बरस पड़ी थी, और पैसे के कारण दोनों को कॉलेज की पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी।

और जब एक मन्दिर में जाकर दोनों ने विवाह किया था, तब चौधरी और श्रीवास्तव दोनों शब्द उनके साथ मन्दिर में नहीं गए थे। और मन्दिर से वापस लौटते कदमों के लिए चौधरी-घर का अमीर दरवाज़ा गुस्से के कारण बन्द हो गया था और श्रीवास्तव-घर का गरीबी की मजबूरी के कारण।
फिर किसी रोज़गार का कोई भी दरवाज़ा ऐसा नहीं था, जो उन दोनों ने खटखटाकर न देखा हो। सिर्फ देखा था कि हर दरवाज़े से मस्तक पटक-पटककर उन दोनों मस्तकों पर सख्त उदासी के नील पड़ गए थे।
रातों को वह बीते हुए दिनों वाले होस्टलों में जाकर, किसी अपने जानने वाले के कमरे में पनाह माँग लेते थे और दिन में उनके पैरों के लिए सड़कें खुल जाती थीं।
वही दिन थे—जब गीता को बच्चे की उम्मीद हो आई थी।

गीता की कॉलेज की सहेलियों ने और नरेन्द्र के कॉलेज के दोस्तों ने उन दिनों में कुछ पैसे इकट्ठे किए थे, और दोनों ने जमुना पार की एक नीची बस्ती में सरकण्डों की एक झुग्गी बना ली थी—जिसके बाहर चारपाई बिछाकर गीता आलू, गोभी और टमाटर बेचने लगी थी, और नरेन्द्र नंगे पाँव सड़कों पर घूमता हुआ काम ढूँढ़ने लगा था।
खैरायती हस्पताल के दिन और भी कठिन थे—और जब गीता अपने सात दिन के मन्नू को गोद में लेकर, सरकण्डों की झुग्गी में वापस आई थी—तो बच्चे के लिए दूध का सवाल भी झुग्गी में आकर बैठ गया था।
और कमेटी के नलके से पानी भरकर लाने वाला समय।

पूजा के पैरों में दर्द की एक लहर उठकर आज भी, उसके पैरों को सुन्न करती हुई, ऊपर की रीढ़ की हड्डी में फैल गई, जैसे उस समय फैलती थी, जब वह गीता थी, और उसके हाथ में पकड़ी हुई पानी की बाल्टी का बोझ, पीठ में भी दर्द पैदा करता था, और गर्भ वाले पेट में भी।
पूजा ने तहखाने में पड़े हुए दिनों को वहीं हाथ से झटककर अँधेरे में फेंक दिया और उस सुलगते हुए कण की ओर देखने लगी, जो आज भी उसके मन के अँधेरे में चमक रहा था।
जब वह घबराकर नरेन्द्र की छाती से कसकर लिपट जाती थी—तो उसकी अपनी छाती में से सुख पिघलकर उसकी रगों में दौड़ने लगता था।

पूजा के पैरों से फिर एक कंपन उसके माथे तक गया—जब तहखाने में पड़े हुए दिनों में से—अचानक एक दिन उठकर काँटे की तरह उसके पैरों में चुभ गया—जब नरेन्द्र को हर रोज़ हल्का-हल्का बुखार चढ़ने लगा था, और वह मन्नू को नरेन्द्र की चारपाई के पास डालकर नौकरी की तलाश करने चली गई थी।
उसे यह विचार आया कि वह इस देश में जन्मी-पली नहीं थी, बाप की तरफ से वह श्रीवास्तव कहलाती थी, परन्तु वह नेपाल की लड़की थी, माँ की तरफ से नेपाली, इस कारण उसे शायद अपने या किसी और देश के दूतावास में ज़रूर कोई नौकरी मिल जाएगी—और इसी सिलसिले में वह सब्जी बेचने का काम नरेन्द्र को सौंपकर हर रोज़ नौकरी की तलाश में जाने लगी थी।

‘मिस्टर एच’—पूजा को यह नाम अचानक इस तरह याद आया जैसे वह जीवन के जलकर राख हुए कुछ दिनों को कुरेद रही हो, और अचानक उसका हाथ उस राख में किसी गर्म अंगारे को छू गया हो।
वह उसे एक दूतावास के ‘रिसेप्शन रूम’ में मिला था। एक दिन कहने लगा, ‘‘गीता देवी ! मैं तुम्हें हर रोज़ यहाँ चक्कर लगाते देखता हूँ। तुम्हें नौकरी चाहिए ? मैं तुम्हें नौकरी दिलवा देता हूँ। यह लो, तुम्हें पता लिख देता हूँ, अभी चली जाओ। आज ही नौकरी का प्रबन्ध हो जाएगा...’’ और पूजा, जब गीता होती थी, कागज़ का वह टुकड़ा पकड़कर, अचानक मेहरबान हुई किस्मत पर हैरान खड़ी रह गई थी।

वह पता एक गेस्ट हाउस की मालकिन—‘मैडम डी.’ का था, जहाँ पहुँचकर वह और भी हैरान रह गई थी, क्योंकी नौकरी देने वाली मैडम डी. उसे ऐसे तपाक से मिली जैसे पुराने दिनों की कोई सहेली मिली हो। गीता को एक ठण्डे कमरे में बिठाकर उसने गर्म चाय और भुने हुए कबाब खिलाए थे।
नौकरी किस-किस काम की होगी, कितने घंटे वह कितने तनख्वाह—जैसे सवाल उसकी होंठों पर जितनी बार आते रहे, मैडम डी. उतनी बार मुस्करा देती थी। कितनी देर के बाद उसने केवल यह कहा था—‘‘क्या नाम बताया था ? मिसिज़ गीता नाथ ? परन्तु इसमें कोई आपत्ति तो नहीं अगर मैं मिसिज़ नाथ की अपेक्षा तुम्हें मिस नाथ कहा करूँ ?’’
गीता हैरान हुई, पर हँस पड़ी—‘‘मेरे पति का नाम नरेन्द्र नाथ है। इसी कारण अपने आपको मिसिज़ नाथ कहती हूँ। आप लोग मुझे मिस नाथ कहेंगे तो आज जाकर उन्हें बताऊँगी कि अब मैं उनकी पत्नी के साथ-साथ उनकी बेटी हो गई हूँ।’’
मैडम डी. कुछ देर तक उसके मुँह की तरफ देखती रही, कुछ बोली नहीं, और जब गीता ने पूछा, ‘‘तनख्वाह कितनी होगी ?’’ तो उसने जवाब दिया था—‘‘पचास रुपए रोज़।’’

‘‘सच ?’’ कमरे के सोफे पर बैठी गीता—जैसे खुशी से दोहरी होकर मैडम डी. के पास घुटनों के बल बैठ गई थी।
‘‘देखो ! आज तुमने कोई अच्छे कपड़े नहीं पहने हैं ! मैं तुम्हें अपनी एक साड़ी उधार देती हूँ, तुम साथ वाले बाथरूम में हाथ धोकर वह साड़ी पहन लो।’’ मैडम डी. ने कहा, और गीता मन्त्रमुग्ध-सी उसके कहने पर जब कपड़े बदलकर आई तो मैडम डी. ने पचास रुपए उसके सामने रख दिए, ‘‘आज की तनख्वाह।’’
इस परी-कहानी जैसी नौकरी के जादू के प्रभाव से अभी गीता की आँखें मुँदी जैसी थीं कि मैडम डी. उसका हाथ पकड़कर उसे ऊपर की छत के उस कमरे में छोड़ आई, जहाँ परी-कहानी का एक राक्षस उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।
कमरे के दरवाज़े पर बार-बार दस्तक सुनी, तो पूजा ने इस तरह हाँफते हुए दरवाज़ा खोला जैसे वह तहखाने में से बहुत-सी सीढ़ियाँ चढ़कर बाहर आई हो।
‘‘रात की रानी—दिन में सो रही थी ?’’ दरवाज़े से अन्दर आते हुए शबनम ने हँसते-हँसते कहा, और पूजा के बिखरे हुए बालों की तरफ देखते हुए कहने लगी, ‘‘तेरी आँखों में तो अभी भी नींद भरी हुई है, राम के खसम ने क्या सारी रात जगाए रखा था ?’’

