Thursday, June 6, 2013

हर जन्मपत्री—आदम की जन्म की एक झूठी गवाही देती है...


अमृता की कुछ बातें उनके कागज और अक्षर किताब से ........

नज़्म, कहानी या नावल,  एक माध्यम है, बात को कहने का। अमृता का  एक नावल था ‘दिल्ली की गलिया’ जिसका किरदार नासिर एक मुसव्विर है, और एक अखबार के लिए कार्टून भी बनाता है। उसी के एक कार्टून में, अंग्रेज़ी का एक प्रोफेसर अपने विद्यार्थियों से पूछता है, ‘आजकल कौन-सा लफ़्ज आम जिंदगी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है ?’’ तो एक गंभीर विद्यार्थी उठकर कहता है, ‘‘सह ! यह ‘ऐंटी’ लफ़्ज है, क्योंकि आजकल लोग ऐंटी मैरिट होते जा रहे हैं, ऐंटी विमैन, ऐंटी माईंड।’’बोधी गुंपा की तरफ से जब किसी कुसूरवार को सजा दी जाती है, तो वह पत्थरों पर, महात्माबुद्ध के श्लोक अंकित करने की सजा होती है। वह कितने दिन, कितने महीने या कितने साल हाथ में हथौड़ा-छेनी लेकर, पत्थरों पर वह श्लोक अंकित करता रहेगा उसके कसूर की गंभीरता से तय होता है।

मुझे लगता है मुहब्बत ने अपने सुनहरी गुंपा में बैठकर, बोधी गुंपा की तरह, मेरे लिए भी यही सज़ा सुना दी  और शायद मेरे तसव्वुर में मेरी मुहब्बत का कसूर बहुत बड़ा है, संगीन जुर्म, इसलिए पूरी जिन्दगी के लिए यह सज़ा मुझे दी गई, और मैं तमाम ज़िंदगी हाथ में कलम लेकर, कागज़ों पर वही लिखती रही जो मेरे चिंतन का और मेरे तरवैयुत का फरमान था....
अपने तरवैयुत से मेरी मुहब्बत का रिश्ता क्या है ? उसी की बात कहने के लिए कुछ पंक्तियाँ सामने आती हैं—
हमारे देश की तकसीम के वक्त बहुत कुछ भयानक हुआ। मेरे उपन्यास ‘डाक्टर देव’ के किरदार को जब ज़ख्मी लोगों की महरम पट्टी के लिए बुलाया जाता है तो वह तड़प कर कहता है, ‘‘मनु ! कौन–सा मुंह लेकर उन जख्मियों के पास जाऊं ? वे कहेंगे—आज इन्सान हमें पट्टी बांधने  के लिए आया है, इनकी मरहम पट्टी तब कहां थी, जब रास्ता चलते, इसने पीछे से हमारी पीठ पर छुरा घोंप दिया था ? कातिल का चेहरा भी तो मेरे चेहरे जैसा रहा होगा.....’’

इसी तरह ‘पिंजर’ नावल की पूरो, दो मज़हबों की टक्कर में टूट जाती है। लेकिन जानती है कि नफरत के दाग को, नफरत के पानी से नहीं धोया जा सकता, और जब दोनों देशों की अगवाशुदा लड़कियां, अपने-अपने देश को लौटाई जाती हैं, तो पूरो कहती है, ‘‘चाहे कोई लड़की हिन्दू हो या मुसलमान जो भी अपने ठिकाने पर पहुँच रही है, उसी के साथ मेरी आत्मा भी ठिकाने पर पहुंच रही है....’’औरत की पाकीज़गी का ताल्लुक, समाज ने कभी भी, औरत के मन की अवस्था से नहीं पहचाना, हमेशा उसके तन से जोड़ दिया। इसी दर्द को लेकर मेरे ‘एरियल’ नावल की किरदार ऐनी के अलफाज़ हैं, ‘‘मुहब्बत और वफा ऐसी चीज़ें नहीं है, जो किसी बेगाना बदन के छूते ही खत्म हो जाएं। हो सकता है—पराए बदन से गुज़र कर वह और मज़बूत हो जाएं जिस तरह इन्सान मुश्किलों से गुज़र कर और मज़बूत हो जाता है.....’’
औरत और मर्द का रिश्ता और क्या हो सकता था, मैं इसी बात को कहना चाहती थी कि एक कहानी लिखी, ‘मलिका’। मलिका जब बीमार है, सरकारी अस्पताल में जाती है, तो कागज़ी कार्रवाई पूरी करने के लिए डाक्टर पूछता है तुम्हारी उम्र क्या होगी ?

