Showing posts with label अमृता प्रीतम amrita preetam ..चुनिदा पंक्तियाँ .नज्म. Show all posts
Showing posts with label अमृता प्रीतम amrita preetam ..चुनिदा पंक्तियाँ .नज्म. Show all posts

Wednesday, February 1, 2012

 मिट्टी के इस चूल्हे में से
हम कोई चिनगारी ढूँढ़ लेंगे
एक-दो फूँफें मार लेंगे
बुझती लकड़ी फिर से बाल लेंगे

मिट्टी के इस चूल्हे में
इश्क़ की आँच बोल उठेगी
मेरे जिस्म की हँडिया में
दिल का पानी खौल उठेगा

आ साजन, आज पोटली खोल लें
हरी चाय की पत्ती की तरह
वहीं तोड़-गँवाई बातें
वही सँभाल सुखाई बातें
इस पानी में डाल कर देख,
इसका रंग बदल कर देख

गर्म घूँट इक तुम भी पीना,
गर्म घूँट इक मैं भी पी लूँ
उम्र का ग्रीष्म हमने बिता दिया,
उम्र का शिशिर नहीं बीतता
 
 
सोच की इकाई को तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी...

बात चाहे जिस्म की किसी क़ाबलियत की हो, या मस्तक की किसी क़ाबलियत की, पर दोनों तरह की क़ाबलियत को, एक दूसरी की मुख़ालिफ़ करार देकर, एक को ‘जीत गई’ और एक को ‘हार गई’ कहने वाली यह भयानक साज़िश थी, जो इकाई के चाँद सूर्य को हमेशा के लिए एक ग्रहण लगा गई...

और आज हमारी दुनिया मासूम खेलों के मुक़ाबले से लेकर भयानक युद्धों के मुक़ाबले तक ग्रहणित है...

पर इस समय मैं ज़हनी क़ाबलियत के चाँद सूर्य को लगे हुए ग्रहण की बात करूँगी, जिसे सदियों से ‘शास्त्रार्थ’ का नाम दिया जा रहा है।

अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने के लिए नहीं होते हैं। वे तो एक मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति को, दूसरी मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति में मिलाने के लिए होते हैं, ताकि हमारी प्राप्तियाँ बड़ी हो जाएँ...

अदबी मुलाक़ातें दो नदियों के संगम हो सकते हैं, पर एक भयानक साज़िश थी कि वे शास्त्रार्थ हो गए...

ज्ञान की नदियों को एक-दूसरे में समाना था, और एक महासागर बनना था, पर जब उनके बहाव के सामने हार-जीत के बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, तो वे नदियाँ सूखने लगीं... नदियों की आत्मा सूखने लगी...

जीत अभिमानित हो गई, और हार क्रोधित हो गई...
अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है, और क्रोध भी एक भयानक अग्नि है, जो हर प्राप्ति को राख कर देता है...शक्ति कणों की लीला से अमृता की लिखी कुछ पंक्तियाँ ....

Thursday, April 8, 2010


जाने कितनी खामोशियाँ आपसे आवाज़ मांगती है
जाने कितने गुमनाम चेहरे आपसे पहचान माँगते हैं
और एक आग आपकी रगों में सुलगती है ,अक्षरों में ढलती है