शबनम को बैठने के लिए कहते हुए पूजा ने ठण्डी साँस ली, ‘‘कभी-कभी जब रात का खसम नहीं मिलता, तो अपना दिल ही अपना खसम बन जाता है, वह कम्बख्त रात को जगाए रखता है...।’’
शबनम हँस पड़ी, और दीवान पर बैठते हुए कहने लगी, ‘‘पूजा दीदी ! दिल तो जाने कम्बख्त होता है या नहीं, आज का दिन ही ऐसा होता है, जो दिल को भी कम्बख्त बना देता है। देख, मैंने भी तो आज पीले कपड़े पहने हुए हैं और मन्दिर में आज पीले फूलों का प्रसाद चढ़ाकर आई हूँ...।’’
‘‘आज का दिन ? क्या मतलब ?’’ पूजा ने शबनम के पास दीवान पर बैठते हुए पूछा।
‘‘आज का दिन, बृहस्पतिवार का। तुझे पता नहीं ?’’
‘‘सिर्फ इतना पता है कि आज के दिन छुट्टी होती है’’—पूजा ने कहा। तो शबनम हँसने लगी—‘‘देख ले। हमारे सरकारी दफ्तर में भी छुट्टी होती है....।’’

‘‘मैं सोच रही थी कि हमारे धन्धे में इस बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है...’’
‘‘हमारे संस्कार’’ शबनम के होंठ पर एक बल खाकर हँसने जैसे हो गए। वह कहने लगी—‘‘औरत चाहे वेश्या भी बन जाए परन्तु उसके संस्कार नहीं मरते। यह दिन औरत के लिए पति का दिन होता है। पति व पुत्र के नाम पर वह व्रत भी रखती है, पूजा भी करती है—‘‘छः दिन धन्धा करके भी वह पति और पुत्र के लिए दुआ माँगती है...’’
पूजा की आँखों में पानी-सा भर आया—‘‘सच।’’ और वह धीरे से शबनम को कहने लगी—‘‘मैंने तो पति भी देखा है, पुत्र भी। तुमने तो कुछ भी नहीं देखा...’’
‘‘जब कुछ न देखा हो, तभी तो सपना देखने की जरूरत पड़ती है...’’ शबनम ने एक गहरी साँस ली, ‘‘इस धन्धे में आकर किसने पति देखा है...?’’ और कहने लगी—‘‘जिसे कभी मिल भी जाता है, वह भी चार दिन के बाद पति नहीं रहता, दलाल बन जाता है...तुझे याद नहीं, एक शैला होती थी...’’

‘‘शैला ?’’ पूजा को वह साँवली और बाँकी-सी लड़की याद हो आई, जो एक दिन अचानक हाथ में हाथी-दाँत का चूड़ा पहनकर और माँग में सिन्दूर भरकर, मैडम को अपनी शादी का तोहफा देने आई थी, और गेस्ट हाउस में लड्डू बाँट गई थी। उस दिन उसने बताया था कि उसका असली नाम कान्ता है।
शबनम कहने लगी—‘‘वही शैला, जिसका नाम कान्ता था। तुझे पता है उसका क्या हुआ ?’’
‘‘कोई उसका ग्राहक था, जिसने उसके साथ विवाह कर लिया था...’’
‘‘ऐसे पति विवाह के मन्त्रों को भी धोखा दे देते हैं। उससे शादी करके उसे बम्बई ले गया था, यहाँ दिल्ली में उसे बहुत-से लोग जानते होंगे, बम्बई में कोई नहीं जानता, इसलिए वहाँ वे नेक ज़िन्दगी शुरू करेंगे...’’
‘‘फिर ?’’ पूजा की साँस जैसे रुक-सी गई।
‘‘अब सुना है कि वहाँ बम्बई में वह आदमी उस ‘नेक ज़िन्दगी’ से बहुत पैसे कमाता है’’...

पूजा के माथे पर त्योरियाँ पड़ गईं, वह कहने लगी, ‘‘फिर तू मन्दिर में उस तरह का पति क्यों माँगने गई थी ?’’
शबनम चुप-सी हो गई, फिर कहने लगी, ‘‘नाम बदलने से कुछ नहीं होता। मैंने नाम तो शबनम रख लिया है, परन्तु अन्दर से वही शकुन्तला हूँ—जो बचपन में किसी दुष्यन्त का सपना देखती थी...अब ये समझ लिया है कि जैसे शकुन्तला की ज़िन्दगी में वह भी दिन आया था, जब दुष्यन्त उसे भूल गया था...मेरा यह जन्म उसी दिन जैसा है।’’
पूजा का हाथ अनायास ही शबनम के कन्धे पर चला गया और शबनम ने आँखें नीची कर लीं। कहने लगी—‘‘मैं जानती हूँ...इस जन्म में मेरा यह शाप उतर जाएगा।’’

पूजा का निचला होंठ जैसे दाँतो तले आकर कट गया। कहने लगी—‘‘तू हमेशा यह बृहस्पतिवार का वृत रखती है ?’’
‘‘हमेशा...आज के दिन नमक नहीं खाती, मन्दिर में गुण और चने का प्रसाद चढ़ाकर केवल वही खाती हूँ...बृहस्पति की कथा भी सुनती हूँ, जप का मन्त्र भी लिया हुआ है....और भी जो विधियाँ हैं...’’शबनम कह रही थी, जब पूजा ने प्यार से उसे अपनी बाँहों में ले लिया और पूछने लगी—‘‘और कौन-सी विधियाँ ?’’
शबनम हँस पड़ी, ‘‘यही कि आज के दिन कपड़े भी पीले ही रंग के होते हैं, उसी का दान देना और वही खाने....मन्त्र की माला जपने और वह भी सम में....इस माला के मोती दस, बारह या बीस की गिनती में होते हैं। ग्यारह, तेरह या इक्कीस की गिनती में नहीं—यानी जो गिनती—जोड़ी-जोड़ी से पूरी आए, उसका कोई मनका अकेला न रह जाए...’’
शबनम की आँखों में आँसू आने को थे कि वह ज़ोर से हँस पड़ी। कहने लगी, ‘‘इस जन्म में तो यह ज़िन्दगी का मनका अकेला रह गया है, पर शायद अगले जन्म में इसकी जोड़ी का मनका इसे मिल जाए...’’ और पूजा की ओर देखते हुए कहने लगी, ‘‘जिस तरह दुष्यन्त की अँगूठी दिखाकर शकुन्तला ने उसे याद कराया था—उसी तरह शायद अगले जन्म में मैं इस व्रत-नियम की अँगूठी दिखाकर उसे याद करा दूँगी कि मैं शकुन्तला हूँ...’’
 पूजा की आँखे डबडबा आई ..आज से पहले उसने किसी के सामने ऐसे आँखे नहीं भरी थी कहने लगी तू जो शाप उतार रही है  ,वह मैं चढ़ा रही हूँ ..मैंने इस जन्म में पति भी पाया ,पुत्र भी ..पर ..

सच तेरे  पति को बिलकुल मालुम नहीं ? शबनम से हैरानी से पूछा 
बिलकुल पता नहीं ..जब मैंने यह कहा था की मुझे दूतावास में काम मिल गया है तब बहुत डर गयी थी जब उसने दूतावास का नाम पूछा था उस समय एक बात सूझ गयी मैंने कहा की मुझे एक जगह बैठने का काम नहीं मिला है काम इनदरेक्ट है मुझे कई कम्पनियों में जाना पड़ता है उनसे इश्तिहार लाने होते हैं ...जिन में इतनी कमीशन मिल जाती है जो ऑफिस में बैठने में नहीं मिलती ..पूजा ने बताया और कहने लगी वह बहुत बीमार था इस लिए हमेशा डाक्टरों और दवाई की बाते होती रहती थी ...फिर डाकटर ने उसको सोलन भेज दिया हस्पताल में क्यों की घर में रहने से बच्चो को बीमार होने का खतरा रहता ..इस लिए अभी तक शक का कोई मौका नहीं मिला उसको ...
शबनम ने कहा की कई लड़कियों ने जिन्होंने घर में बताया हुआ है वह किसी एक्सपोर्ट कंपनी में काम करती है उनके घर वाले सब जानते हैं पर चुप रहते हैं ...
पूजा ने कहा अगर नरेंदर को पता चल जाये तो वह तो आत्महत्या कर लेगा वह जी नहीं पायेगा 
पर जब वह हस्पताल से वापस आएगा .और किसी दिन उसको कुछ पता चल गया तो .....शबनम की बात सुन कर  पूजा कहने लगी कुछ पैसा इक्कठा हो जाए तो दो तीन रिक्शा किराए पर दाल दूंगी पैसे आ जायेंगे 
शबनम ने यह सुन कर कहा की यह काम कोई आसान नहीं है वह दिन बीत गए जब यह मजदुर अपने मालिकों को कुछ कमा कर देते थे ..पूजा चिंता में डूब गयी ....तो शबनम ने कहा तुम्हे अगर यह धंधा छोड़ना भी है तो अभी इस साल मत सोचना यह १९८२ में सीजन का साल है शहर में ट्रेड फेयर लगने वाला है जितनी कमाई इस साल होगी उतनी पांच सालों में नहीं हो सकती है ...एक बार हाथ में पैसा इकट्ठा हो जाये ....
पूजा इस साल के पैसो की गिनती सी करने लगी ..जब मन्नू के जागने की आवाज़ आई तो वह जल्दी से दीवान से उठते हुए शबनम से बोली --तू जाना मत ,कुछ खा कर जाना .."और साथ ही हंस पड़ी ..तुम्हारे व्रत के खाने में नमक खाना मना है न , इसलिए किसी चीज में इस दुनिया का नमक नहीं डालूंगी ..."

Friday, August 19, 2011


अंतरव्यथा(नीचे के कपडे )

जिसके मन की पीडा को लेकर मैंने कहानी लिखी थी-'नीचे के कपडे" उसका नाम भूल गई हूँ । कहानी में सही नाम लिखना नहीं था, और उससे एक बार ही मुलाकात हुई थी, इसलिए नाम भी याद से उतर गया है...

जब वह मिलने आई थी, बीमार थी। खूबसूरत थी, पर रंग और मन उतरा हुआ था। वह एक ही विश्वास को लेकर आई थी कि मैं उसके हालात पर एक कहानी लिख दूँ...

