Sunday, January 4, 2009

और नदी बहती रही - अंतिम भाग

पहले भाग से आगे:

चारपाई के पास तिपाई पर अभी तक रात की बची हुई व्हिस्की पड़ी हुई थी। उसने कांपते हुए हाथों से गिलास में व्हिस्की डाली और एक घूंट में पी गया, बौराया हुआ सा बोलने लगा - तुम देव पुत्र थे वेदव्यास, तुम मानव पुत्र नहीं थे...

बलदेव की कल्पना उसे सदियों से दूर एक जंगल में ले गईं और वह जंगल में विलाप की  तरह बोला- ऋषिराज ! तुम्हारे पास समाधी, निरी समाधी, पर मेरे पास सपने हैं, बहुत सारे सपने  ...
बलदेव के बोल  छाती में से उठ उठ कर पेड़ों से टकराते रहे- देखो ऋषिपुत्र, मेरी ओर देखो। यह देखो मेरी अंबिका - तुम्हें तो अपनी अंबिका की दूसरे दिन पहचान भी नहीं रही थी, पर देखो यह मेरी परछाईं नहीं, मेरी अंबिका है, मैं जहां जाता हूं मेरे साथ जाती है.....

और बलदेव बड़ी जोर से हंसां- देखो ऋषिपुत्र, तुम्हारी कोई परछाईं नहीं है। लोग सच कहते हैं कि देवताओं की परछाईं नहीं होती। पर इन्सान को तो परछाईं का श्राप होता है.......देखो मेरी परछाईं, मुझसे भी बड़ी....

फिर बलदेव की आवाज़ अति की खामोशी से टकरा कर बुझ सी गयी- तुम्हारी समाधी टूट गयी थी, जब सत्यवती ने आवाज दी थी, पर मेरी आवाज से नहीं टूटती। क्यों नहीं टूटती? तुमने अंबिका की गोदी में खेलता हुआ अपना पुत्र कभी अपनी बाहों में उठा कर नहीं देखा, मैंने देखा है उसे, बाहों में उठा कर, गले से लगा कर...और तुम नहीं जानते, फिर उसे अपने गले से हटाना, अपने मांस से मांस के टुकड़े को तोड़ने जैसा होता है.....

बलदेव का सारा शरीर, शरीर में बहते हुए लहू में भीग गया - तुमने कभी लहू की गंध नहीं देखी, ऋषिपुत्र ! आदमी के लहू की एक गंध भी होती है - जब वह धुर मन तक जख्मी हो जाता है....और लहू की एक सुगंध भी होती है, जब बच्चे के कोमल नरम होंठ हंसते हैं तब अपने ही शरीर में से लहू की एक सुंगधं उठती है....

और एक और तीखी सुगंध बलदेव के माथे की नसों में फैल गयी और वह अर्ध चेतना में बोला- मेरी अंबिका के शरीर की सुगंध चाहे कहीं चली जाये मैं उसे ढूंढ सकता हूं...उसकी कांपतीं हुई सांसें यहां मेरे कंधे के पास, मेरी बाहों के पास, मेरी गर्दन के पास पड़ी हुई हैं।

एक अमानत की तरह पड़ी हुई हैं- और देखो मेरे भीतर भी...

मैंने उसके होठॊं से पूरी एक घूंट पी थी...

बलदेव के माथे की एक नस चीस की तरह कस गयी और वह निचले होंठ को दातों में लेकर कह उठा- ऋषिपुत्र ! तुम सिर्फ देना जानते थे, तुम्हें कुछ भी लेने की, कुछ भी अंगिकार करने की पहचान ना थी, मैंने वह पहचान पायी है, मैं जब अपनी अंबिका के जिस्म की तहों में उतर गया था, वह तहें मुझे ले कर एक मुट्ठी की तरह बंद हो गयी थीं, और फिर जब फूल की पंखुड़ियों की तरह खुलीं थी, मैं वापिस लौटते हुए उनकी गंध अपने साथ ले आया था....
वस सिर्फ कुछ देने का नहीं, कुछ लेने का पल भी था-मैने वह पल देखा है ऋषिपुत्र ! तुमने नहीं देखा। देना दर्द नहीं होता, लेना एक दर्द होता है, तुम वह दर्द नहीं जानते मेरे ऋषिराज !...