अमृता के लिखे यह लफ्ज़ वाकई उनके लिखे को सच कर देते हैं ...उनके अनुसार काया के किनारे टूटने लगते हैं सीमा में छलक आई असीम की शक्ति ही फासला तय करती है
जो रचना के क्षण तक का एक बहुत लम्बा फासला है एहसास की एक बहुत लम्बी यात्रा ....मानना होगा कि किसी हकीकत का मंजर उतना है जितना भर किसी के पकड़ आता है ...
अमृता जी की लिखी कहानी धन्नो पढ़ी अभी कुछ दिन पहले ...इस में समाज का छिपा हुआ रूप स्पष्ट रूप से सामने आया है ...इस कहानी का स्थान कोई भी गांव हो सकता है ,पर समय वह है जब चिट्टा रूपया चांदी का होता था ,गांव की एक अधेड़ उम्र की औरत धन्नो कहानी की मुख्य पात्री है ..समाज की मुहं फट चेतना का प्रतीक ..उसके शब्दों में "औरत को तो खुदा ने शुरू से ही धेली बनाया है रूपया साबुत तो कोई कर्मों वाली होती है जिसे मन का मर्द मिल जाये ..पर उसको न किसी ने देखा न किसी ने सुना ..घर -घर बस धेलियाँ ही पड़ी हुई है "
धन्नो सारे गांव की आँखों में चुभती है क्यों कि वह मुहंफट है और सदाचार के पक्ष से गांव की हर औरत को सिले हुए मुहं का होना चाहिए ..यह धन्नो तो सिले हुए मुंहों के धागे उधेड़ती है ....धन्नो के बदन की दुखती रग उसकी ज़िन्दगी का वह हादसा है जो उसकी चढ़ती जवानी के दिनों में हुआ था ..मोहब्बत के नाम पर जो उसको माता पिता के घर से निकाल कर ले गया था ..वह कोई ऐयाश किस्म का था जो दस बीस दिन उसके साथ रहा फिर उसको कहीं बेचने की कोशिश में लग गया ......धन्नो ने यह भांप लिया और उसको मुहं फाड़ कर बता दिया था ..अगर पल्ले से बंधी हुई धेली भुनवा कर ही रोटी खानी है .तो जाते हुए तेरी जेब क्यों भर जाऊं ?और वह अकेले ही अपन जोर पर जीते हुए ,सारी उम्र कहती रही ---"काहे की चिंता है बीबी ! धेली पल्ले से बंधी हुई है ,आड़े वक़्त में भुनवा लूँगी ..."
धन्नो के पास कुछ जमीन है जो एक बार किसी मुरब्बे वाले ने उस पर रीझ कर ,अपने पुत्रों से छिपा कर उसके नाम कर दी थी अलग घर भी बनवा दिया था और जब तक जिंदा रहा उसकी खैर खबर लेता रहा था ..अब जब धन्नो का अंत समय आने को है तो गांव वालों की नजर उसकी जमीन पर लगी हुई है ..धन्नो जानती है सो माँ,मौसी जैसे पुचकारते हुए लफ़्ज़ों की खाल उधेड़ती है और नेक कामों के घूँघट भी उधेड़ती हुई अंत समय राम राम जपने की सलाह शिक्षा को भी दुत्कारती है ...और कहती है ..... भगतानी ! काहे को मेरी चिंता करती है ,धर्मराज को हिसाब देना है दे दूंगी ..यह धेली जो पल्ले बंधी है वह धर्मराज को दे कर कहूँगी ले भुना ले और हिसाब चुकता कर "...सदाचार समझने वाला समाज धन्नो की बातें सुन कर कानों में उंगिलयां दे देता है और धन्नो के मरने के बाद भी उसकी वसीयत पढ़ कर भी अश्लीलता के अर्थ नहीं जान सकता ...धन्नो के अपनी जमीन गांव की पाठशाला के नाम लिख दी है और साथ में एक चाह भी ..कि चार अक्षर लड़कियों के पेट में पड़ जाएँ और उनकी ज़िन्दगी बर्बाद न हो .
अश्लीलता धन्नो के आचरण में नहीं है ,न उसके विचारों में है ..अश्लीलता समाज के उस गठन में है जहाँ घर का निर्माण आधी औरत की बुनियाद पर टिका हुआ है ....आधी औरत --एक धेली ,सिर्फ काम वासना की पूर्ति का साधन
साबुत रुपया तो धन्नो का सपना है ,धन्नो का दर्द उस औरत की कल्पना --जिसके तन को मन नसीब हुआ हो और जिस सपने की पूर्ति के जोड़ तोड़ के लिए वह अपनी सारी जमीन गांव की पाठशाला के नाम कर देती है --भविष्य की किसी समझ बूझ के नाम ,जब औरत को अपने बदनकी धेली भुना कर नहीं जीना पड़ेगा और इस तरह से रोटी नहीं खानी पड़ेगी
अश्लीलता इस समाज के गठन में है जहाँ औरत का जिस्म न सिर्फ रोटी खरीदने का साधन बनता है ,बलिक पूरे समाज की इस स्थापना में घरेलू औरत का आदरणीय दर्ज़ा खरीदने का साधन भी है .धन्नो इसी अश्लीलता को नकारती एक ऊँची ,खुरदरी और रोष भरी आवाज़ है ......