मैंने पूछा-इससे क्या होगा?

कहने लगी-जहाँ वह चिट्ठियाँ पडीं हैं जो मैं अपने हाथों से नहीं फाड सकती, उन्हीं चिट्ठियों में वह कहानी रख दूँगी...मुझे लगता है, मैं बहुत दिन जिंदा नहीं रहूँगी, और बाद में जब उन चिट्ठियों से कोई कुछ जान पाएगा, तो मुझे वह नहीं समझेगा जो मैं हूँ। आप कहानी लिखेंगी तो वहीं रख दूँगी। हो सकता है, उसकी मदद से कोई मुझे समझ ले मेरी पीडा को संभाल ले। मुझे और किसी का कुछ फिक्र नहीं है, पर मेरा एक बेटा है, अभी वह छोटा है, वह बडा होगा तो मैं सोचती हूँ कि बस वह मुझे गलत न समझे...

उसकी जिंदगी के हालात सचमुच बहुत उलझे हुए थे और मेरी पकड में नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें कैसे समेट पाऊँगी। लिखने का वादा तो नहीं किया पर कहा कि कोशिश करूँगी..

मैं बहुत दिन वह कहानी नहीं लिख पाई। सिर्फ एक अहसास सा बना रहा कि उसका बच्चा मेरे जेहन में बडा हो रहा है, इतना बडा कि अब बहुत सी चीजें उसके हाथ लगती हैं, तो वह हैरान उन्हें देखे जा रहा है..

कहानी प्रकाशित हुई और बहुत दिन गुजर गए। मैं जान नहीं पाई कि उसके हाथों तक पहुँची या नहीं। सब वक्त के सहारे छोड दिया। उसका कोई अता-पता मेरे पास नहीं था...

एक अरसा गुजर गया था, जब एक दिन फोन आया, दिल्ली से नहीं था, कहीं बाहर से था। आवाज थी-'आपका बहुत शुक्रिया! मैंने कहानी वहीं रख दी है जहाँ चाहती थी...

इतने भर लफ्जों से कुछ पकड में नहीं आया था, इसलिए पूछा-'आप कौन बोल रही हैं? कौन सी कहानी?

जवाब में बस इतनी आवाज थी-'बहुत दूर से बोल रही हूँ, वही जिसकी कहानी आपने लिखी है-'नीचे के कपडे...और फोन कट गया...

"नीचे के कपडे???"

अचानक मेरे सामने कई लोग आकर खडे हो गए हैं, जिन्होंने कमर से नीचे कोई कपडा नहीं पहना हुआ है।

पता नहीं मैंने कहाँ पढा था कि खानाबदोश औरतें अपनी कमर से अपनी घघरी कभी नहीं उतारती हैं। मैली घघरी बदलनी होतो सिर की ओर से नई घघरी पहनकर, अंदर से मैली घघरी उतार देती हैं और जब किसी खानाबदोश औरत की मृत्यु हो जाती है तो उसके शरीर को स्नान कराते समय भी उसकी नीचे की घघरी सलामत रखी जाती है। कहते हैं, उन्होंने अपनी कमर पर पडी नेफे की लकीर में अपनी मुहब्बत का राज खुदा की मखलूक से छिपाकर रखा होता है। वहाँ वे अपनी पसंद के मर्द का नाम गुदवाकर रखती हैं, जिसे खुदा की ऑंख के सिवा कोई नहीं देख सकता।

और शायद यही रिवाज मर्दों के तहमदों के बारे में भी होता होगा।

लेकिन ऐसे नाम गोदने वाला जरूर एक बार औरतों और मर्दों की कमर की लकीर देखता होगा। उसे शायद एक पल के लिए खुदा की ऑंख नसीब हो जाती है, क्योंकि वह खुदा की मखलूक की गिनती में नहीं जाता...

लेकिन मेरी ऑंख को खुदा की ऑंख वाला शाप क्यों मिल गया? मैं अपने सामने ऐसी औरतें और मर्द क्यों देख रहा हूँ, जिन्होंने कमर से नीचे कोई कपडा नहीं पहन रखा है, जिन्हें देखना सारी मखलूक के लिए गुनाह है?

कल से माँ अस्पताल में है। उसके प्राण उसकी साँसों के साथ डूब और उतरा रहे हैं। ऐसा पहले भी कई बार हुआ है और दो बार पहले भी उसे अस्पताल ले जाया गया था, पर इस बार शायद उसके मन को जीने का विश्वास नहीं बँध रहा है। अचानक उसने उंगली में से हीरे वाली अंगूठी उतारी और मुझे देकर कहा कि मैं घर जाकर उसकी लोहे वाली अलमारी के खाने में रख दूँ।
अस्पताल में अभी दादी भी आई थी, पापा भी, मेरा बडा भाई भी, लेकिन माँ ने न जाने क्यों, यह काम उन्हें नहीं सौंपा। हम सब लौटने लगे थे, जब माँ ने इशारे से मुझे ठहरने के लिए कहा। सब चले गए तो उसने तकिए के नीचे से एक मुसा हुआ रुमाल निकाला, जिसके कोने से दो चाबियाँ बँधी हुई थीं। रुमाल की कसी हुई गाँठ खोलने की उसमें शक्ति नहीं थी, इसलिए मैंने वह गाँठ खोली। तब एक चाभी की ओर इशारा करके उसने मुझे यह काम सौंपा कि मैं उसकी हीरे की अंगूठी अलमारी के अंदर खाने में रख दूँ। यह भी बताया कि अंदर वाले की चाभी मुझे उसी अलमारी के एक डिब्बे में पडी हुई मिल जाएगी।

और फिर माँ ने धीरे से यह भी कहा कि मैं बम्बई वाले चाचाजी को एक खत डाल दूँ, दिल्ली आने के लिए। और दूसरी चाभी उसने उसी तरह रुमाल में लपेटकर अपने तकिए के नीचे रख ली।और जिस तरह तकदीरें बदल जाती हैं उसी तरह चाभियाँ भी बदल गई...
                   घर में रोज के इस्तेमाल की माँ की एक ही अलमारी है, लेकिन फालतू सामान वाली कोठरी में लोहे की एक और भी अलमारी है, जिसमें फटे-पुराने कपडे पडे रहते हैं। पापा के ट्रांसफर के समय वह अलमारी लगभग टूट ही गई थी, पर माँ ने उसे फेंका नहीं था और साकड-भाकड वाली उस अलमारी को फालतू कपडों के लिए रख लिया था।

घर पहुँचकर जब मैं माँ की अलमारी खोलने लगा, तो वह खुलती ही न थी। चाभी मेरी तकदीर की तरह बदली हुई थी। हाथ में थामी हुई हीरे की अंगूठी को कहीं संभालकर रखना था, इसलिए मैंने सामान वाली कोठरी की अलमारी खोल ली। यह चाभी उस अलमारी की थी। इस अलमारी में भी अंदर का खाना था। मैंने सोचा, उसकी चाभी भी जरूर इसी अलमारी के किसी डिब्बे में ही मिलनी थी...

और मैं फटे-पुराने कपडों की तहें खोलने लगा...

पुराने, उधडे हुए सलमे के कुछ कपडे थे, जो माँ ने शायद उनका सुच्चा सलमा बेचने के लिए रखे हुए थे और पापा के गर्म कोट भी थे, जो शायद बर्तनों से बदलने के लिए माँ ने संभालकर रखे हुए थे। मैंने एक बार गली में बर्तन बेचने वाली औरतों से माँ को एक पुराने कोट के बदले में बर्तन खरीदते हुए देखा था।

पर मैं हैरान हुआ-माँ ने वे सब टूटे हुए खिलौने भी रखे थे, जिनसे मैं छुटपन में खेला करता था। देखकर एक दहशत सी आई-चाभी से चलने वाली रेलगाडी इस तरह उलटी हुई थी, जैसे पटरी से गिर गई हो और उस भयानक दुर्घटना से उसके सभी मुसाफिर घायल हो गए हों-प्लास्टिक की गुडिया, जो एक ऑंख से कानी हो गई थी, रबड का हाथी, जिसकी सूंड बीच में से टूट गई थी, मिट्टी का घोडा, जिसकी अगली दोनों टाँगें जैसे कट गई हों और कुछ खिलौनों की सिर्फ टाँगें और बाहें बिखरी पडी थीं-जैसे उनके धड और सिर उडकर कहीं दूर जा पडे हों- और अब उन्हें पहचाना भी नहीं जा सकता था..

मेरे शरीर में एक कंपन सी दौड गई-देखा कि इन घायल खिलौनों के पास ही मिट्टी की बनी शिवजी की मूर्ति थी, जो दोनों बाहों से लुंजी हो गई थी और ख्याल आया -जैसे देवता भी अपाहिज होकर बैठा हुआ है।

जहाँ तक याद आया, लगा कि मेरा बचपन बहुत खुशी में बीता था। बडे भाई के जन्म के सात बरस बाद मेरा जन्म हुआ था, इसलिए मेरे बहुत लाड हुए थे। तब तक वैसे भी पापा की तरक्की हो चुकी थी, इसलिए मेरे वास्ते बहुत सारे कपडे और बहुत सारे खिलौने खरीदे जाते थे...लेकिन पूरी यादों के लिए इन टूटे हुए खिलौनों की माँ को क्या जरूरत थी, समझ में नहीं आया...

