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Monday, November 8, 2010

आज तारों ने फिर कहा,
उम्र के महल में अब भी
हुस्न के दीये से जल रहे-
तू नहीं आया....

किरणों का झुरमुट कह रहा,
रातों की गहरी नींद से
उजाला अब भी जागता-
तू नहीं आया...........

अमृता प्रीतम से पूछे गए सवालों में से एक सवाल पढा हुआ याद आ रहा है ...उनसे पूछा गया कि ज़िन्दगी में आपको किस चीज ने प्रभावित किया ..
१) इश्क के क्षेत्र में
२) साहित्य के क्षेत्र में 
३)ज्ञान के क्षेत्र में 
४) सामाजिक क्षेत्र में
५)राजनितिक क्षेत्र में 
६ )धर्म के  क्षेत्र में 
७)आम जीवन के क्षेत्र में 
८) दर्शन के क्षेत्र में 


1)इश्क के क्षेत्र में "चूरियां रो दी "और "छन्ने बिलख उठे "वाल दर्द मेरी रगों में है ..एक वाकया सुनाती हूँ  १९६१ में जब मैं पहली बार रूस गयी थी तब ताजिकस्तान में एक मर्द और एक औरत से मिली जो एक नदी के किनारे लकड़ी की एक कुटिया बना कर रहते थे ,औरत की  नीली और मर्द कि कालीं  आँखों में क्षण क्षण जीए हुए इश्क का जलाल था पता चला अब की  साठ सत्तर बरस की  उम्र इश्क का एक दस्तवेज है मर्द की   उठती जवानी थी जब वह किसी  काम से कश्मीर से यहाँ आया था और उस नीली आँखों वाले सुंदरी की आँखों में खो कर यही का हो कर रहा गया था और  फिर कश्मीर नहीं  लौटा वह दो देशों की  नदियों की  तरह मिले और उनका पानी एक हो गया वही यही एक कुटिया बना कर रहने लगे अब यह कुटिया उनके  इश्क की  दरगाह है औरत माथे पर स्कार्फ  बांध कर और गले में एक चोगा पहन कर जंगल के पेडो की देखभाल करने लगी और मर्द अपनी पट्टी का कोट पहन कर  आज तक उसके काम में हाथ बंटाता है  
वहां मैंने हरी कुटिया के पास बैठ कर उनके हाथो उस पहाड़ी नदी का पानी पीया और एक  मुराद मांगी थी कि मुझे उनके जैसे ज़िन्दगी नसीब हो यह खुदा के फजल कहूँगी कि मुझे वह मुराद मिली है 

२)शायरी की  पहली लो मुझे वारिस के अक्षरों में दिखाई दी और नस्र का नया कोण शरदचंद्र  के अक्षरों में 

३)ज्ञान के क्षेत्र में रजनीश का कोई सानी नहीं अंतर्मन की मिटटी में पड़े हुए बीज का इल्म की किरण का मिलन मैंने रजनीश के चिंतन में देखा 

४) सामाजिक क्षेत्र  में मुझे किसी व्यक्ति  ने प्रभावित नहीं किया है लेकिन महाराष्ट्र   के एक गांव शनिसिंग्नापुर ने जरुर किया है इस गांव में सदियों से कोई चोरी नहीं हुई है और  यहाँ कोई ताला नहीं लगाया जाता है ,घर के बीतर जाने के रास्ता है पर कोई दरवाजा नहीं कोई सांकल नहीं घरों में जैसे दाल  चावल रखे जाते हैं वैसे ही सोना चांदी रखे  जाते हैं और कोई चोरी नहीं करता है 
 
५) राजीनति के क्षेत्र में मुझे जवाहर लाल नेहरु और वियतनाम के प्रधनमंत्री हो -ची -मिन्ह ने प्रभावित किए है नेहरु जी से हुई मुलाकातें मैंने एक जगह लिखा है कि  मुझे बहुत सहज लगी है कहीं भी कोई संकोच नहीं जो किसी में नहीं  मिला आज तक ,यह आत्मा के सहज सोंदर्य के बिना संभव नहीं है और हो -ची- मिन्ह से हुई मेरी मुलाक़ात भी उसी आयाम की  बात है जो दुनिया की  राजनीति का अगर  एक पहलु बन जाए तो दुनिया की सूरत ही बदल जाए 
 