Thursday, March 4, 2010

जिस काल में जल प्रलय आई थी ,दुनिया गर्क हो गयी थी ,उस तूफ़ान में जब जिस नूह ने एक किश्ती बना कर अपने कुछ लोगों को बचाया था और दुधिया पर्वत पर कायम किया था मीरदाद की कहानी वहीँ से शुरू होती है ....नूह ने इस दुनिया से जाने के वक़्त अपने बेटे को बुला कर कहा था पर्वत की सबसे ऊँची छोटी पर एक घर बनाना ,जहाँ चुने हुए नौ लोगों को रखना ,जो हमेशा नौ की गिनती में रहेंगे ....अगर कोई एक दुनिया से चल जाएगा तो उसकी जगह भरनी होगी ,वह नोवाँ खुदा खुद ही भेज देगा ,जो खाली जगह को भरेगा वह नौ हमेशा सही रास्ता बताने वालें होंगे
कहते हैं बेटे ने घर के लोगों को बुलाया चाहे वहां कई और भी लोग थे लेकिन घर के आदमी आठ थे नूह ने कहा था वह नोवाँ आदृश्य है ,उसे सिर्फ मैं देख सकता हूँ वह हमेशा मेरे साथ रहा है उसी नोवें को कभी न भूलना और हमेशा उसकी जगह बनाए रखना
इस तरह तरह एक ऊँचे पर्वत पर एक शिखर पर एक स्थान बना था फिर एक आदमी दुनिया से चला गया उसकी जगह खाली हो गयी तब एक अजनबी वहां आया कहने लगा मैं खाली जगह भरने आया हूँ
उस स्थान का चाहे यह नियम था कि खाली जगह भरने के लिए जो भी दरवाज़े पर आएगा वही खुदा का भेज हुआ होगा लेकिन तब उस स्थान का मुखिया एक दुनियादार था उसे उस जाने वाले अजनबी का हुलिया पसंद नहीं आया, उसके बदन पर कोई कपडा नहीं था और सारा बदन खरोंचा हुआ था जिस में से खून रिस रहा था वह बड़ी मुश्किल राहों से गुजरता ,मरता जीता मुश्किल से इस जगह पहुंचा था मुखिया ने उसको रखने से इनकार कर दिया लेकिन वह अजनबी वहीँ खड़ा रहा और आखिर मुखिया ने उसको वहां दास बना कर रख लिया
सात बरस गुजर गए ,लेकिन जब आठवां बरस आया तब उस स्थान के सात लोग उस अजनबी के जादू में लिपटे हुए थे उस स्थान को छोड़ कर चले गए ...अजनबी ने मुखिया को श्राप दिया एक दिन आएगा जब तू प्रेत सा बन जाएगा
उन वादियों के लोग इस बात की गवाही देते हैं जो पर्वत के पैरों में बिछी हुई थी उन्होंने उस स्थान के मुखिया को पहाड़ी रास्तों पर भटकते हुए देखा था लेकिन जब भी कोई उसके सामने पड़ता वह लोप हो जाता
इस चली आई पहाड़ी कहानी को मीरदाद किताब लिखने वाले को इस क़दर बैचेन कर दिया कि पहाड़ी पगडंडियों पर घूमते हुए वह उस प्रेत को सोचने लगा इसी बेचनी में उसने उस पर्वत की राह पकड़ी जिसके शिखर पर पहुँचना बहुत मुश्किल था
वह एक छड़ी हाथ में लेकर और रोटी के टुकड़े बंध कर पर्वत पर चढ़ने लगा राह सीधे सीधे पत्थरों की बनी हुई थी इसके शिखर पर पहुंचना ज़िन्दगी का खतरा था रास्ते में अजीब चीजे मिलती गयी उसकी छड़ी ,उसकी रोटी और उसके तन के कपडे सभी उस से जुदा होते गए वह एक जगह बेहोश सा गिर गया होश में आया तब उसने देखा एक कोई बहुत बूढ़ाआदमी उसके चेहरे पर पानी छिड़क रहा है और उसके जख्मों के पौंछ रहा है
उस बूढ़े आदमी ने कहा --मैं तेरा ही इन्तजार कर रहा था ,करीब एक सौ पचास बरस हो गए हैं यह बात पक्की थी कि एक दिन तुम्हे यहाँ आना था और नंगे ,भूखे ,और खाली हाथ ,तभी तो रास्ते में तुम्हारे कपडे उतार लिए गए ,तुम्हारी छड़ी छीन ली गयी और रोटी के टुकड़े भी .मैं एक अमानत लेकर यहाँ बैठा हुआ एक किताब जो तुम्हे सौपनी है ,इसलिए कि तुम उसको दुनिया को दे सको
और उस बूढ़े आदमी ने कहा मेरा नाम श्मदाम है मैं ही बदनसीब इस स्थान का मुखिया हूँ यह किताब मैं जब तेरे हाथ में दूंगा मैं उसी क्षण पत्थर हो जाउंगा और इस प्रेत ज़िन्दगी से मुक्त हो जाउंगा
शमदाम ने वह किताब मिखाइल नेइमी को पकड़ा दी उसकी एक अमानत किताब को लेने वाला हैरान था ,फिर उसने सारे खण्डहर को छान मारा ,वहां कोई नहीं था वह शमदाम न जाने कौन सी जगह पत्थर हो कर पड़ा था
यह कहानी है उस किताब की जहाँ से किताब की इब्तदा होती है .सारी किताब एक बात चीत की सूरत में है इसी बात चीत में ज़िन्दगी के सारे पहलु समाये हैं ---मोहब्बत .मालिक और गुलाम का रिश्ता .ताखलिकी ,खमोश ,पैसा साहूकार और कर्जदार ज़िन्दगी और मौत के बीच में चलता हुआ वक़्त और पछतावा ...
यह किताब अमृता ने तब पढ़ी जब वह एक रात सो रही थी उन्होंने उसका हर्फ हर्फ पी लिया जागी तो कागज कहीं नहीं था लेकिन उसका लफ्ज़ लफ्ज़ उनके सामने था उन्होंने वहीँ कागज पर उतार लिया और वह कागज़ न जाने कब तक यूँ ही हाथ में ले कर बैठी रही जब इमरोज़ कमरे में आये तो उन्होंने उनसे कहा देखो मेरे साथ क्या हुआ ..देखो यह कागज़ यह मैंने लिखा नहीं जब मैं सो रही थी तब यह एक फरमान की तरह मुझे मिला ..जानती हूँ सभी फरमान अपने अन्दर से हो उठते हैं कहीं बाहर से नहीं आते ...पर इसको देखो पढो ...

