Wednesday, May 6, 2009

कई सवाल सदियों से हवा में खड़े हुए हैं....

पिछली कड़ी में " कलम मेरी कुम्हारिन हुई " में कुछ अमृता जी कि लिखी पंक्तियाँ जो मुझे विशेष रूप से पसंद है वह मैंने वहां पोस्ट की ,पर देखा हर किसी को किसी न किसी पंक्ति ने छुआ ,अमृता का लिखा यही असर करता है ,कि व्यक्ति विशेष अपने आस पास खुद को उसी से जुड़ा हुआ महसूस करता है ....आज इसी कड़ी में कुछ और असर दिल पर अपनी छाप छोड़ जाने वाली पंक्तियों का जिक्र कुछ इन्हीं पक्तियों की तरह ...

जीने लगो
तो करना
फूल ज़िन्दगी
के हवाले
जाने लगो
तो करना
बीज धरती के हवाले

अमृता ने क्या कब हवाले कर दिया अपने लिखे के जरिये वह जो पढ़े समझे वही जाने ..

उनकी कहानी पांच बरस लम्बी सड़क से कुछ पंक्तियाँ है ...चिंतन की माखी डंक मारती ,लेकिन शहद भी इकठ्ठा करती है ..सड़कें वहीँ की वहीँ रहती है ,सिर्फ राही गुजर जाते .राही भी सिर्फ चलते हैं ,पहुँचते कहीं नहीं ..
धरतीकी भांति मन के सफ़र की सड़क भी गोल होती है ,अपने से चलती है अपने तक पहुंचती है
चिमटे से कोयला तो पकडा जा सकता है ,पर आग की लपटें नहीं पकड़ी जा सकती ,आग की लपट सिर्फ आग की लपट से ही पकड़ी जा सकती है ..

यहाँ अगर किसी को चलना है तो किसी और से पैर ले कर चलता है ..पहला दूसरे से .दूसरा तीसरे से ,तीसरा चौथे से ,उधार पैर ले कर अपाहिज हो कर ..

कहानी सड़क नंबर ५ से ..


ताकत ,जब इंसान अपन भीतर से पाता ,तो उसको इस तरह से प्यार करता है जैसे कोई महबूबा को प्यार करता है .पर जब अपने भीतर से पाने की जगह वह दुनिया से पाता है ,तो उसको इस तरह से प्यार करता है जैसे कोई वेश्या से प्यार करता है
कोई रिश्ता शरीर पर पहने हुए कपडे की तरह होता है जो कभी भी शरीर से उतरा जा सकता है ,पर कोई रिश्ता नसों में चलने वाले लहू की तरह होता है जिसके बगैर इंसान जीवित नहीं रह सकता है ..
और कोई रिश्ता शरीर पर पैदा हुई खुजली की तरह होता है ......

उपन्यास (" धरती सागर और सीपियाँ )

मनुष्य को समाज चाहिए ,लेकिन समाज को मनुष्य नहीं चाहिए ..

सड़क नम्बर ५ से

सारी दुनिया कपडों में बंटी हुई है ..धरती के टुकड़े भी भेसो से पहचाने जाते हैं ,अपने अपने झंडों से ..और उनकी रक्षा भी मनुष्य नहीं करते ,वर्दियां करती है .भला कहीं सचमुच का मनुष्य सचमुच के मनुष्य को मार सकता है ? यह सिर्फ वर्दियों .पोशाकों और झंडों की लड़ाई है .
ज्ञान को धारण करना शिव के सामान सिर पर गंगा धारण करने के बराबर है ,हम सब रेत को बुहार रहे हैं ...यह और बात है कि कोई हल जुआ ले कर रेत बुहारता है ,कोई तराजू बाट लेकर और कोई कागज कलम ले कर .

उपन्यास यात्री से ली गयी पंक्तियाँ, क्या यह आज के वक़्त के सच को उजागर नहीं करती क्या ?

आज और कल में एक गरीबी का लम्बा फासला होता है जो कई बार एक जन्म में तय नहीं होता ,पर समझ की हद में आ कर कई बातें ऐसी भी होती है जो समझ के परे होती हैं ....घर बदल सकते हैं ,पर इस से क्या होता है ..कहीं भी जाओ ,वही घरों के कोने होते हैं और वही कोनों के अँधेरे .और वही अंधेरों में लटकने वाले सवाल ....
कई बातें ऐसी होती है ,जिन्हें शब्दों की सजा नहीं देनी चाहिए ..देखा जाए तो यह धरती मजबूरियों का लम्बा इतिहास है
दुर्योधन की भरी सभा में द्रौपदी ने पूछा था कि युधिष्टर जब स्वयं को हार चुके ,तब मुझे दांव पर लगाने का उन्हें क्या अधिकार था ? और यह सवाल हजारों सालों से हवा में खडा हुआ है ..