चेतना के अंधेरे में एक आकार सा उभरा- कोई पत्थर की मूर्ती जैसा, शायद समय से सचमुच पत्थर हो चुका, या अभी भी जीवित और तपस्या में लीन बैठा हुआ....
बलदेव ने अंधेरे में बांह फैलायी, नीचे जमीन को टटोल कर उसके पैंरों को छूने के लिये, और कांपती हुई बांह की तरह उसकी आवाज कांपी- मैं भूल गया ऋषिराज! मैंने आदम पुत्र हो कर तुम्हारी  रीस की थी... मैंने एक पल तुम बन कर देखा, सिर्फ एक पल, मैंने जैसे एक पल के लिये तुम्हारा आसन चुरा लिया, पर मैं तुम नहीं हो सकता...तुम अपने जंगल में अभी भी निश्छल बैठे हुए हो...मैं अपने जंगल में भटक रहा हूं....मुझे सिर्फ देने का वरदान नहीं मिला है, लेने का श्राप भी मिला है,मैं अपनी अंबिका को  अपने पास चाहता हूं...अपना बच्चा भी...देखो ! मेरी आंखें सिर्फ मेरे मूंह पर नहीं, मेरी पर पीठ भी हैं- वह पीछे दूर वहां देख रही हैं, जहां मेरी अंबिका मेरे पास थी, मेरे पहलू से सटी हुयी- और मैं उसकी कोख में उग रहा था....

बलदेव की अर्धचेना फिर नींद का  झोंका बन गयी तो कमरे की खामोशी ने एक चैन की सांस ली।

अचानक कमरे की खामोशी चौंक कर बलदेव की और  देखने लगी, वह तड़प कर बिस्तर से उठते हुए कह रहा था-यह कैसा श्राप है, वेदव्यास ! जब भी सोता हूं, आग की तरह जलने लगता हूं, मैं भी, मेरी अंबिका भी-और जब भी जागता हूं, राख का एक ढेर बन जाता हूं.....बताओ, मेरी बच्चा बड़ा हो कर इस राख मेंसे अपना वंश कैसे ढूंढे गा?
और नदी उसी तरह बहती रही, सिर्फ उसके पानी ने कुछ उदास हो कर देखा कि वह घटना राख बनकर परले किनारे पर पड़ी हुई है...

7 comments:

विनीता यशस्वी said...

Maine pura aaj hi para.

Ranju ji ek aur achhi post apke dwara.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत गहरी भावनाएं है इस कहानी में. जो भी अमृता जी को पढता है वो बिना नाम जाने ही जान सकता है, की यह उनकी ही रचना होगी. गहरे कुहासे में डूबी यह कहानी, पढ़ कर बहुत देर तक खामोश बैठा रहा और सोचता रहा बलदेव की त्रासदी.

ताऊ रामपुरिया said...

सोचता हूं क्या कमेंट करूं? अमृता जी खुद अपने आप मे एक भाषा दिखाई देती हैं मुझको तो. जबसे आपके ब्लाग पर आना शुरु किया है तबसे अमृता जी के विविध पात्रों से रुबरु होने का मौका मिला है. पहले कुछ सेलेक्टेड पढा था. अब लगता है अमृता जी की तो अपनी एक भाषा है... लाजवाब रचना ही कहुंगा.

रामराम.

सुशील कुमार छौक्कर said...

अमृता जी को पढ़कर पता नहीं क्या क्या सोचने लगता हूँ। कभी ये.....कभी वो.....। पता नही अमृता जी कैसे लिख पाती होगी ये सब। सच अद्भुत हैं।

श्रुति अग्रवाल said...

अमृता जी ने महाभारत की एक घटना और आज के युग की घटना के बीच का साम्य और अंतर अपने ही मधुर अंदाज में समझाया है। पूरी रचना तीन बार पढ़ी है...इंसानी रिश्तों को गहराई तक समझने वाली महान लेखिका की कहानियों को पढ़वाने के लिए शुक्रिया.....

अल्पना वर्मा said...

bahut sundar..dobara sare bhaag mila kar padhungi,tab alag anand aayega.
khubsurat prastuti hetu dhnywaad

Abhishek said...

समाज के एक महत्वपूर्ण सवाल को रेखांकित करती है यह कहानी.