कुछ घड़ियाँ बड़ी मासूम होती है
मैंने दिल के कंधे पर हाथ रखा
कहा --अब मिटटी क्या तलाशता है योगी ?

उसने उतरते सूरज की चिलम पकड़ी
कहने लगा --फिर तू ही बता मैं क्या करूँ ?
मैंने कहा --वह खुदा की जात का बंदा है
उसकी हयाती पर फतवा था
कि दुश्मनों के देश से आती हवाओं को
वह खैर खबर पूछ लेता था
और किसी राहगीर के हाथों
चार हर्फ भी भेज देता था ...

अब जब वह कब्र में सो रहा है
तू वहां दिया जलाने कैसे जाएगा ?
कि राहों में वर्दियों का पहरा है
और वर्दियों वाले
मोहब्बत की शिनाख्त नहीं करते
और जाने कितनी हयातियाँ
यूँ ही बेशिनाखत जीती और मर जाती है
तूने मोहब्बत का योग लिया है योगी !
अब ख़ामोशी की कफनी पहन लेनी है
और सिर्फ ख़ामोशी की चिलम पीनी है !

"चिरागों की रात" अमृता प्रीतम द्वारा लिखित से कुछ पंक्तियाँ )

Monday, February 22, 2010

राँझा -राँझा कहन्दी नि मैं आपे रांझा होई से आगे ...