६) सुलतान बाहू के हर्फ में मैंने धर्म क्षेत्र को पहचाना ईमान सलामत हर कोई छाए इश्क सलामत कोई हु जिस मंजिल को इश्क ले जाए ईमाने खबर न होई हु 
 
७) आम ज़िन्दगी में मैं अपने पिता से बहुत प्रभावित हुई जिन्होंने दुनिया से कुछ लेने की  मेरी छोटी उम्र की  नासमझ तमन्ना  को एक बार माथे पर तेवरी चढ़ा कर देखा था और मैं उसी क्षण  बड़ी हो गयी 
 
८) दर्शन के क्षेत्र  में दो नाम मैं एक साथ लेना चाहूंगी आइनरेंड और विवेकानंद आईनरेंड  ने बीज रूप में  इन्डिविजुललिटी  की  पहचान पाई है और विवेकानंद  ने उस बीज के विकसित होने में जहाँ इन्डिविजुललिटी युनिवर्सल इन्डिविजुललिटी बन जाती है

Thursday, June 24, 2010

अमृता तो
वारिस शाह के कुल से जन्मी
कोई लड़की है
बीसवीं सदी में
शब्द सूत कात रही है
कहती है --
मैंने तो डलिया में से
कुछ पूनियां ही काती है
और काते बैठी है
दोनों पंजाब की सारी रुई ....


एक सदी जा रही है
अंतिम पलों में है
एक नदी जा रही है
अंतिम क़दमों में है
समंदर की और बह रही है
समन्दर को पता है
वह और हो जाएगा बड़ा


समन्दर सोचता है
कैसे करूँगा मैं उसका स्वागत
कौन सा होगा उसका प्रवेश द्वार
कौन स होगा उसका स्वागती द्वार
पूरा समन्दर नदी के स्वागत में है
तब नदी हो जाएगी समन्दर
धरती सोचेगी --मैं अब वह नहीं रही
समन्दर धाराओं से कहता है
तुमको बनना है कुरान की आयतें
मुझकों बनना है धर्म ग्रन्थ की देह
इस तरह हम चिंतन यज्ञ रचाएं
हो सकेगा --मेरी बच्ची का स्वागत !!!

Saturday, January 2, 2010

सारा का पहला ख़त अमृता को १६ सितम्बर १९८० में मिला उस में लिखा था ...

अमृता बाजी ! मेरे तमाम सूरज आपके
मेरे परिंदों की शाम भी चुरा ली गयी है !आज दुःख भी रूठ गया है कहते हैं ...

फैसले कभी भी फासलों के सपुर्द मत करना !
मैंने तो फासला आज तक नहीं देखा
यह कैसी आवाजें हैं जैसे रात जले कपड़ों में घूम रही है
जैसे कब्र पर कोई आँखे रख गया हो !

मैं दीवार के करीब मीलों मील चली और इंसानों से आज़ाद हो गयी
मेरा नाम कोई नहीं जानता ..दुश्मन इतने वसीह क्यों हो गए हैं
मैं औरत --अपने चाँद में आसमान का पैबंद क्यों लगाऊं !

मील पत्थर ने किसका इन्तजार किया !
औरत रात में रच गयी अमृता बाजी !
आखिर खुदा अपने मन में क्यों नहीं रहता !

आग पूरे बदन को छू गयी है
संगे मील .मीलों चलता है और साकत है
मैं अपनी आग में एक चाँद रखती हूँ
और नंगी आँख से मर्द कमाती हूँ
लेकिन मेरी रात मुझसे पहले जाग गयी है
मैं आसमान बेच कर चाँद नहीं कमाती .....

ख़त उर्दू में था .अमृता इमरोज़ की मदद से इसको पढ़ रही थी उन्होंने ख़त पर हाथ रख दिया ..और इमरोज़ से कहा ठहरो और नहीं ...और वह लड़की कह रही थी ..मैं आसमान बेचकर चाँद नहीं कमाती ..अमृता की रगों में उतरने लगी ...लगा आसमान फरोशों की इस दुनिया में यह सारा नाम की लड़की कहाँ से आ गयी ? आ गयी है तो इस दुनिया में जीएगी कैसे ?आगे लिखा था उस ख़त में ...