मलिका कहती है, ‘‘वही, जब इन्सान हर चीज के बारे में सोचना शुरू करता है, और फिर सोचता ही चला जाता है.....’’
डाक्टर पूछता है, ‘‘तुम्हारे मालिक का नाम ?’’
मलिका कहती है, ‘‘ मैं घड़ी या साइकिल नहीं, जो मेरा मालिक हो, मैं औरत हूं....’’
डाक्टर घबराकर कहता है, ‘‘मेरा मतलब है—तुम्हारे पति का नाम ?’’
मलिका जवाब देती है, ‘‘मैं बेरोज़गार हूं।’’
डाक्टर हैरान–सा कहता है, ‘‘भई, मैं नौकरी के बारे में नहीं पूछ रहा...’’
तो मलिका जवाब देती है, ‘‘वही तो कह रही हूं। मेरा मतलब है किसी की बीवी नहीं लगी हुई’’, और कहती है, ‘‘हर इन्सान किसी-न-किसी काम पर लगा हुआ होता है, जैसे आप डाक्टर लगे हुए हैं, यह पास खड़ी हुई बीबी नर्स लगी हुई है। आपके दरवाजे के बाहर खड़ा हुआ आदमी चपरासी लगा हुआ है।

इसी तरह लोग जब ब्याह करते हैं—जो मर्द शाविंद लग जाते हैं, और औरतें बीवियां लग जाती हैं...’’
समाज की व्यवस्था में किस तरह इन्सान का वजूद खोता जाता है, मैं यही कहना चाहती थी, जिसके लिए मलिका का किरदार पेश किया। जड़ हो चुके रिश्तों की बात करते हुए, मलिका कहती है, ‘‘क्यों डाक्टर साहब, यह ठीक नहीं ? कितने ही पेशे हैं—कि लोग तरक्की करते हैं, जैसे आज जो मेजर है, कल को कर्नल बन जाता है, फिर ब्रिगेडियर, और फिर जनरल। लेकिन इस शादी-ब्याह के पेशे में कभी तरक्की नहीं होती। बीवियां जिंदगी भर बीवियां लगी रहती है, और खाविंद ज़िंदगी भर खाविंद लगे रहते हैं....’’

उस वक्त डाक्टर पूछता है, ‘इसकी तरक्की हो तो क्या तरक्की हो ?’’
तब मलिका जवाब देती है, ‘‘डाक्टर साहब हो तो सकती है, पर मैंने कभी होते हुए देखी नहीं। यही कि आज जो इन्सान शाविंद लगा हुआ है, वह कल को महबूब हो जाए, और कल जो महबूब बने वह परसों खुदा हो जाए....’’
इसी तरह-समाज, मजहब और रियासत को लेकर वक्त के सवालात बढ़ते गए, तो मैंने नावल लिखा, ‘यह सच है’ इस नावल के किरदार का कोई नाम नहीं, वह इन्सान के चिन्तन का प्रतीक है, इसलिए वह अपने वर्तमान को पहचानने की कोशिश करता है, और इसी कोशिश में वह हज़ारों साल पीछे जाकर—इतिहास की कितनी ही घटनाओं में खुद को पहचानने का यत्न करता है—

उसे पुरानी घटना याद आई, जब वह पांच पांडवों में से एक था, और वे सब द्रौपदी को साथ लेकर वनों में विचर रहे थे। बहुत प्यास लगी तो युधिष्ठीर ने कहा था, ‘जाओ नकुल पानी का स्रोत तलाश करो !’’
जब उसने पानी का स्रोत खोज लिया था, तो किनारे पर उगे हुए पेड़ से आवाज़ आई थी, ‘‘हे नकुल ! मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए बिना पानी मत पीना, नहीं तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी’’—लेकिन उसने आवाज़ की तरफ ध्यान नहीं दिया, और जैसे ही सूखे हुए हलक से पानी की ओक लगाई, वह मूर्च्छित होकर वहीं गिर गया था....

और मेरे नावल का किरदार, जैसे ही पानी का गिलास पीना चाहती है, यह आवाज़ उसके मस्तक से टकरा जाती है, ‘‘हे आज के इन्सान ! मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए बिना गिलास का पानी मत पीना....’’
और उसे लगता है—वह जन्म-जन्म से नकुल है, और उसे मूर्च्छित होने का शाप लगा हुआ है...वह कभी भी तो वक्त के सवालों का जवाब नहीं दे पाया...