सिर्फ खिलौने ही नहीं, मेरे फटे हुए कपडे भी तहों में लगे हुए थे-टूटे हुए बटनों वाले छोटे-छोटे कुरते, टूटी हुई तनियों वाले झबले और फटी हुई जुराबें भी...

और फिर मुझे एक रुमाल में बँधी हुई वह चाभी मिल गई, जिसे मैं ढूँढ रहा था। अलमारी का अंदर वाला खाना खोला, ताकि हीरे की अंगूठी उसमें रख दूँ।

यही वह घडी थी जब मैंने देखा कि उस खाने में सिर्फ नीचे पहनने वाले कपडे पडे हुए थे..

और अचानक मेरे सामने वे लोग आकर खडे हो गए हैं जिनके सिर भी ढँके हुए हैं, बाहें भी, ऊपर के शरीर भी- लेकिन कमर से नीचे कोई कपडा नहीं है...

प्रलय का समय शायद ऐसा ही होता होगा, मालूम नहीं। मेरे सामने मेरी माँ खडी हुई है, पापा भी, बम्बई वाले चाचा भी और कोई एक मिसेज चोपडा भी और एक कोई मिस नंदा भी- जिन्हें मैं जानता नहीं।

और खोए हुए से होश से मैंने देखा कि उनके बीच में कहीं भी मैं भी गुच्छा सा बनकर बैठा हुआ हूँ...

न जाने यह कौन सा युग है, शायद कोई बहुत ही पुरानी सदी, जब लोग पेडों के पत्तों में अपने को लपेटा करते थे..और फिर पेडों के पत्ते कागज जैसे कब हो गए, नहीं जानता...

अलमारी के खाने में सिर्फ कागज पडे हुए हैं, बहुत से कागज जिन पर हरएक के तन की व्यथा लिखी हुई है-तन के ताप जैसी, तन के पसीने जैसी, तन की गंध जैसी...

ये सब खत हैं, बम्बई वाले चाचाजी के और सब मेरी माँ के नाम हैं...

तरह-तरह की गंध मेरे सिर को चढ रही है..

किसी खत से खुशी और उदासी की मिली-जुली गंध उठ रही है। लिखा है, 'वीनू! जो आदम और हव्वा खुदा के बहिश्त से निकाले गए थे-वह आदम मैं था और हव्वा तुम थीं...

किसी खत से विश्वास की गंध उठ रही है-'वीनू ! मैं समझता हूँ कि पत्नी के तौर पर तुम अपने पति को इंकार नहीं कर सकती, लेकिन तुम्हारा जिस्म मेरी नजर में गंगा की तरह पवित्र है और मैं शिवजी की गंगा को जटा में धारण कर सकता हूँ...

किसी खत से निराशा की गंध उठ रही है-'मैं कैसा राम हूँ, जो अपनी सीता को रावण से नहीं छुडा सकता...न जाने क्यों, ईश्वर ने इस जनम में राम और रावण को सगे भाई बना दिया!

किसी खत से दिलजोई की गंध उठ रही है-'वीनू! तुम मन में गुनाह का अहसास न किया करो। गुनाह तो उसने किया था, जिसने मिसेज चोपडा जैसी औरत के लिए तुम्हारे जैसी पत्नी को बिसार दिया था..

और अचानक एक हैरानी की गंध मेरे सिर को चढी, जब एक खत पढा-'तुम मुझसे खुशनसीब हो वीनू! तुम अपने बेटे को बेटा कह सकती हो, लेकिन मैं अपने बेटे को कभी भी अपना बेटा नहीं कह सकूँगा।

और अधिक हैरानी की गंध से मेरे सिर में एक दरार पड गई, जब एक दूसरे खत में मैंने अपना नाम पढा। लिखा था-'मेरी जान वीनू! अब तुम उदास न हुआ करो। मैं नन्हें से अक्षय की सूरत में हर वक्त तुम्हारे पास रहता हूँ। दिन में मैं तुम्हारी गोद में खेलता हूँ और रात को तुम्हारे पास सोता हूँ...

सो मैं..मैं...

जिंदगी के उन्नीस बरस मैं जिसे पापा कहता रहा था, अचानक उस आदमी के वास्ते यह लफ्ज मेरे होठों पर झूठा पड गया है...

बाकी खत मैंने पूरे होश में नहीं पढे, लेकिन इतना जाना है कि जन्म से लेकर मैंने जो भी कपडा शरीर पर पहना है, वह माँ ने कभी भी अपने पति की कमाई से नहीं खरीदा था। मिट्टी का खिलौना तक भी नहीं। मेरे स्कूल की और कॉलेज की फीसें भी वह घर के खर्च में से नहीं देती थी..

यह भी जाना है कि बम्बई में अकेले रहने वाले आदमी से कुछ ऐसी बातें भी हुई थीं, जिनके लिए कई खतों में माफियाँ माँगी गई हैं, और उस सिलसिले में कई बार किसी मिस नंदा का नाम लिखा गया है, जो खत लिखने वाले की नजरों में एक आवारा लडकी थी, जिसने मेनका की तरह एक ॠषि की तपस्या भंग कर दी थी...और कई खतों में माँ की झिडकियाँ सी दी गई हैं कि ये सिर्फ उसके मन के वहम हैं, जिनके कारण वह बीमार रहने लगी है...

यह माँ, पापा, चाचा,मिसेज चोपडा, मिस नंदा-कोई भी खानाबदोशों के काफिलों में से नहीं है- पर खानाबदोशों की परंपरा शायद सारी मनुष्य जाति पर लागू होती है, सबकी घघरियों और सबके तहमदों पर, जहाँ उनके शरीर पर पडी उनके नेफे की लकीर पर लिखा हुआ नाम ईश्वर की ऑंख के सिवा किसी को नहीं देखना चाहिए।...और पता नहीं लगता कि आज मेरी ऑंख को ईश्वर की ऑंख वाला शाप क्यों लग गया है..

सिर्फ यह जानता हूँ कि ईश्वर की ऑंख ईश्वर के चेहरे पर हो तो वरदान है, लेकिन इन्सान के चेहरे पर लग जाए तो शाप हो जाती है...।








Monday, July 11, 2011

 मैं दिल के एक कोने में बैठी हूँ,
तुम्हारी याद इस तरह आयी-
जैसे गीली लकड़ी में से
गाढ़ा और कडुवा धुआँ उठता है...

साथ हज़ारों ख़्याल आये
जैसे कोई सूखी लकड़ी
सुर्ख़ आग की आहें भरे,
दोनों लकड़ियाँ अभी बुझायीं हैं...

वर्ष कोयले की तरह बिखरे हुए
कुछ बुझ गये, कुछ बुझने से रह गये
वक़्त का हाथ जब समेटने लगा
पोरों पर छाले पड़ गये...
आज अचानक कोई पाताल-गंगा, धरती पर आकर, मेरे पैरों के आगे बहने लगी है..
लगता है-मेरी उम्र के पूरे चौबीस बरस, मेरे सामने एक-एक करके इस नदी में बहते जा रहे हैं...
आज घर में बहुत-सी आवाज़ें इकट्ठी हो गयी थीं। रक्खी मौसी की आवाज़ भी। मेरे सिर को सलहाकर रोती रही। गली के और जाने किस-किस घर से आये मर्दों की आवाजें भी थीं...पर इस वक़्त तक, साँझ सँवला जाने तक, वे सारी आवाज़ें उस पाताल-गंगा में बहती हुई मुझमें बहुत दूर निकल गयी हैं.....

लेकिन सुबह जो जनक चाचा अग्नि देने का अधिकार लेकर आया था, उसकी आवाज़ फिर नहीं फूटी...शायद पाताल-गंगा के किसी पिछले मोड़ पर ही पानी में गिर गयी थी, मैंने देखी नहीं।
निधि महाराज ने मेरे हाथ से माँ के पार्थिव शरीर को अग्नि दिखायी। उस वक़्त उनकी आवाज़ नहीं काँपी, हाँ मेरा हाथ अवश्य काँप गया था..

लगा-‘माँ’ लफ़्ज़ भी पाताल-गंगा में बह रहा है।
नहीं जानता कि कोई रिश्ता किस तरह पानी में बह सकता है...
आज सन्ध्या-पूजन के बाद निधि महाराज आये थे। उनके अँगोछे में कुछ फल थे, मिठाई भी। मुझे ज़बरदस्ती कुछ खिलाया। बोले-यह मन्दिर का प्रसाद है...
पूछा, ‘‘महाराज ! जो बता सकती थी, वह चौबीस बरस चुप रही। अब हमेशा के लिए चुप हो गयी है। आप बताइए ! वह मेरी कौन थी ?’’

‘‘वह तुम्हारी माँ थी पंकज !’’ निधि महाराज ने मेरे पास बैठकर मेरे सिर पर हाथ रखा।
मैंने कहा, ‘‘जानता हूँ, उसकी पहचान इसी लफ़्ज़ में है। पर आज अचानक मुझसे यह पहचान क्यों छीनी जा रही है ?’’
निधि महाराज हँस दिये। जवाब देने की बजाय पूछने लगे, ‘‘पहचान कौन देता है बेटा ?’’
कहा, ‘‘शायद जन्म ही यह पहचान देता है....’’