कदम कदम पर घूँघट की फरमाइश है ,
लेकिन मेरे नजदीक शर्म का एक अँधेरा है ........."

सारा की एक नज्म में ठीक इसी अँधेरे की तफसील है "शर्म क्या होती है औरत ! शर्म मरी हुई गैरत होती है "
इमरोज़ ख़त पढ़ रहे थे --जिस्म के अलावा मैं शेर भी कहती हूँ .शहवत में मरे हुए लोग मुझे दाद देते हैं तो मेरे गुनाह जल उठते हैं ...अमृता बाजी ! दिल बहुत उदास है ,सो आपसे बात कर ली आज कल मेरे पास दीवारें हैं और वक़्त है ...हमने तो आपकी मोहब्बत में किनारे गंवा दिए और समुन्द्र की हामी भर ली .....आँखे मुझे क्यों नापती है ?क्या इंसान के जिस्म में ही सारे राज रह गए हैं ?
मिटटी बोली लगाती है मौसम की ...सच्च है .कायनात के खातमे पर जो चीज रह जायेगी ,वह सिर्फ वक़्त होगा ...मैं अपने रब का ख्याल हूँ ,और मरी हुई हूँ ...

अमृता ने तड़प कर ख़त रख दिया और जैसे कभी खुद से कहती थी ..आओ अमृता मेरे पास आओ ..वैसे कहा आओ !सारा मेरे पास आओ ...
और सारा की एक नजम अमृता ने यूँ पढ़ी ....

अभी औरत ने सिर्फ रोना ही सीखा है
अभी पेड़ों ने फूलों की मक्कारी ही सीखी है
अभी किनारों ने सिर्फ समुन्द्र को लूटना सीखा है
औरत अपने आंसुओं से वुजू कर लेती है
मेरे लफ़्ज़ों ने कभी वुजू नहीं किया
और रात खुदा ने मुझे सलाम किया ...

अमृता के साथ मेरे दिल ने भी सारा से कहा ! आज खुदा से मिल कर मैं भी तुम्हे सलाम कहती हूँ ....

Sunday, August 16, 2009

एक असीम खमोशी थी
जो सूखे पत्तों की तरह झरती
या यूँ ही किनारे की रेत की तरह घुलती ...


पिछली पोस्ट में अमृता की कहानी का ज़िक्र था .उनकी कहानियाँ ज़िन्दगी के यथार्थ से बुनी हैं इस लिए दिल को छू जाती है और अपनी सी लगती हैं ...उनकी आज की कहानी पिघलती चट्टान नेपाल की कुमारी की व्यथा से जुडी है ..
रात के चौथे पहर में एक अकेली पगडण्डी पर राजश्री अकेली अपने पैरों के साथ बात करती जा रही है उसको महसूस होता है कि जैसे इस पगडण्डी से उसके पैरों की बात चीत बहुत लम्बी और बहुत पुरानी है शायद दो सौ बरस से भी अधिक पुरानी ..
अचानक उसके पैर चलते चलते एक स्थान पर ठहर जाते हैं और वह सोचने लगी है कि वह इस तरह से कहाँ जा रही है ..यह कौन सा रास्ता है ..सामने नदी में बहुत बड़ा भंवर पड़ा हुआ है जो उसकी तरफ मुस्करा के देखता है और कहता है वहीँ जा रही हो जहाँ दो सौ साल पहले तुम्हारे वंश की एक कुमारी रतनराज लक्ष्मी गयी थी ..यह सुन कर राजलक्ष्मी घबरा गयी उसने अपने आस पास देखा यहाँ उसके सिवा कोई और ना था
उसकी आँखों में एक हसरत सी भर गयी ...पैरों के लिए सिर्फ एक ही रास्ता क्यों ...कोई और रास्ता क्यों नहीं ....? इस पर्वत पर सिर्फ एक ही रास्ता क्यों बना ...
राजलक्ष्मी की इस बेबसी के साथ पढने वाले दिल भी बेबस हो जाते हैं ....
राजश्री चट्टानों एक बीच खड़ी जैसे खुद चट्टान हो गयी .उसके सवाल का कोई जवाब कहीं से नहीं मिलता है ...तभी एक नर्म सो आवाज़ उसको चौकना देती है रकसी ..वह किसी फूल की डंडी की तरह कांप उठती है और उस आवाज़ कि तरफ देखती है उस से कुछ ही दूर वह खडा जिसको रोज़ वह इसी पर्वत की परिक्रमा करते हुए देखती रहती है ...
मुझसे तुमसे सिर्फ कुछ बातें करनी है ..मुझे कुछ ती बात करने की इजाजत दो रकसी ....वह वहीँ खडा था ,पर उसकी आवाज़ उसके पास छल कर आ गयी
वह गुलाबी रंग की हो आई पर अपनी साडी की तरह सफ़ेद ठंडी आवाज़ में उसने कहा कि मैं रकसी नहीं हूँ मेरा नाम रकसी नहीं है ...
मुझे नहीं जानना है तुम्हारा नाम ..मैंने सिर्फ यहाँ रकसी पी है ..और मुझे लगता है कि यूँ इस धरती की रकसी से भी बढ़ कर कोई चीज हो ...
रकसी तो सिर्फ शराब होती है ..
पर अगर कोई धरती की मिटटी की भी शराब हो सकती है तो वह तुम हो ...
मैं ...........
तुम्हे देखा और मैं फिर इस धरती से लौट नहीं सका "
तुम ..राजश्री .की आवाज़ रात के चौथे पहर की हवा की तरह कोमल हो उठी ...और अधिक ठंडी भी ..तुम जिस देश से आये हो वहीँ लौट जाओ नहीं तो ...
नहीं तो ...
परदेशी ....
मेरा नाम कुमार है !
"अच्छा राजकुमार !!"
मैं राजकुमार नहीं !
सिर्फ कुमार हूँ साधारण सा कुमार ..
पर तुम्हारा इतिहास ..तुम जानते हो मैं कौन हूँ ?
कुमार ने किसी फूल की पहली खिली हुई पट्टी की तरह कहा इस मिटटी की बेटी ..इस मिटटी की शराब