इसी नावल में उसे याद आता है, ‘‘मैंने एक बार जुआ खेला था। सारा धन, हीरे, मोती दांव पर लगा दिए थे, और मैं हार गया था मैंने अपनी पत्नी भी दांव पर लगा दी थी...’’
और हवा में खड़ी हुई आवाज़ उससे पूछती है, ‘‘मैं दुर्योधन की सभा में खड़ी हुई द्रौपदी हूं, पूछना चाहती हूं—कि युधिष्ठिर जब अपने आपको हार चुके, तो मुझे दांव पर लगाने का उन्हें क्या अधिकार था ?’’
मैं इस सवाल के माध्यम से कहना चाहती हूं, कि जब इन्सान अपने आपको दांव पर लगा चुका, और हार चुका है—तो समाज के नाम पर दूसरे इन्सानों को मजहब के नाम पर खुदा की मखलूक को, और रियासत के नाम पर अपने-अपने देश के वर्तमान भविष्य को दांव पर लगाने का उसे क्या अधिकार है ?

इन्सान जो है, और इन्सान जो हो सकता है—यही फासला ज़हनी तौर पर मैंने जितना भी तय किया, उसी की बात ज़िंदगी भर कहती रही....बहुत निजी अहसास को कितनी ही नज़्मों के माध्यम से कहना चाहा—
हथेलियों पर इश्क की मेंहदी का कुछ दावा नहीं
हिज्र का एक रंग है, खुशबू तेरे जिक्र की....
एक दर्द, एक ज़ख्म एक कसक दिल के पास थी
रात को सितारों की रकम—उसे ज़रब दे गई...

और वक्त-वक्त पर जितने भी सवालात पैदा होते रहे—उसी दर्द का जायज़ा लेते हुए कितनी ही नज़्में कहीं—
गंगाजल से लेकर, वोडका तक—यह सफरनामा है मेरी प्यास का...
सादा पवित्र जन्म के सादा अपवित्र कर्म का—सादा इलाज....
किसी महबूब के चेहरे को—एक छलकते हुए गिलास में देखने का यत्न....
और अपने बदन पर—बिलकुल बेगाना ज़ख्म को भूलने की ज़रूरत...
यह कितने तिकोन पत्थर हैं

जो किसी पानी की घूंट से—मैंने गले में उतारे हैं
कितने भविष्य हैं—जो वर्तमान से बचाए हैं
और शायद वर्तमान भी—वर्तमान से बचाया है....
इलहाम के धुएं से लेकर, सिगरेट की राख तक....
हर मज़हब बौराए
हर फलसफा लंगड़ाए
हर नज़्म तुतलाए—
और कहना-सा चाहे—

कि हर सल्तनत के सिक्के की होती है, बारूदी की होती है
और हर जन्मपत्री—आदम की जन्म की एक झूठी गवाही देती है...
बहुत दिनों से सोच रही थी-
रसीदी टिकट का कायाकल्प कर दूं
कई घटनाएं जब घट रही होती हैं ?
अभी-अभी लगे ज़ख्मों-सी
तब उनकी कोई कसक अक्षरों में उतर जाती है....
लेकिन वक़्त पा कर अहसास होता है कि ये बातें
लम्बे समय के लिए साहित्य को कुछ नहीं दे पाएंगी.
ये वक़्ती आंधिया होती हैं
इसलिए कई बातें इस तरह लगने लगीं,
जो मेरी अपनी नज़र में-
अपनी उम्र बिता चुकी हैं-
इस नज़र सानी से-
‘रसीदी टिकट’ के चिंतन में कोई कमी नहीं आई,
बल्कि कई और बातें, जो स्मरण हो आईं,
उसके साथ-साथ चल दी हैं....

8 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

अमृता प्रीतम जी के आलेख के लिये आभार, उनको जितना जानें उतना ही कम लगता है.

रामराम.

Neelima said...

bahut khub .. jitni bar padho utni bar khud se rubru hona sa lagta hain ek aourat ke man ke harek bhavo ko unki kalam ne chua hain

Manav Mehta 'मन' said...

बहुत बढ़िया

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(8-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

प्रतिभा सक्सेना said...

थाहना मुश्किल है कितनी-कितनी तहें निकलती चली आती हैं !

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


हैल्थ इज वैल्थ
पर पधारेँ।

Tejkumar Suman said...

भावपूर्ण सुन्दर रचना।

Tejkumar Suman said...

भावपूर्ण सुन्दर रचना।