कहने लगे, ‘‘अन्तरात्मा यह पहचान देती है। तुम उससे पूछो कि वह तुम्हारी कौन थी ?’’
कहा, ‘‘पर अन्तरात्मा उसी ने बनायी थी। उसी ने यह अक्षर सिखाया। मेरे लिए वह पूर्ण सत्य था, पर आज किसी ने उस पूर्ण सत्य को झूठ क्यों कहना चाहा ?’’
‘‘झूठ, लोभ सिखाता है बेटा ! अन्तरात्मा नहीं सिखाती।’’
‘‘किस चीज़ का लोभ ?’’
‘‘इस मकान का, पैसे का....’’

‘‘पर बात धर्म की हुई थी, पैसे की नहीं....’’
‘‘पैसे का लोभ धर्म की आड़ लेता है...’’
‘‘पर उसने मुझे दत्तक पुत्र कहा था। दत्तक पुत्र क्या होता है ?’’
निधि महाराज जवाब को सवाल में बदलना जानते हैं। कहने लगे, ‘‘पीरों-फ़कीरों ने जिस्म को ख़ुदा का हुजरा कहा है, आत्मा की कोठरी। तुम बताओ, महान कोठरी होती है कि आत्मा ?’’
कहा, ‘‘कोठरी महान होती है, लेकिन आत्मा के कारण।’’

निधि महाराज फिर मुस्कराये। कहने लगे, पुत्र तन की कोठरी से भी जन्म ले सकता है, आत्मा से भी। पर यह दुनिया कोठरी को मान्यता देती है, आत्मा को नहीं। भूल जाती है कि कोठरी, आत्मा के कारण महान होती है...
‘‘मैं निधि महाराज का दर्शन-शास्त्र समझने की अवस्था में नहीं था, इसलिए फिर पूछा, ‘‘क्या मैंने इस माँ की कोख से जन्म नहीं लिया था ?’’

‘‘तुमने उसकी आत्मा से जन्म लिया था..’’
‘‘सो गोद लिये गये पुत्र को दत्तक पुत्र कहते हैं ?’’
‘‘कहने दो, जो कहते हैं...’’
लगा-पाताल गंगा में मैंने अपने बहते हुए रिश्ते को उस लकड़ी की तरह थामा हुआ है जिसके सहारे मैं शायद डूबने से बच सकता हूँ...

पूछा, ‘‘मेरी यह माँ और मेरा यह बाप मुझे कहाँ से लाया था ?’’
निधि महाराज क्षण-भर के लिए अन्तर्धान हो गये, फिर कहने लगे, ‘‘पिता को तुम्हारा सुख नसीब नहीं था। उनके निधन के बाद तुम्हारी माँ ने तुम्हें पाया था।’’

कहाँ से ? यह सवाल पाताल-गंगा में गोता लगाने जैसा सवाल था, इसलिए होंठों में हरकत नहीं हुई।
निधि महाराज ही कहने लगे, ‘‘उस वक़्त भी तुम्हारे इस चाचा ने बहुत मुसीबत खड़ी की थी। इस मकान का लोभ जो था ! सो उसने धर्म की आड़ ली कि विधवा स्त्री कोई पुत्र गोद नहीं ले सकती...’’
‘‘क्या ऐसी भी कोई वेद-आज्ञा है ?’’

‘‘इन्होंने वेद कब पढ़े हैं ! विधवा का धन, उसके दूर-नजदीक के सम्बन्धियों के हाथों से न निकल जाए, इसलिए ब्राह्मण-पूजा के वेदों में बारह प्रकार के पुत्र माने गये हैं। एक, जिसे जन्म दिया जाए। दूसरा, अपनी बेटी का पुत्र। तीसरा, अपनी पत्नी का दूसरे पुरुष से पैदा हुआ पुत्र। चौथा, अपनी कुँवारी कन्या का पुत्र। पाँचवाँ, पत्नी के पुनर्विवाह से हुआ पुत्र। छठा, दूसरे को गोद दिया गया पुत्र। सातवाँ, किसी माता-पिता से ख़रीदा हुआ पुत्र। आठवाँ, शुभ गुणों के कारण किसी को माना हुआ पुत्र। नौवाँ, किसी अनाथ बच्चे को पुत्र समान सोचा गया पुत्र। दसवाँ, विवाह के वक़्त गर्भवती स्त्री का पुत्र। ग्यारहवाँ, अपनी स्त्री से ऐसे पुरुष द्वारा उत्पन्न हुआ पुत्र जिसका पता न लगाया जा सके। और बारहवाँ, किसी कारण माँ-बाप का त्याग दिया गया पुत्र, जिसका पालन-पोषण किया जाए।’’

साँसें गोता खाने लगीं। पाताल, गंगा में नहीं, हैरानी में। मन आस-पास के समाज से निकलकर उस वक़्त की तरफ़ देखने लगा-जब कुँवारी कन्या का पुत्र भी दम्पती के लिए पुत्र हुआ करता था, और जब विवाह के वक़्त गर्भवती पत्नी का पुत्र भी पुत्र होता था...
आजकल के अख़बारों में मैंने प्रायः उन नालियों का ज़िक्र पढ़ा हुआ है, जिनमें सद्यःजात शिशु मृत अथवा जीवित मिलते हैं...
शायद माथा नहीं पर मन ज़रूर निधि महाराज के ज्ञान के आगे झुक गया।

सिर्फ़ इतना ही कहा, ‘‘माँ कई बार अपनी एक परलोक सिधार गयी बेटी का ज़िक्र किया करती थी। कहा करती थी, मरकर वही तुम्हारी सूरत में पैदा हो गयी-वही आँखें वही माथा वह हँसी...’’
साथ ही, ख़याल आया-जब माँ मेरी सूरत मृत बहन की सूरत के साथ मिलाती थी; तब सब स्वाभाविक लगता था। उसने मुझे कभी नहीं बताया कि मैं उसका गोद लिया हुआ पुत्र था। पर...
मुझे जैसे हँसी आ गयी। निधि महाराज से कहा, ‘‘आत्मा पुत्र को जन्म देती है, पर साथ ही शायद भ्रम भी पातली है। माँ यह भूल गयी कि उसकी मृत बेटी की सूरत लेकर मैं कैसे जन्म ले सकता हूँ।’’

निधि महाराज कुछ नहीं बोले। मैं ही माँ के उदास मन की बातें सुना-सुना कर माँ के भ्रम पर हँसता-सा रहा।
उन्होंने सिर्फ़ यह बताया कि तुम्हें गोद लेते वक़्त, तुम्हारे दूर के इस चाचा ने जो दुहाई दी थी, उस बात का खण्डन भी धर्म के नाम पर किया गया था। वह सच भी था। तुम्हारे पिता की मृत्यु अचानक हुई थी, मृत्यु से पहले उन्होंने तुम्हें गोद लेने का निश्चय किया हुआ था। इसलिए माँ भले ही विधवा थी, जब उसने तुम्हें गोद लिया तो उसके निश्चय में तुम्हारे पिता का निश्चय भी शामिल था। दोष मुझ पर भी लगाया गया था कि मैंने पूजा के लोभ में आकर तुम्हारी माँ को इस अधर्म से रोका नहीं था, पर झूठे दोष से क्या होता है...

उस वक़्त निधि महाराज ने अपने अँगोछे की गाँठ में बँधी हुई सोने की चूड़ियाँ मेरी हथेली पर रख दीं, जो आज सुबह माँ ने उनके चरणों में चढ़ायी थीं। कहने लगे, ‘‘चूड़ियाँ तुम्हारी माँ को बहुत प्यारी थीं। उसकी चल बसी बेटी की निशानी थीं ये। यह निशानी अब तुम्हारे पास रहनी चाहिए...’’
संकोच-सा हुआ। कहा, ‘‘पर यह माँ का दान है...’’

निधि महाराज हँस दिये-‘‘दान का हक़ सिर्फ़ तुम्हारी माँ को था, मुझे नहीं है ? तुम यह मेरा दान समझ लो। यह मेरी अन्तरात्मा की आवाज़ है कि चूड़ियाँ इसी घर में रहनी चाहिए। इस घर में जब घर की बहू आएगी, ये उसके हाथों में होनी चाहिए....’’
आज तक ब्राह्मण-लोभ की बात, जो भी देखी-सुनी थी, निधि महाराज ने मेरी आँखों के सामने उसका खण्डन कर दिया। इसलिए मन फिर एक बार उनके आगे झुक गया।

आज के तूफान के बाद, मैं इस सुख का पल सँभालकर अंजुलि में भर लेना चाहता था, पर हाथों में सामर्थ्य नहीं थी। मुँह से निकला, ‘‘आपने माँ से कभी नहीं पूछा था कि मैं कौन हूँ ?’’
निधि महाराज ने नज़र भरकर मेरी ओर देखा। बोले, ‘‘मैं सिर्फ़ यह जानता हूँ कि तुम एक धर्म-प्राण माँ के पुत्र हो। आज तुमने अपनी माँ के शब्द सुने थे,

जब उसने तुम्हारे पिता की तस्वीर को फूलों का हार पहनाया था ? वह फूलों की जयमाला थी। उसने कहा था-आज सत्ताईस तारीख़ है, आज बृहस्पति तुला में आया है, आज मेरा संजोग है...’’
माँ ने कहा था, पर उसकी बात मेरी समझ से बाहर रही आयी। इस वक़्त भी याद नहीं थी। निधि महाराज ने उसके शब्द दोहराये, तो याद आयी। मैंने पूछा, ‘‘मैं कुछ नहीं समझा था, इसका क्या मतलब था ?’’