एतराज़ का सम्बन्ध कानून से होता संकोच का मन से ..
यह युग का अंतर है .आज की मोहब्बत को कोई हवन कुंड नहीं कहता .आज के राक्षसों को कोई राक्षस नहीं कहता है .आज की भलाई को कोई वरदान नहीं कहता ..आज की बुराई कोई कोई श्राप नहीं कहता है ...
खामोशी का दोष बहुत बड़ा और बहुत दूर तक फैला हुआ है ,इंसान के बिस्तर से दुनिया के राजसिहासन तक ....
कई सवाल सदियों से हवा में खड़े हुए हैं ..पर इंसान सदियों से चुप है ..
इन गलत राहो पर चलने के लिए इंसान को हिम्मत नहीं चाहिए ,इन पर न चलने के लिए हिम्मत चाहिए ..
अगर भगवान पत्थर का बनाया जा सकता है .तो इन्साफ क्यों नहीं ! जबकि वही तो सच होगा ..
जीभ सिर्फ हुकोमतों की होती है ,इन्सान तो कब का चुप है ...

उपन्यास यह सच है
से यह पंक्तियाँ न जाने कितने सवाल जहाँ में छोड़ जाती है .....और तब एक सोच पैदा होती है ...

भारत की गलियों में भटकती हवा
चूल्हे की आग को कुरेदती
उधार लिए अन्न का एक ग्रास तोड़ती
और घुटनों पे हाथ रख कर
फिर उठती है ..

चीन के पीले
और जर्द होंठों के छाले
आज बिलख कर
एक आवाज़ देते हैं
वह जाती और हर एक गले से सख्ती
और चीख मार कर वियतनाम में गिरती है

श्मशान घरों में से एक गंध सी आती
और सागर पार बैठे
श्मशान घरों के वारिस
बारूद के इस गंध को
शराब की गंध में भिगोते हैं
बिलकुल उसी तरह ,जिस तरह
कि श्मशान घरों के दूसरे वारिस
भूख की गंध को तक़दीर की गंध में भिगोते हैं

और इजराइल की नई सी माटी
या पुराने रेत अरब की
जो खून में भीगती
और जिसकी गंध
खामखाँ सहादत के जाम में डूबती

छाती की गलियों में भटकती हवा
यह सभी गंधे सूंघती और सोचती
कि धरती के अनगन से
सूतक की महक कब आएगी
कोई इडा - किसी माथे की नाडी
----कब गर्भवती होगी ?
गुलाबी मांस का सपना --
----आज सदियों के ज्ञान से
वीर्य की बूंद मांगता है .....

अपने आस पास के देशों और माहौल में यही सब तो आज भी हम देख रहे हैं ..चाहे वह स्वात घाटी हो या नेपाल का कोई कोना या श्रीलंका का जंगल ..सब किसी आस में है ....

22 comments:

"अर्श" said...

SACH ME LOG AAPKO AMRITA PRITAM KI ROH KAHTE HAI TO BURAA NAHI KAHTE... YE MERA ABHAAGYA HAI KE AAJ TAK MAINE UNHE NAHI PADHAA THAA AAJ PAHALI BAAR UNHE PADHAA HAI AAPKE BLOG PE KIS NAAZUKI SE AAPNE APNA HAK AADAA KIYA HAI EK KHUBSURAT SE TEWAR ME ... ISKO KIS TARAH SE KAHUN SAMAJH NAHI AARAHAA HAI... BAHOT BAHOT BADHAAYEE IS KE LIYE AAPKA

AABHAAR
ARSH

विनीता यशस्वी said...

Ranju ji apne bilkul sahi kaha ki AMRITA ji ke likhe shabd sab ko kahi na khai chhu jate hai...

bahut achhi post...

शारदा अरोरा said...

इन गलत राहो पर चलने के लिए इंसान को हिम्मत नहीं चाहिए ,इन पर न चलने के लिए हिम्मत चाहिए ..
न जाने कितना कुछ , अमृता प्रीतम की सोच , ये क्या पिला देती हैं आप , सीधे रगों में उतर जाती है , उफ्फ कुछ कहते ही नहीं बनता |

raj said...

कई सवाल सदियों से हवा में खड़े हुए हैं ..पर इंसान सदियों से चुप है ..sahi baat hai en galat raho pe na chalne ki himmat chiye.....jo bhi kaha hai...its wonderfull....

संध्या आर्य said...

kyaa kahu aap dhire dhire amritaji ke sahityaa se prichit karwa rahi hai ....... bahut bahut dhanyabaad

संदीप शर्मा said...

