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Wednesday, February 1, 2012

 मिट्टी के इस चूल्हे में से
हम कोई चिनगारी ढूँढ़ लेंगे
एक-दो फूँफें मार लेंगे
बुझती लकड़ी फिर से बाल लेंगे

मिट्टी के इस चूल्हे में
इश्क़ की आँच बोल उठेगी
मेरे जिस्म की हँडिया में
दिल का पानी खौल उठेगा

आ साजन, आज पोटली खोल लें
हरी चाय की पत्ती की तरह
वहीं तोड़-गँवाई बातें
वही सँभाल सुखाई बातें
इस पानी में डाल कर देख,
इसका रंग बदल कर देख

गर्म घूँट इक तुम भी पीना,
गर्म घूँट इक मैं भी पी लूँ
उम्र का ग्रीष्म हमने बिता दिया,
उम्र का शिशिर नहीं बीतता
 
 
सोच की इकाई को तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी...

बात चाहे जिस्म की किसी क़ाबलियत की हो, या मस्तक की किसी क़ाबलियत की, पर दोनों तरह की क़ाबलियत को, एक दूसरी की मुख़ालिफ़ करार देकर, एक को ‘जीत गई’ और एक को ‘हार गई’ कहने वाली यह भयानक साज़िश थी, जो इकाई के चाँद सूर्य को हमेशा के लिए एक ग्रहण लगा गई...

और आज हमारी दुनिया मासूम खेलों के मुक़ाबले से लेकर भयानक युद्धों के मुक़ाबले तक ग्रहणित है...

पर इस समय मैं ज़हनी क़ाबलियत के चाँद सूर्य को लगे हुए ग्रहण की बात करूँगी, जिसे सदियों से ‘शास्त्रार्थ’ का नाम दिया जा रहा है।

अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने के लिए नहीं होते हैं। वे तो एक मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति को, दूसरी मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति में मिलाने के लिए होते हैं, ताकि हमारी प्राप्तियाँ बड़ी हो जाएँ...

अदबी मुलाक़ातें दो नदियों के संगम हो सकते हैं, पर एक भयानक साज़िश थी कि वे शास्त्रार्थ हो गए...

ज्ञान की नदियों को एक-दूसरे में समाना था, और एक महासागर बनना था, पर जब उनके बहाव के सामने हार-जीत के बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, तो वे नदियाँ सूखने लगीं... नदियों की आत्मा सूखने लगी...

जीत अभिमानित हो गई, और हार क्रोधित हो गई...
अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है, और क्रोध भी एक भयानक अग्नि है, जो हर प्राप्ति को राख कर देता है...शक्ति कणों की लीला से अमृता की लिखी कुछ पंक्तियाँ ....

Thursday, April 8, 2010


जाने कितनी खामोशियाँ आपसे आवाज़ मांगती है
जाने कितने गुमनाम चेहरे आपसे पहचान माँगते हैं
और एक आग आपकी रगों में सुलगती है ,अक्षरों में ढलती है