‘‘वह तुम्हारे पिता के निधन के बाद सिर्फ़ तुम्हारा मुँह देखकर जीती रही। तुम्हें पालने के लिए, तुम्हें पढ़ाने के लिए, तुम्हें बड़ा करने के लिए। वैसे वह तुम्हारे पिता से बिछुड़कर जीना नहीं चाहती थी। वह इस दुनिया से विदा होकर, अगली दुनिया में तुम्हारे पिता से मिलने का इन्तज़ार कर रही थी...उसे मालूम था कि आज के दिन बृहस्पति तुला राशि में आएगा, और जिनके विवाह बहुत देर से रुके हुए हैं, उनके संजोग बनेंगे। उसने अपनी मृत्यु को भी तुम्हारे पिता के साथ संयोग का दिन माना। सोचा, अब वह अगली दुनिया में जाकर तुम्हारे पिता से मिल सकेगी। इसीलिए उसने किनारीवाला दुपट्टा ओढ़ा। तुम्हें पालकर बड़ा करनेवाले कर्तव्य से वह मुक्त हो गयी थी। उसके लिए यह मृत्यु उसके संयोग का दिन था। इसलिए कहता हूँ कि वह धर्मात्मा थी...’’

मैं बोल नहीं सका। मन का सवाल गूँगा-सा होकर निधि महाराज के मुँह की ओर ताकता रहा...
वह चले गये हैं...
सामने फिर अँधेरे की पाताल-गंगा बह रही है।
नहीं जानता कि मन का कौन-सा चिन्तन इस पाताल-गंगा में डूब जाएगा, और कौन-सा उस दूसरे किनारे पर जा लगेगा।

Sunday, August 16, 2009

एक असीम खमोशी थी
जो सूखे पत्तों की तरह झरती
या यूँ ही किनारे की रेत की तरह घुलती ...


पिछली पोस्ट में अमृता की कहानी का ज़िक्र था .उनकी कहानियाँ ज़िन्दगी के यथार्थ से बुनी हैं इस लिए दिल को छू जाती है और अपनी सी लगती हैं ...उनकी आज की कहानी पिघलती चट्टान नेपाल की कुमारी की व्यथा से जुडी है ..
रात के चौथे पहर में एक अकेली पगडण्डी पर राजश्री अकेली अपने पैरों के साथ बात करती जा रही है उसको महसूस होता है कि जैसे इस पगडण्डी से उसके पैरों की बात चीत बहुत लम्बी और बहुत पुरानी है शायद दो सौ बरस से भी अधिक पुरानी ..
अचानक उसके पैर चलते चलते एक स्थान पर ठहर जाते हैं और वह सोचने लगी है कि वह इस तरह से कहाँ जा रही है ..यह कौन सा रास्ता है ..सामने नदी में बहुत बड़ा भंवर पड़ा हुआ है जो उसकी तरफ मुस्करा के देखता है और कहता है वहीँ जा रही हो जहाँ दो सौ साल पहले तुम्हारे वंश की एक कुमारी रतनराज लक्ष्मी गयी थी ..यह सुन कर राजलक्ष्मी घबरा गयी उसने अपने आस पास देखा यहाँ उसके सिवा कोई और ना था
उसकी आँखों में एक हसरत सी भर गयी ...पैरों के लिए सिर्फ एक ही रास्ता क्यों ...कोई और रास्ता क्यों नहीं ....? इस पर्वत पर सिर्फ एक ही रास्ता क्यों बना ...
राजलक्ष्मी की इस बेबसी के साथ पढने वाले दिल भी बेबस हो जाते हैं ....
राजश्री चट्टानों एक बीच खड़ी जैसे खुद चट्टान हो गयी .उसके सवाल का कोई जवाब कहीं से नहीं मिलता है ...तभी एक नर्म सो आवाज़ उसको चौकना देती है रकसी ..वह किसी फूल की डंडी की तरह कांप उठती है और उस आवाज़ कि तरफ देखती है उस से कुछ ही दूर वह खडा जिसको रोज़ वह इसी पर्वत की परिक्रमा करते हुए देखती रहती है ...
मुझसे तुमसे सिर्फ कुछ बातें करनी है ..मुझे कुछ ती बात करने की इजाजत दो रकसी ....वह वहीँ खडा था ,पर उसकी आवाज़ उसके पास छल कर आ गयी
वह गुलाबी रंग की हो आई पर अपनी साडी की तरह सफ़ेद ठंडी आवाज़ में उसने कहा कि मैं रकसी नहीं हूँ मेरा नाम रकसी नहीं है ...
मुझे नहीं जानना है तुम्हारा नाम ..मैंने सिर्फ यहाँ रकसी पी है ..और मुझे लगता है कि यूँ इस धरती की रकसी से भी बढ़ कर कोई चीज हो ...
रकसी तो सिर्फ शराब होती है ..
पर अगर कोई धरती की मिटटी की भी शराब हो सकती है तो वह तुम हो ...
मैं ...........
तुम्हे देखा और मैं फिर इस धरती से लौट नहीं सका "
तुम ..राजश्री .की आवाज़ रात के चौथे पहर की हवा की तरह कोमल हो उठी ...और अधिक ठंडी भी ..तुम जिस देश से आये हो वहीँ लौट जाओ नहीं तो ...
नहीं तो ...
परदेशी ....
मेरा नाम कुमार है !
"अच्छा राजकुमार !!"
मैं राजकुमार नहीं !
सिर्फ कुमार हूँ साधारण सा कुमार ..
पर तुम्हारा इतिहास ..तुम जानते हो मैं कौन हूँ ?
कुमार ने किसी फूल की पहली खिली हुई पट्टी की तरह कहा इस मिटटी की बेटी ..इस मिटटी की शराब

राजश्री सीधी तन के खड़ी हो गयी और बोली नहीं मैं कुमारी हूँ ..तुम्हे पता है हमारे देश में कुमारी क्या होती है ?
नहीं
नीचे जा कर काठमांडू की वादी से जा कर किसी से भी पूछो पता चल जाएगा
मैं और किसी से मैंने कुछ नहीं पूछना जो पूछना है तुमसे ही पूछना है ..
मैं श्क्य्वंशी हूँ बोधियों के वन्दनीय वंश से बादियों से
फिर ?
मेरे वंश में जिस लड़की के रूप में बत्तीस लक्ष्ण हो
वह मैं देख रहा हूँ ..तुम मेरे सपनों से भी अधिक सुन्दर हो
पर मेरे वंश में जब लड़की सात वर्ष की होती है कुमारी चुनी जाती है
क्या मतलब ..?
तुम्हे शायद मेरी धरती का इतिहास नहीं मालूम ..यहाँ का राजा असल में सिर्फ राज का प्रतिनिधि होता था राज असल में कुमारी का होता था वह कुमारी घर में रहती थी और राजा उसकी पूजा करता था और राज काज संभलता था
पर वह तो पुराने समय की बात होगी ना !
हाँ , एक तरह से अब भी है ..अब भी मेरे वंश की लड़की उस वक़्त तक कुमारी रहती है जब तक वह जवान नहीं हो जाती है
फिर
वह जवान हो जाती है कुमारी नहीं रहती है उसकी जगह कोई और कुमारी ले लेती है और देश का राजा उसकी पूजा करता है
पर तुम अब ....
अब मैं कुमारी नहीं ..पर मैं कुमारी थी

मेरी मोहब्बत को तुम्हारे अत्तित से कोई वास्ता नहीं है तुम जो भी थी .