राजश्री सीधी तन के खड़ी हो गयी और बोली नहीं मैं कुमारी हूँ ..तुम्हे पता है हमारे देश में कुमारी क्या होती है ?
नहीं
नीचे जा कर काठमांडू की वादी से जा कर किसी से भी पूछो पता चल जाएगा
मैं और किसी से मैंने कुछ नहीं पूछना जो पूछना है तुमसे ही पूछना है ..
मैं श्क्य्वंशी हूँ बोधियों के वन्दनीय वंश से बादियों से
फिर ?
मेरे वंश में जिस लड़की के रूप में बत्तीस लक्ष्ण हो
वह मैं देख रहा हूँ ..तुम मेरे सपनों से भी अधिक सुन्दर हो
पर मेरे वंश में जब लड़की सात वर्ष की होती है कुमारी चुनी जाती है
क्या मतलब ..?
तुम्हे शायद मेरी धरती का इतिहास नहीं मालूम ..यहाँ का राजा असल में सिर्फ राज का प्रतिनिधि होता था राज असल में कुमारी का होता था वह कुमारी घर में रहती थी और राजा उसकी पूजा करता था और राज काज संभलता था
पर वह तो पुराने समय की बात होगी ना !
हाँ , एक तरह से अब भी है ..अब भी मेरे वंश की लड़की उस वक़्त तक कुमारी रहती है जब तक वह जवान नहीं हो जाती है
फिर
वह जवान हो जाती है कुमारी नहीं रहती है उसकी जगह कोई और कुमारी ले लेती है और देश का राजा उसकी पूजा करता है
पर तुम अब ....
अब मैं कुमारी नहीं ..पर मैं कुमारी थी

मेरी मोहब्बत को तुम्हारे अत्तित से कोई वास्ता नहीं है तुम जो भी थी .