पैरों की कंकड़ी निकालती ,झाड़ियों का सहारा लेती जब मैं पहाड़ की चोटी के करीब पहुँच गयी तो ऊपर से आती चिरागों की रोशनी ने जैसे मेरा हाथ थाम लिया मैंने उसका सहारा लेते हुए छोटी पर कदम रखा तो सामने वही गडरिया बाबा दिखाई दिया |उसने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा--- पहुँच गयी है !
मैंने चिरागों की रोशनी में उसकी और देखा वह कहने लगा दूध ले आया था दो बड़ी बड़ी मश्के उठा कर अभी गुफा में रखी है ,और अब लौटने लगा था |
मैं हैरान हुई कि मुझे तो रास्ते में कहीं नहीं दिखाई दिया ,फिर इतनी जल्दी कैसे पहुँच गया ,दूध की मश्के भी उतार आया .पूछा तुम कौन से रास्ते से आये बाबा ? मैंने तो तुम्हे कहीं रास्ते में नहीं देखा ?
वह हँस दिया --बेटी मेरे लिए तो सारे रास्ते पहचाने हुए हैं तुम्हे तो मैंने कुछ आसान रास्ते से आने के लिए कह दिया था ,लेकिन मैं तो खड़ी चढ़ाई से भी आ सकता हूँ और जल्दी पहुँच गया
मुझे लगा जैसे वह मेरा ही कोई पुरखा हो इस लिये आराम से उसकी बाहँ पकड़ी और कहा यह तो मैं जानती हूँ बाबा कि आज की रात यहाँ चिरागों की रात है और यहाँ कर आशिक और दरवेश अपने अपने कलाम का चिराग जलाते हैं ..लेकिन क्या यह सच है ?क्या यहाँ कई बार मीर दाद की आवाज़ भी सुनाई देती है ?
गडरिया बाबा हँस दिया कहने लगा तुम जानती हो कि लामा लोग एक बार बहुत ऊँची और बहुत सी मुशकिल पहाड़ी पर साल में इक बार जाते हैं ,जहाँ महात्मा बुद्ध की आवाज़ सुनाई देती है
मैंने कहा --हाँ बाबा सुना पड़ा तो है ,लेकिन .....
वह कहने लगा -फिर आज की रात खुद देख लेना और सुन लेना कि यहाँ मीर दाद की आवाज़ आती है ? वह न पैदा हुआ था , न यहाँ मरा है ,इसलिए यहं कोई मजार नहीं है ,कोई दरगाह नहीं है ,बस मीर दाद का आस्तना है
मैंने कहा हाँ बाबा जानती हूँ वही तो जल प्रलय के समय नुह की किश्ती में बैठा था ....
बाबा हंसने लगा ,कहने लगा चोरी का मुसाफ़िर .किसी ने उसको इस किश्ती में बैठते हुए नहीं देखा था और कहता है जो भी दुखों में किसी किश्ती का चप्पू थाम लेगा ,मैं उसकी किश्ती में बैठ जाऊँगा ..किश्ती को पार लगाने के लिए
लगा ,बाबा भी मेरी तरह एतकाद से भरा हुआ है
इतने में एक दरवेश के गाने की आवाज़ आई ,जरा दूर से चिरागों की लपट के ऊपर से तैरती हुई ....
मेरा दीन भी तू ,ईमान भी तू
मेरा इश्क भी तू ,इरफ़ान भी तू

गडरिया बाबा पूछने लगा -----तुम पहचानती हो इस आवाज़ को कि यह किसकी है ?
मैंने कहा हाँ बाबा ,पहचानती हूँ ,यह गुलाम फरीद की आवाज़ है ,जो कभी रेत थलों में ...
और मेरी बात काट कर कहने लगा मैं सब जानता हूँ ,यह बड़ी अजमतों वाला है ..रेत थल में जिस भानु पर आशिक हो गया वह मेरे ही काबिले की बेटी थी ..मेरे काबिले ने बड़ी हील हुज्जत की ,लेकिन इसकी अजमते देख कर अपनी भानु उसको दे दी .निकाह के लिए
मन में आया गडरिया बाबा के पैर छुं लूँ पर उसने मेरे झुके हुए हाथ पकड़ लिए ,कहने लगा जिसका मुर्शिद मीरदाद हो ,उसको यह शोभा नहीं देता कि कोई उसके पैरों को हाथ लगाए ,यह तो मठ वालों की जरुरत होती है जो मठों के मुजावर होते हैं
और गडरिया बाबा हँस कर जल्दी से पहाड़ की पगडण्डी उतरने लगा ...