पर तुम्हे पता नहीं एक बात बताऊ

मैं आज रात इस वक़्त पूजा करनी आई पर कर नहीं पायी
क्यों ..?
मैं अपने शान्क्य वंश के बुद्ध से अपना आप मांगने आई थी .मेरा अपने आप ...राजश्री ने चट्टान की तरफ देखा और कहा कि कुमारी एक चटान की तरह होती है जो कभी पिघलती नहीं है ...पर मैं कई दिन से ऐसा लगा रहा है कि पिघल रही हूँ .तुम्हे देख कर ..रोज़ तुम्हे इस पर्वत की परिक्रमा में देखा है .यह कह कर वह अधिक उदास हो गयी ..कैसे सवेरा होने से पहले रात उदास हो जाती है ..मेरा अपना आप मुझसे छुटता जा रहा है ..सोचती हूँ अपने आप को हाथ में पकड़ कर भी क्या कर लूंगी ..
कुमार के पैर दिल की तरह धडक उठे ..कुछ आगे बढ़ कर वह उसके पास आगया और खिलते फूल की महक की तरह धीरे से बोला कुमारी ...
कुमारी को सारु उम्र इस तरह कुमारी रहना पड़ता है राजश्री ने यह कह कर अपना चेहरा दोनों हाथों से इस तरह धक् लिया जैसे पुरुष की गंध में सांस लेने से भी डरती हो ...और बोली यह कुमारी राज का कानून नहीं है पर जो कुमारी से शादी करता है वह मर जाता है ऐसा कहा जाता है ..
मुझे मरना मंजूर है ...कुमार ने दोनों हाथ राजश्री के हाथो पर फूलों जैसे कर दिए ..
राजश्री ने कांप कर अपने हाथ हटा लिए ..कहने लगी इस धरती पर पहले शक्ति राज होता था उस वक़्त से ही यह कानून बना है कि यदि कोई कुमारी जिसके साथ भी ब्याह करेगा वह जीता नहीं रहेगा ..
पर कुमारी एक समय का सच हर वक़्त का सच नहीं होता ...
पता नहीं राजश्री ने पर्वत के पीछे बह रही 'वसीगा" नदी की तरफ देखा और कहा कि मेरे वंश में मेरी तरह एक रत्नराज लक्ष्मी हुई थी वह मेरी ही तरह कुमारी चुनी गयी हाथो में राजा के भेजे हुए कंगन पहने गले में लाल रंग की चोली और लाल रंग का गहना माथे पर सिंदूर का लेप और फिर मेरी तरह वह भी जवान हुई उसको कुमारी घर से वापस उसकी माँ के घर भेज दिया गया वह भी इसी पर्वत पर घूमती रही ..और एक दिन इसी पर्वत के पीछे वाली नदी में डूब कर मर गयी
क्यों ?? कुमार ने थिरकती उंगिलयों से कुमारी के कंधे को छुआ
शायद उसको भी कोई कुमार पसंद आ गया था ..राजश्री ने कहा और थोडा सा हट कर पर्वत के नीचे उतर रहे रास्ते को देखने लगी .फिर बोली पिछले दो सौ सालों से भी अधिक हमारे पैरों के लिए यही रास्ता बना हुआ है हमें इसी रास्ते पर चलना है ..
नहीं नहीं !! ...कुमार ने आगे हो कर राजश्री का हाथ पकड़ लिया
राजश्री ने नदी के जैसा एक गहरा सांस लिया और कहने लगी जब किसी लड़की को कुमारी बनाया जाता है उसके माथे पर सोने चांदी की एक आँख लगाई जाती है तीसरी आँख ...उसको हम दृष्टि कहते हैं ..उस में सच मुच कोई शक्ति होती है उस से मन की ताकत कभी नहीं डोलती है ..पर अब ,,,अब तो इन साधारण आँखों से कोई और रास्ता नहीं दिखायी देता है
कुमार आगे आया और राजश्री को बिलकुल अपने पास करके उसके माथे को चूम लिया और यह एक मर्द का सारा इकरार .......तीसरी आँख ..! और कुमार ने राजश्री को नदी की तरफ से हटाते हुए कहा क्या इस तीसरी आँख से भी कोई रास्ता नहीं दिखाई देता .? जीने का रास्ता ...?
राजश्री ने सामने एक पर्वत जैसे मर्द को देखा फिर हथेली से उसकी छाती को इस तरह से छुआ जैसे यहाँ से कोई जीने का रास्ता खोज रही हो .कहने लगी जब सात बरस की बच्ची को कुमारी चुनते हैं पहले सारी रात एक कमरे में जानवरों की खोपड़ियों रख कर उस लड़की को कमरे में बंद कर देते हैं जो सारी रात ना घबराए वही कुमारी चुनी जाती है पर एक समय आता है ..उम्र का तकाजा जब वही कुमारी अपने आप से घबरा जाती है ..
कुमार ने राजश्री को कस कर अपन गले से लगा लिया और सवेरे का पहला उजाला हजारों चट्टानों के बीच खड़ी हुई एक पिघलती चट्टान को देखने लगा ...

मैंने तुझे एक मोड़ पर आवाज़ दी
और जब तूने पलट कर आवाज़ दी
तो हवाओं के गले में कुछ थरथराया
मिटटी के कण कुछ सरसराये
और नदी का पानी कुछ गुनगुनाया ,
पेड़ की टहनियां कुछ कस सी गयीं
पत्तों से एक झंकार उठी
फूलों की कोपल ने आँख झपकाई
और एक चिडिया के पंख हिले ....
यह पहला नाद था
जो कानों ने सुना था !

खुद से खुद की लड़ाई और फिर उस को पा लेना जैसे बहुत कुछ कह गया इस कहानी में ..



आने वाली ३१ अगस्त को अमृता जी का जन्मदिन है ..अभी तक आपको अमृता का पढा जो भी अच्छा लगा ही चाहे खुद से या इस ब्लॉग से वह मुझे मेल से भेजे ..उनके जन्मदिन पर उनका कहा, आपकी पसंद से इसी ब्लॉग पर रखा जाएगा ..शुक्रिया ..

Thursday, July 16, 2009

अमृता प्रीतम जी ने अनेक कहानियाँ लिखी है इन कहानियों में प्रतिबिम्बित हैं स्त्री पुरुष योग वियोग की मर्म कथा और परिवार ,समाज से दुखते नारी के दर्द के बोलते लफ्ज़ हैं ...कई कहानियाँ अपनी अमिट छाप दिल में छोड़ जाती है .....कुछ कहानियाँ अमृता जी ने खुद ही अपने लिखे से अलग संग्रह की थी और वह तो जैसे एक अमृत कलश बन गयी ..उन्हीं कहानियों में से एक कहानी है गुलियाना का एक ख़त ....जिसके नाम का अर्थ है फूलों सी औरत ......पर वह लोहे के पैरों से लगातार दो साल चल कर युगोस्लाविया से चल कर अमृता तक आ पहुंची |

अमृता ने मुस्करा कर उसका स्वागत किया और पूछा ---कि इतनी छोटी उम्र में क्यों इस तरह से देश देश भटक रही हो और क्या खोज रही हो ?
उसने मुस्करा के बहुत विश्वास और आँखों में चमक भर कर जवाब दिया कि कुछ लिखना चाहती हूँ मगर लिखने से पहले दुनिया देखना चाहती हूँ ..बहुत से देश घूम चुकीं हूँ ..जैसे फ्रांस ,इटली ,जापान आदि पर बहुत से घूमने बाकी हैं ...

अच्छा बहुत अच्छा अमृता ने कहा ..पर तुम्हारे देश में कोई तुम्हारी राह देखता होगा न ?

हाँ मेरी माँ मेरी राह देख रही है ..वह हर एक ख़त को मेरा आखिरी ख़त समझ लेती है उसके बाद दूसरे ख़त आने तक उसको यकीन नहीं आता कि मेरा कोई और ख़त आएगा ...

अच्छा ऐसा क्यों ? अमृता ने पूछा

वह सोचती है कि मैं यूँ चलते चलते मर जाउंगी एक दिन ..इस लिए मैं उसको बहुत लम्बे लम्बे ख़त लिखती हूँ ..वह पढ़ नहीं सकती पर वह ख़त को किसी न किसी तरह किसी से पढ़वा लेती है और इस तरह मेरी आँखों से सारी दुनिया देखती रहती है ...

अच्छा गुलियाना तुमने अब तक जितनी दुनिया देखी है वह तुम्हे कैसी लगी ? क्या कहीं किसी ने तुम्हारा हाथ थाम कर कहा नहीं कि बस यही रुक जाओ ..आगे मत जाओ ...
हाँ मैं चाहती थी कि कोई मुझे बाँध ले रोक ले .........मुझे थाम ले ...पर ..ज़िन्दगी कभी किसी के हाथ आई है क्या ? मैं शायद ज़िन्दगी से कुछ अधिक मांगती हूँ ..मेरा देश गुलाम था जब मैं इसकी लड़ाई में शामिल हो गयी इसको आज़ाद करवाने के लिए ...
कब ..?
१९४१ में हमने इस से बगावत करनी शुरू की ..बहुत छोटी थी तब मैं ...
वह दिन तो बहुत मुश्किल रहे होंगे न..?
हाँ चार साल बहुत मुश्किल थे ..हम छिप छिप कर कई महीने यूँ ही काट देते थे ...कई बार दुश्मन हमारा पता पा जाते थे ..एक रात तो हम ६० मील तक चले थे ...
६० मील ? तुम्हारे नाजुक बदन में इतनी ताक़त थी क्या ?
यह तो एक रात की बात है ...तब हम तीन सौ साथी रहे होंगे ..पर सारी उम्र चलने के लिए और कितनी जान चाहिए ..और वह भी अकेले ..
अमृता ने लम्बी सांस भर कर कहा .."गुलियाना ..!!"
चलो कोई अच्छी बात करते हैं ...मुझे कोई अपना गीत सुनाओ
तुमने कभी कोई गीत लिखा है गुलियाना ?
पहले लिखा करती थी ...फिर यूँ महसूस हुआ कि मैं गीत नहीं लिख सकती शायद अब लिखूंगी
कैसे गीत लिखोंगी तुम ?
प्यार के गीत ?
प्यार के गीत में लिखना चाहती थी पर शायद अब नहीं लिख पाउंगी .हो सकता है वह प्यार के ही गीत हो पर उस प्यार के नहीं जो एक फूल की तरह गमले में उगते हैं ..मैं उस प्यार के गीत लिखूंगी जो गमले में नहीं उगता जो सिर्फ धरती में उग सकता है ...
उसकी बात सुन कर अमृता चौंक गयी ..उन्हें ऐसा लगा कि जैसे इस धरती को गुलियाना का बहुत सा कर्जा देना है उसके दिल और और उसके हुस्न का कर्जा बहुत सा कर्जा ..पर धरती उसका यह कर्जा कभी नहीं चुका पाएगी ..