पर तुम्हे पता नहीं एक बात बताऊ

मैं आज रात इस वक़्त पूजा करनी आई पर कर नहीं पायी
क्यों ..?
मैं अपने शान्क्य वंश के बुद्ध से अपना आप मांगने आई थी .मेरा अपने आप ...राजश्री ने चट्टान की तरफ देखा और कहा कि कुमारी एक चटान की तरह होती है जो कभी पिघलती नहीं है ...पर मैं कई दिन से ऐसा लगा रहा है कि पिघल रही हूँ .तुम्हे देख कर ..रोज़ तुम्हे इस पर्वत की परिक्रमा में देखा है .यह कह कर वह अधिक उदास हो गयी ..कैसे सवेरा होने से पहले रात उदास हो जाती है ..मेरा अपना आप मुझसे छुटता जा रहा है ..सोचती हूँ अपने आप को हाथ में पकड़ कर भी क्या कर लूंगी ..
कुमार के पैर दिल की तरह धडक उठे ..कुछ आगे बढ़ कर वह उसके पास आगया और खिलते फूल की महक की तरह धीरे से बोला कुमारी ...
कुमारी को सारु उम्र इस तरह कुमारी रहना पड़ता है राजश्री ने यह कह कर अपना चेहरा दोनों हाथों से इस तरह धक् लिया जैसे पुरुष की गंध में सांस लेने से भी डरती हो ...और बोली यह कुमारी राज का कानून नहीं है पर जो कुमारी से शादी करता है वह मर जाता है ऐसा कहा जाता है ..
मुझे मरना मंजूर है ...कुमार ने दोनों हाथ राजश्री के हाथो पर फूलों जैसे कर दिए ..
राजश्री ने कांप कर अपने हाथ हटा लिए ..कहने लगी इस धरती पर पहले शक्ति राज होता था उस वक़्त से ही यह कानून बना है कि यदि कोई कुमारी जिसके साथ भी ब्याह करेगा वह जीता नहीं रहेगा ..
पर कुमारी एक समय का सच हर वक़्त का सच नहीं होता ...
पता नहीं राजश्री ने पर्वत के पीछे बह रही 'वसीगा" नदी की तरफ देखा और कहा कि मेरे वंश में मेरी तरह एक रत्नराज लक्ष्मी हुई थी वह मेरी ही तरह कुमारी चुनी गयी हाथो में राजा के भेजे हुए कंगन पहने गले में लाल रंग की चोली और लाल रंग का गहना माथे पर सिंदूर का लेप और फिर मेरी तरह वह भी जवान हुई उसको कुमारी घर से वापस उसकी माँ के घर भेज दिया गया वह भी इसी पर्वत पर घूमती रही ..और एक दिन इसी पर्वत के पीछे वाली नदी में डूब कर मर गयी
क्यों ?? कुमार ने थिरकती उंगिलयों से कुमारी के कंधे को छुआ
शायद उसको भी कोई कुमार पसंद आ गया था ..राजश्री ने कहा और थोडा सा हट कर पर्वत के नीचे उतर रहे रास्ते को देखने लगी .फिर बोली पिछले दो सौ सालों से भी अधिक हमारे पैरों के लिए यही रास्ता बना हुआ है हमें इसी रास्ते पर चलना है ..
नहीं नहीं !! ...कुमार ने आगे हो कर राजश्री का हाथ पकड़ लिया
राजश्री ने नदी के जैसा एक गहरा सांस लिया और कहने लगी जब किसी लड़की को कुमारी बनाया जाता है उसके माथे पर सोने चांदी की एक आँख लगाई जाती है तीसरी आँख ...उसको हम दृष्टि कहते हैं ..उस में सच मुच कोई शक्ति होती है उस से मन की ताकत कभी नहीं डोलती है ..पर अब ,,,अब तो इन साधारण आँखों से कोई और रास्ता नहीं दिखायी देता है
कुमार आगे आया और राजश्री को बिलकुल अपने पास करके उसके माथे को चूम लिया और यह एक मर्द का सारा इकरार .......तीसरी आँख ..! और कुमार ने राजश्री को नदी की तरफ से हटाते हुए कहा क्या इस तीसरी आँख से भी कोई रास्ता नहीं दिखाई देता .? जीने का रास्ता ...?
राजश्री ने सामने एक पर्वत जैसे मर्द को देखा फिर हथेली से उसकी छाती को इस तरह से छुआ जैसे यहाँ से कोई जीने का रास्ता खोज रही हो .कहने लगी जब सात बरस की बच्ची को कुमारी चुनते हैं पहले सारी रात एक कमरे में जानवरों की खोपड़ियों रख कर उस लड़की को कमरे में बंद कर देते हैं जो सारी रात ना घबराए वही कुमारी चुनी जाती है पर एक समय आता है ..उम्र का तकाजा जब वही कुमारी अपने आप से घबरा जाती है ..
कुमार ने राजश्री को कस कर अपन गले से लगा लिया और सवेरे का पहला उजाला हजारों चट्टानों के बीच खड़ी हुई एक पिघलती चट्टान को देखने लगा ...