Tuesday, February 16, 2010


जवानी आई रे
मेरे बचपन के इस गांव में
बातें उडती है
इन बहती हुई हवाओं में

वह ऊँचे ऊँचे पहाड़ों में घिरी हुई वादी थी ,जहाँ सूरज तेजी से उतर जाता है .लेकिन वहां अभी उसके सुर्ख रंग ने नदी के पानी में एक तिलस्म बिछाया हुआ था | देखा वादी के गांव की एक मासूम सी लड़की नदी के पानी से खेलती हुई यह गा रही थी .और हवा के एक झोंके से याद आया यही वह वक़्त है जो कभी मुझ पर आया था .लेकिन नहीं जानती ,वह कब मुझे छोड़ कर चला गया ,कहाँचला गया -अब लगा ,वह तो इस नदी के किनारे से बेगाना हो कर मुझसे खेल रहा है ..
तभी पास से एक गडरिया गुजरा ,मैंने रास्ते के मुसाफिर की तरह उस से दुआ सलाम कहा.... उसने कहा उस लड़की को देख रही हो वह मेरी बेटी है ,बहुत मासूम है अभी नहीं जानती कि अगर कभी उसने भी मेरी तरह दरवेशों के टीले पर जाना है तो उसका रास्ता बहुत मुश्किल है ....दुश्वार रास्ता
मुझे लगा ,मुझे इस रास्ते पर जाने वाला कोई मित्र मिल गया .पूछा ..बाबा !क्या तुम दरवेशों के टीले का रास्ता जानते हो ?
वह बदन की झुरियों तक हँस पड़ा ,पूछने लगा --तुम वहां जाने के लिए आई हो ?

मैंने कहा हाँ बाबा ,बरसों से चली हूँ वहां जाने के लिए |
कहने लगा मैं तो रोज़ जाता हूँ वहां भेड़ों का दूध ले कर लेकिन तुम्हे एक बात बताना ....खाली हाथ आई हो न ?
हाँ बाबा देखो मैं खाली हाथ आई हूँ ..
गडरिया बाबा मुझे गौर से देखता रहा और कहने लगा -तुमने शोहरत का कोई छाप छल्ला तो नहीं पहना न ?
मैंने दोनों हाथ आगे किये ,खाली उँगलियों और खाली बाहों वाले
वह फिर मेरे माथे की तरफ देखता रहा ,और पूछने लगा --कोई मगरुरी का कण तो माथे पर नहीं रखा हुआ है ना ?
मैं हँस दी और कहा --राँझा -राँझा कहन्दी नि मैं आपे रांझा होई
अब गडरिया बाबा भी हंसने लगा और कहा लोग कितना कितना भार उठाये फिरते हैं ,तभी तो टीले तक नहीं पहुँच पाते .अच्छा फिर अंजुरी आगे कर
मैंने दोनों हाथों की अंजुरी बना कर आगे की तो उसने कंधे पर डाली हुई छोटी सी मश्क से मेरी अंजुरी को दूध से भर दिया साथ ही कहा कि पीती जाओ जाओ जितना पी सकती फिर चल देना उस सफ़ेद पर्वतकी पगडण्डी पर ..
डूबते सूरज की लाली अब जाने पहाड़ों की ओट में हो गयी थी ,रास्ता बिलकुल अँधेरा हो गया और मैं पगडण्डी को पैरों से टटोलती चलने लगी
आसमान पर चाँद भी खो गया था कोई बताने पूछने वाला वहां नहीं था
इतने में दूर से आवाज़ आई आज तो शगुनों वाली रात है ...
मैंने चारों तरफ दूर तक देखा ,कोई नहीं था लेकिन आवाज़ वाले ने कहा सूरज की बेटी ने जब चाँद को देख लिया ,तो उसको चाँद का विरह सताने लगा बाप ने जब बेटी की यह हालत देखी तो इक रथ तैयार किया जिसमें बुध और शुक्र नाम के दो धोड़े बंधे हुए थे ,और बाप ने बेटी को रथ में बैठा कर चाँद के घर भेज दिया वह रात थी जब चाँद के पास सूरज की बेटी आई तो उसको गले से लगा कर वह किसी कन्दरा में चला गया
मैंने कहा तभी चाँद की फांक भी कहीं नहीं दिखाई देती और और पूछा --देवी तुम कौन हो ?जो अँधेरी रात में राह गीरों का दिल रखने के लिए यहकहानी सुनाती हो ?
वह हँस दी और कहने लगी तुमने मुझे पहचाना नहीं ?मैं सूर्य सावित्री हूँ ,वही ऋग्वेद की सूर्य सावित्री
मेरा सिर नमन से झुक गया .अब कोई आवाज़ कहीं नहीं थी ..मुश्किल पगडण्डी वाले रास्ते पर भी दोनों तरफ पेड़ उगे हुए थे कभी कभी हाथ डालने के लिए और चढ़ाई वाले रास्ते पर जरा साँस लेने के लिए ....

आगे जारी है .....