भारत की गलियों में भटकती हवा
चूल्हे की आग को कुरेदती
उधार लिए अन्न का एक ग्रास तोड़ती
और घुटनों पे हाथ रख कर
फिर उठती है ..
बेहद सुन्दर शब्दों में बहुत ही अच्छी व्याख्या...

डॉ .अनुराग said...

अमृता प्रीतम ,शिवानी ......परवीन शाकिर .ऐसे महिला शख्सियत है जो अपनी हर नयी रचना से हैरान करती है ..लगता है इनके पास शब्दों ओर अहसासों का भरी खजाना है ...ख़त्म ही नहीं होता

डॉ. मनोज मिश्र said...

मैंने इसको ,पहले भी कई बार पढा और आज भी .हरबार एक नयी ताजगी .धन्यवाद .

ताऊ रामपुरिया said...

हर बार और हर लाईन कहीं ना कहीं अंदर तक छू जाती है. बस एक अलग ही समां बंधता है अमृता जी को पढते वक्त. उनका लेखन पाठक को अपने साथ बहाये लिये चलता है. आपकी इन पोस्ट का बडा इंतजार रहता है.

रामराम.

Priya said...

Ranju mam, Amrita ji ka likha hua sirf asar hi nahi karta balki rago mein khoon bankar dauta hain..... hum bhi bahut bade fan hain unke......Jitni baar unko padhte hain. .... Pahle se jayada acchi lagti hain....Ya to hamne janm lene mein galti kardi ya phir wo sansaar se jaldi chali gay....

Udan Tashtari said...

वाकई!!

हर बार की तरह ही एक उम्दा प्रस्तुति.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पाँच बरस लम्बी सड़क को मैं ने 38 बरस पहले पढ़ा था। वह उपन्यास कई बरस मेरे साथ रहा। वह हमेशा ताकत देता था। एक आस पैदा करता था। वह पाँच बरस लम्बी सड़क, लगता है जीवन भर ही पूरी नहीं होती।

Manvinder said...

बहुत अच्छी व्याख्या...

surjit said...

A bitter reality:
..'आज की मोहब्बत को कोई हवन कुंड नहीं
कहता .आज के राक्षसों को कोई राक्षस नहीं कहता है .आज की भलाई को कोई वरदान नहीं कहता ..आज की बुराई कोई कोई श्राप नहीं कहता है ...
खामोशी का दोष बहुत बड़ा और बहुत दूर तक फैला हुआ है ,इंसान के बिस्तर से दुनिया के राजसिहासन तक ....'
Thanks for sharing.An excellent blog.
God bless.

अभिषेक ओझा said...

एक एक लाइन अनमोल ! अमृता का जवाब नहीं.

सुशील कुमार छौक्कर said...

आज की पोस्ट पढकर आनंद आ गया। ये कडियाँ आगे भी जारी रहनी चाहिए।

विनय said...

अमृता जी के शब्द उनके नाम की तरह ही आज भी सार्थक हैं

---
चाँद, बादल और शामगुलाबी कोंपलें

vandana said...

har baar antas ko chuti panktiyan..........har bar phir kisi khyal ko chedti panktiyan.........kya kahun..........bas mook hun.

Abhishek Mishra said...

जीने लगो
तो करना
फूल ज़िन्दगी
के हवाले
जाने लगो
तो करना
बीज धरती के हवाले

Amrita Pritam ke bagiche se chun-chun kar fulon ko laya hai aapne.

pritima vats said...

aapke blog par Aakar amrita ji ki chuninda rachnao ko padna bahut achcha lagta hai.
dganyabad.

दिलीप कवठेकर said...

श्मशान घरों में से एक गंध सी आती
और सागर पार बैठे
श्मशान घरों के वारिस
बारूद के इस गंध को
शराब की गंध में भिगोते हैं
बिलकुल उसी तरह ,जिस तरह
कि श्मशान घरों के दूसरे वारिस
भूख की गंध को तक़दीर की गंध में भिगोते हैं

बहुत ही सिहरन होती है, यथार्थ से सामना होता है जब.

Harkirat Haqeer said...

छाती की गलियों में भटकती हवा
यह सभी गंधे सूंघती और सोचती
कि धरती के अनगन से
सूतक की महक कब आएगी
कोई इडा - किसी माथे की नाडी
----कब गर्भवती होगी ?
गुलाबी मांस का सपना --
----आज सदियों के ज्ञान से
वीर्य की बूंद मांगता है .....

वाह......!! लाजवाब लिखती थीं वो .....!!

आप जो ये हमारे लिए खजाना ढूंढ -ढूंढ कर ला रहीं हैं आपका तहे दिल से शुक्रिया ......!!