मैंने तुझे एक मोड़ पर आवाज़ दी
और जब तूने पलट कर आवाज़ दी
तो हवाओं के गले में कुछ थरथराया
मिटटी के कण कुछ सरसराये
और नदी का पानी कुछ गुनगुनाया ,
पेड़ की टहनियां कुछ कस सी गयीं
पत्तों से एक झंकार उठी
फूलों की कोपल ने आँख झपकाई
और एक चिडिया के पंख हिले ....
यह पहला नाद था
जो कानों ने सुना था !

खुद से खुद की लड़ाई और फिर उस को पा लेना जैसे बहुत कुछ कह गया इस कहानी में ..



आने वाली ३१ अगस्त को अमृता जी का जन्मदिन है ..अभी तक आपको अमृता का पढा जो भी अच्छा लगा ही चाहे खुद से या इस ब्लॉग से वह मुझे मेल से भेजे ..उनके जन्मदिन पर उनका कहा, आपकी पसंद से इसी ब्लॉग पर रखा जाएगा ..शुक्रिया ..

Sunday, March 22, 2009

अमृता जी अपने सपनों पर और कुदरत की शक्तियों पर यकीन रखती थी ..यह आभास उनकी ही लिखी हुई कई किताबों को पढ़ कर होता है ..इसी कड़ी इस जिस किताब से पिछली पोस्ट को मैंने लिखा उस किताब का नाम है अनंत नाम जिज्ञासा .उनका मानना था कि जाने किस किस काल के स्मरण इंसान के अंतर में समाये होते हैं ...और जब कुदरत उनको किसी रहस्य में ले जाती है तो इस जन्म की जाति और मजहब बीच में नहीं होते ..इसी बात को सोचते हुए उनके मन में आया कि जो लोग इस तरह से अनुभव से गुजरते हैं वह कभी अनुभव अपनी आप बीती अपनी कलम से शायद न लिखे ..तो वह ही क्यों न उनके इतने बड़े अनुभव उन्हीं से ले कर लिख दे .उनके साथ खुद भी कई बार ऐसा घटता रहा जो उन्हें आने वाले वक़्त की और बीते वक़्त के लम्हों के बारे में बताता रहा ....

इसी तरह के अनुभव में से एक अनुभव है

१८ अगस्त १९९६ की दोपहर थी ।जब अमृता ने अपनी आँखों के सामने एक मंजर देखा की वह किसी पहाडी के सामने खड़ी हैं इस इलाकेमें सामने पहाडियों का सिलसिला है ....जहाँ एक शिला के सामने कुछ लोग इस तरह से खडे हैं ,जैसे वहां कोई मदिर हो लेकिन वहां कोई मंदिर नहीं दिखता पर लोगों की नजरों नाम एक पूजा का एहसास है ॥
पास जाती है अमृता तो लोग कहते हैं कि किसी जमाने नाम यहाँ एक दरवेश हुआ करता था और यहाँ इसी शिला पर एक शक्ति पात हुआ था सीधा आसमान से यह वही शिला है ...अमृता उस शिला को देखती रहीं गहरे स्लेटी रंग की शिला उस पर कोई निशान नहीं था ,तभी न जाने अमृता को क्या हुआ उन्होंने एक पत्थर का छोटा सा टुकडा ले कर उस नुकीले पत्थर से उस शिला पर तीन लम्बी लकीरें खींच दी और कहा की देख लो शक्तिपात कुछ इस तरह से हुआ था ..

लोग उनसे पूछने लगे आपको कैसे पता ?

अमृता ने कहा मैं जानती हूँ कि शक्ति पात ठीक इसी तरह से हुआ था तीन धराओं में

अचानक वह मंजर हिलने लगा और अमृता को अपना और वक़्त का एहसास हुआ कि अपने कमरे नाम अपने ही बिस्तर पर सोयी जागती सी हैं ।बाद में वह यह सोच कर बहुत हैरान हुई कि यह क्या था ॥ वह दरवेश कौन था ?? वह शिला किस काल की है..उन्होंने वहां तीन रेखाएं क्यों डाली उसका क्या मतलब हुआ ?

