Thursday, March 5, 2009

इमरोज़ के रंगों और लफ्जों की होली

रंग ...


रंगों के साथ
खेलते खेलते
मैं भी रंग हो गया हूँ
कुछ बनने न बनने से
बेपरवाह ,बेफिक्र ...




होली ..

रंग -रंग खेलने के लिए
हम तीन
इकट्ठे हुए थे --
रंग ख्याल और मैं
हमने अपने अपने रंगों से
अपने अपने दोनों हाथ भर लिए
और खेल शुरू हो गया
पहले रंगों ने
अपने जाने पहचाने रंगों से
ख्यालों को रंग लगाया
और फिर
ख्यालों ने अपने अलहदा और नए रंगों से
रंगों को रंग दिया
और फिर
दोनों ने अपने अपने रंगों से
मुझे जी भर के रंगा
मैंने भी दोनों के दोनों हाथो में
इतना रंग रंग दिया
अपने गहरे गहरे रंगों से
कि पहचान न हो पाए
कि रंग कौन से हैं और ख्याल कौन से ..
यह रंगों का खेल
सचमुच में एक खुबसूरत खेल है
यह रंग खेलते खेलते
मेरी अपनी एक पहचान बन गयी है
रंगों के गहरे रंग और
ख्यालों के एक दम अलहदा रंगों से
सना हुआ मैं
पहचान मुक्त हुआ
दोनों को कस कर गले मिल रहा था
बारी बारी से ....


इमरोज़

20 comments:

ravindra vyas said...

यह कविता अंदर से रंगती है। अपने गहरे रंगों से यह रूहानी रंग भरती है। उसका कोई एक अर्थ नहीं, उसका कोई एक खयाल नहीं, लेकिन उसकी रूह एक ही है। यह कविता पढ़ते हुए मुझे फ्रेंच पेंटर पॉल क्ली की याद हो आई जो बेहतरीन कलरिस्ट थे और रंगों को अपने भीतर बहता महसूस करते थे। इतनी सुंदर कविता लगाने के लिए किन शब्दों में आभार व्यक्त करूं।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही लाजवाब. प्रणाम.

रामराम.

pritima vats said...

बहुत अच्छी कविता है। वाकई होली के सारे रंग इमरोज साहब की इस कविता में भरे हुए हैं।

दिगम्बर नासवा said...

रंगों का जादूगर कितनी खूबसूरती, कितने अनूठे अंदाज़ में अटखेलियाँ कर रहा है रंगो के साथ, शब्दों के साथ,
क्या खूब लिखा है रंग, मैं और मेरे ख्वाब. बेहतरीन रचना

mehek said...

rangon jaisi sundar rachana,waah

Arvind Mishra said...

भावभीने अहसास की कविता ,शुक्रिया !

डॉ .अनुराग said...

रंगों से लबालब भरी पोस्ट.....शानदार

Manish Kumar said...

वाह ! प्रासंगिक प्रस्तुति

सुशील कुमार छौक्कर said...

रंगो से रंगी एक बेहतरीन रचना पढवाने के लिए शुक्रिया। लगता है इस बार तो होली मनानी ही पडेगी, चारों तरफ बिखरे रंग आवाज लगा रहे है।

बवाल said...

आदरणीय रंजू जी, हमेशा की तरह यह पोस्ट भी लाजवाब।

Manvinder said...

jashan jaari hai.....

vandana said...

ranjana ji,
imroj ji ne to rangon mein sarabor kar diya.......athah gahrayi hai.........in rangon mein doobna aur milkar ek ho jana..........waah, kya baat hai.

विनीता यशस्वी said...

Rango se sarabor prastuti...

Parul said...

रंगों के साथ
खेलते खेलते
मैं भी रंग हो गया हूँ
कुछ बनने न बनने से
बेपरवाह ,बेफिक्र ...shukriya ranju di

अनिल कान्त : said...

बहुत ही लाजवाब .............

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Meenakshi Kandwal said...

रंगों ने ख़्यालों को रंगा, फिर ख़्यालों ने रंगों को रंगा और फिर.... उसके बाद दोनों ने मुझे रंग दिया। कैसे रंग, ख़्याल और व्यक्तित्व आपस में एक हो जाते हैं... अदभुत!

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

Dr.Bhawna said...

बहुत सुंदर रचना... आप सबको होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ...

ज़ाकिर हुसैन said...

होली पर ये कविता पढ़ कर सच-मुच रंगों में जान पड़ गयी. बहुत सुंदर!
साथ ही परिवार सहित आपको होली की शुभकामनाएं !!!

ताऊ रामपुरिया said...

आपको परिवार सहित होली की बहुत बधाई और घणी रामराम.