गुलियाना ने कहा मैंने कहा था न कि मैं ज़िन्दगी से कुछ अधिक मांग लेती हूँ ..

यह तो जरुरत से अधिक नहीं है गुलियाना सिर्फ उतना ही है जितना तुम्हारे दिल में समा सके ...
पर दिल के बराबर कुछ नहीं आता ..हमारे देश का एक लोक गीत है ..
तेरी डोली कहारों ने उठायी
खाट को कन्धा कौन देगा
मेरी
खाट को कन्धा कौन दे ..
सुन कर अमृता ने पूछा क्या तुमने कभी किसी से प्यार किया है गुलियाना ?
कुछ किया जरुर था पर वह प्यार नहीं था .अगर प्यार होता तो ज़िन्दगी से लम्बा होता साथ ही उसको भी मेरी उतनी ही जरूरत होती जितनी मुझे उसको जरूरत थी ..मैंने विवाह भी किए था पर वह विवाह उस गमले के फूलकी तरह था जिस से मेरे मन पर कभी फूल नहीं उगा
पर यह धरती ?क्या तुम्हे इस धरती से डर लगता है ?
धरती तो जरखेज है गुलियाना इस से कैसे डर लगेगा ? अमृता ने कहा
मुझे मालूम है तुम्हे किस से डर लगता है ..क्यों कि मुझे भी उस से ही डर लगता है ...इसी डर से रुष्ट हो कर तो मैं इस दुनिया में निकल पड़ी हूँ ...आखिर एक फूल को इस धरती पर उगने का हक क्यों नहीं दिया जाता जिस फूल का नाम औरत हो ...मैंने उन लोगों से हठ ठाना हुआ है जो किसी फूल को धरती में उगने नहीं देते हैं खासकर उस फूल को जिसका नाम औरत हो ...यह सभ्यता का युग नहीं है सभ्यता का युग तब आएगा जब औरत की मर्ज़ी के बिना उसके जिस्म को हाथ नहीं लगाया जाएगा

सही कहा तुमने गुलियाना ..वैसे अपने गुजारे के लिए तुम क्या करती हो ?
मैं छोटे छोटे सफरनामे लिखती हूँ उनको छपने के लिए अपने देश भेज देती हूँ ..कुछ पैसे मिल जाते हैं कुछ अनुवाद कर देती हूँ मुझे फ्रेंच अच्छी तरह से आती है मैं फ्रेंच कि पुस्तकों का नुवाद अपनी देश की भाषा में करती हूँ ..वापस जा कर शायद मैं बड़ा सफ़र नामा लिख सकूँ शायद वो गीत भी जो सोते हुए मेरे दिल में मंडराने लगता है पर जागने पर नजर नहीं आता ..
अच्छा मुझे वह गीत सुनाओ ..
वह गीत को तो मैं खोज रही हूँ ...बिना बात के ही उस में दो पंक्तियाँ जुडी है इस से आगे का गीत बनता ही नहीं है कोई बात होगी तो गीत आगे बनेगा न ..और एक टूटे हुए गीतकी तरह वह अमृता की तरफ देखने लगी ..और उनको अपने अधूरे गीत की दो कडियाँ सुनाई ..

आज किसने आसमान का जादू तोडा ?
आज किसने तारों का गुच्छा उतारा ?
और चाबियों को गुच्छे की तरह बाँधा ,
मेरी कमर से चाबियों को बाँधा ?

और यह कह कर गुलियाना बोली मुझे यहाँ कमर पर चाबियों कभी तरह कई तरह के तार बंधे महसूस होते हैं ....
और अमृता सोचने लगी ..कि इसधरती पर वे घर कब बनेंगे जिनके दरवाजे तारों की चाबियों से खुलते होंगे ?

तुम क्या सोच रही हो
अमृता ने कहा मैं सोचती थी कि की क्या तुम्हारे देश में भी औरते अपनी कमर में चाबियों के गुच्छे बंधा करती है ?
हाँ दादी -नानी बाँधा करती थी ..
चाबियों से घर का ख्याल आता है और घर से आदिम सपने का ...
देखो ना इसी सपने को खोजती खोजती मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गयी हूँ ...अब मैं अपने गीतों को सपनो की अमानत दे जाउंगी .
धरती का कर्ज़ तुम्हारे सिर पर और हो जायेगा ? अमृता ने सुन कर कहा
कर्ज़ की बात सुन कर गुलियाना हंसने लगी ..और अमृता सोचने लगी कि यदि गुलियाना का हुलिया कोई अपने कागजों में दर्ज़ करे तो वह इस तरह सेलिखेगा

नाम ..गुलियाना सायेनोबिया
बाप का नाम ...निकोलोयियन सायोनोबिया
जन्म शहर .मेसेडोनिया
कद ..पाँच फुट तीन इंच
बालों का रंग ......भूरा
आँखों का रंग ....स्लेटी
पहचान का चिन्ह
उसके निचले होंठो पर एक तिल है और बायीं और पलक पर एक जख्म का निशान है
और उस से बात करते हुए अमृता को महसूस हुआ कि किसी दिलवाले इंसान ने अगर अपनी ज़िन्दगी के कागजों में गुलियाना का हुलिया दर्ज़ किया तो वह इस तरह से लिखेगा

नाम _ फूलों सी महक सी एक औरत
बाप का नाम _ इंसान का एक सपना
जन्म शहर _ धरती की बड़ी जरखेज मिटटी
कद _ उसका माथा तारों से छूता है |
बालों का रंग _ धरती के रंग जैसा
आँखों का रंग _ आसमान के रंग जैसा
पहचान का निशान _ उसके होंठो पर ज़िन्दगी की प्यास है और उसके रोम रोम पर सपनों का बौर पड़ा है |

कितनी हैरानी की बात थी कि ज़िन्दगी ने गुलियाना को जन्म दिया था पर बाद में उसकी खबर लेना भूल गयी ..पर अमृता हैरान नहीं थी क्यों कि यह ज़िन्दगी कि पुरानी आदत है बिसार देने की ..इस लिए उन्होंने हँस कर गुलियाना से कहा कि हमारे देश में एक बूटी होती है जिसे ब्राम्ही बूटी कहते हैं कहते हैं यदि इसको पीस कर पी ले तो स्मरण शक्ति वापस आ जाती है ..चल ज़िन्दगी को वही पिला देते हैं ताकि उसको हम याद आ जाएँ ......

यह सुन कर गुलियाना हंस पड़ी और बोली .कि जब भी तुम कोई प्यार का गीत लिखती हो ..या कोई और भी तो वहजंगल में से वही बूटी ही तोड़ रहा होता है ...शायद कभी वह दिन आये जब हम ज़िन्दगी को यह बूटीपिला दे
गुलियाना तो यह कह कर चली गयी ..पर उसके बाद जब भी अमृता कोई गीत लिखती उन्हें उसको बात याद आ जाती कि हम सब मन के जंगल से ब्राम्ही बूटियाँ बीन रहे हैं ..हम शायद किसी दिन ज़िन्दगी को इतनी बूटीपिलादेंगे कि उसको हम याद आ जाएँ
पांच महीने होने को आये गुलियाना का कोई ख़त नहीं आया और अब कई महीने बीत जायेंगे उसका कोई ख़त नहीं आएगा ..क्यों कि आज के अखबार में खबर छपी है ..कि दो देशों कि सीमा पर कुछ फोजियों ने एक परदेशी औरत को खेतों में घेर लिया ..उसको बहुत चिंता जनक हालत में अस्पताल पहुंचाया गया है वहां उसकी मौत हो गयी ...उसका पास पोर्ट और उसके कागज जली हुई हालत में मिले हैं .औरत का कद पांच फुट तीन इंच है ..उसके बालों का रंग भूरा और आँखों का रंग स्लेटी है ..उसके निचले होंठो पर एक तिल है ..और बायीं पलक के नीचे एक जख्म का निशान है
यह अखबार की खबर नहीं अमृता सोचती है यह तो उसका एक ख़त है ..जो ज़िन्दगी के घर से जाते हुए उसने ज़िन्दगी को लिखा है और उसने ख़त में ज़िन्दगी से सबसे पहले यह सवाल पूछा है ...कि आखिर ...इस धरती पर उस फूल को कब आने का अधिकार क्यों नहीं दिया गया जिसका नाम औरत है ? और साथ ही पूछा है कि वह सभ्यता का युग कब आएगा जब औरत की मर्ज़ी के बिना कोई उसको हाथ नहीं लगा सकेगा ? और तीसरा सवाल यह पूछा है कि जिस घर के दरवाज़े खोलने के लिए उसने अपनी कमर में तारों के गुच्छे को चाबियों को गुच्छे की तरहबांधा था उस घर का दरवाजा आखिर कहाँ है ?

अमृता की यह कहानी आज भी उतनी ही सच्ची बात कहती है ...जो ज़िन्दगी से सवाल आज भी यही करती नजर आती है ...और यह सवाल अक्सर बिना जवाब के हैं ...अमृता को अपनी पसंद कहानियों में से यह एक उनकी पसंदकी कहानी है आगे भी इसी तरह इसका सिलसिला जारी रहेगा ...यदि किसी के पास उनके इन सवालों के जवाब हो तो जरुर दे ...