फिर बहुत दिन गुजर गए अमृता का डॉ चमन लाल से मिलना हुआ वह अमृता के सपनों के ऊपर एक किताब लिखना चाहते थे इस लिए अमृता ने अपना वह सपना उन्हें बताया वह हँस दिए
उन्होंने अमृता को बताया कि जो शिला आपने देखी वह श्रीनगर में जहाँ आदि शंकराचार्य का मंदिर है .....जिस पहाडी में उसी के साथ लगती लगती हुई महदेव की पहाडियां हैं... जहाँ वह शिला आज भी सुरक्षित है जिस को लेकर करीब एक हजार साल हुए बासु गुप्ता को एक सपाना आया था जहाँ शिव ने स्वयं जाहिर हो कर कहा था कि जाओ इन पहाडियों नाम एक शिला है जहाँ शिव सूत्र लिखे हुए हैं पत्थर पर जाओ लिख कर आओ और उसका ज्ञान दुनिया को दे दो
उन्होंने वही देखी शिव सूत्र दुनिया को दिया आपने वही शिला देखी और जो तीन रेखाएं उस पर खींच दी है वह उन्हीं तीन बिन्दुओं के प्रतीक है जो शिव सूत्र के रहस्य है उसका तत्व ज्ञान है एक बिंदु शिव का प्रतीक है एक शक्ति का एक अणु का जिस से ब्रह्मांड का विस्तार हुआ
अमृता ने पूछाकि क्या उस शिला का चित्र कहीं मिल सकता है .
तो उन्होंने कहा कि वह चित्र मेरे पास था लेकिन वह कश्मीर नाम रह गया कुछ दिन बाद अमृता को वह सपने वाला चित्र और किताब उनके एक मित्र श्री महाजन के द्वारा मिल गयी ..

यही सोच कर अमृता जो को ख्याल आया कि न जाने इस तरह के कितने लोग होंगे जो इस तरह के कुदरत के रहस्य जानते होंगे ....जैसे एक कुलदीप जी हैं बहुत तालीमयाफ्ता हैं लेकिन हर मंगलवार और शनिवार को उनके मस्तक पर स्वयं एक टीका लग जाता है ,
एक पूनम जी हैं जिनका हर सपना किसी आने वालीं घटना के बारे तो बताता है और कई बार उनके हाथ तो पड़ी हुई पुखराज की अंगूठी से तेज महक आने लगती है
.
एक मजीदुन्निसा हैं पैदा मुसलमान घर तो हुई हैं पर उनके सपने तो शिव बांसुरी वाले कृष्ण और शेर सवार पर दुर्गा माँ दिखाई देते हैं ..
एक जया सिब्बू हैं .हैं तो पंडित घराने के पर वह अक्सर अपने सपने तो खुद को हज करते हुए और बड़ी अदिकत से काबा के पत्थर को छू कर अपने हाथ आँखों से लगाते हुए देखते हैं ..यही कुदरत के अनबूझ रहस्य है जो कभी किसी की समझ तो नहीं आते ..
इसलिए अमृता ने हर किस्से को बहुत खूबसूरती से उन्ही की जुबानी अपनी इस किताब में लिख दिया है ...आप ने अब तक नहीं पढ़ा तो जरुर पढ़े ....नहीं तो यहाँ तो आपको समय समय पर कोई किस्सा किसी लेख तो पढने को मिल ही जायेगा ...

अब एक कविता अमृता की कलम से ..


अल्लाह ! यह कौन आया है
कि तेरी जगह जुबान पर
उसका नाम आया है

अल्लाह !यह कौन आया है
कि लोग कहते हैं ..
मेरी तकदीर के घर से
मेरा पैगाम आया है ...

अल्लाह !यह कौन आया है
यह नसीब धरती के
कि उसके हुस्न को ...
खुदा का इक सलाम आया है ..

अल्लाह !यह कौन आया है
यह दिन मुबारक है
कि मेरी जात पर
अब इश्क का इल्जाम आया है

अल्लाह ! यह कौन आया है
नजर भी हैरान है
कि आज मेरी मेरी राह में
यह कैसा मुकाम आया है ...

अल्लाह ! यह कौन आया है
कि तेरी जगह जुबान पर
अब उसका नाम आया है .....