अमृता के लिखे यह लफ्ज़ वाकई उनके लिखे को सच कर देते हैं ...उनके अनुसार काया के किनारे टूटने लगते हैं सीमा में छलक आई असीम की शक्ति ही फासला तय करती है
जो रचना के क्षण तक का एक बहुत लम्बा फासला है एहसास की एक बहुत लम्बी यात्रा ....मानना होगा कि किसी हकीकत का मंजर उतना है जितना भर किसी के पकड़ आता है ...
अमृता जी की लिखी कहानी धन्नो पढ़ी अभी कुछ दिन पहले ...इस में समाज का छिपा हुआ रूप स्पष्ट रूप से सामने आया है ...इस कहानी का स्थान कोई भी गांव हो सकता है ,पर समय वह है जब चिट्टा रूपया चांदी का होता था ,गांव की एक अधेड़ उम्र की औरत धन्नो कहानी की मुख्य पात्री है ..समाज की मुहं फट चेतना का प्रतीक ..उसके शब्दों में "औरत को तो खुदा ने शुरू से ही धेली बनाया है रूपया साबुत तो कोई कर्मों वाली होती है जिसे मन का मर्द मिल जाये ..पर उसको न किसी ने देखा न किसी ने सुना ..घर -घर बस धेलियाँ ही पड़ी हुई है "
धन्नो सारे गांव की आँखों में चुभती है क्यों कि वह मुहंफट है और सदाचार के पक्ष से गांव की हर औरत को सिले हुए मुहं का होना चाहिए ..यह धन्नो तो सिले हुए मुंहों के धागे उधेड़ती है ....धन्नो के बदन की दुखती रग उसकी ज़िन्दगी का वह हादसा है जो उसकी चढ़ती जवानी के दिनों में हुआ था ..मोहब्बत के नाम पर जो उसको माता पिता के घर से निकाल कर ले गया था ..वह कोई ऐयाश किस्म का था जो दस बीस दिन उसके साथ रहा फिर उसको कहीं बेचने की कोशिश में लग गया ......धन्नो ने यह भांप लिया और उसको मुहं फाड़ कर बता दिया था ..अगर पल्ले से बंधी हुई धेली भुनवा कर ही रोटी खानी है .तो जाते हुए तेरी जेब क्यों भर जाऊं ?और वह अकेले ही अपन जोर पर जीते हुए ,सारी उम्र कहती रही ---"काहे की चिंता है बीबी ! धेली पल्ले से बंधी हुई है ,आड़े वक़्त में भुनवा लूँगी ..."
धन्नो के पास कुछ जमीन है जो एक बार किसी मुरब्बे वाले ने उस पर रीझ कर ,अपने पुत्रों से छिपा कर उसके नाम कर दी थी अलग घर भी बनवा दिया था और जब तक जिंदा रहा उसकी खैर खबर लेता रहा था ..अब जब धन्नो का अंत समय आने को है तो गांव वालों की नजर उसकी जमीन पर लगी हुई है ..धन्नो जानती है सो माँ,मौसी जैसे पुचकारते हुए लफ़्ज़ों की खाल उधेड़ती है और नेक कामों के घूँघट भी उधेड़ती हुई अंत समय राम राम जपने की सलाह शिक्षा को भी दुत्कारती है ...और कहती है ..... भगतानी ! काहे को मेरी चिंता करती है ,धर्मराज को हिसाब देना है दे दूंगी ..यह धेली जो पल्ले बंधी है वह धर्मराज को दे कर कहूँगी ले भुना ले और हिसाब चुकता कर "...सदाचार समझने वाला समाज धन्नो की बातें सुन कर कानों में उंगिलयां दे देता है और धन्नो के मरने के बाद भी उसकी वसीयत पढ़ कर भी अश्लीलता के अर्थ नहीं जान सकता ...धन्नो के अपनी जमीन गांव की पाठशाला के नाम लिख दी है और साथ में एक चाह भी ..कि चार अक्षर लड़कियों के पेट में पड़ जाएँ और उनकी ज़िन्दगी बर्बाद न हो .
अश्लीलता धन्नो के आचरण में नहीं है ,न उसके विचारों में है ..अश्लीलता समाज के उस गठन में है जहाँ घर का निर्माण आधी औरत की बुनियाद पर टिका हुआ है ....आधी औरत --एक धेली ,सिर्फ काम वासना की पूर्ति का साधन
साबुत रुपया तो धन्नो का सपना है ,धन्नो का दर्द उस औरत की कल्पना --जिसके तन को मन नसीब हुआ हो और जिस सपने की पूर्ति के जोड़ तोड़ के लिए वह अपनी सारी जमीन गांव की पाठशाला के नाम कर देती है --भविष्य की किसी समझ बूझ के नाम ,जब औरत को अपने बदनकी धेली भुना कर नहीं जीना पड़ेगा और इस तरह से रोटी नहीं खानी पड़ेगी
अश्लीलता इस समाज के गठन में है जहाँ औरत का जिस्म न सिर्फ रोटी खरीदने का साधन बनता है ,बलिक पूरे समाज की इस स्थापना में घरेलू औरत का आदरणीय दर्ज़ा खरीदने का साधन भी है .धन्नो इसी अश्लीलता को नकारती एक ऊँची ,खुरदरी और रोष भरी आवाज़ है ......

Thursday, March 4, 2010

जिस काल में जल प्रलय आई थी ,दुनिया गर्क हो गयी थी ,उस तूफ़ान में जब जिस नूह ने एक किश्ती बना कर अपने कुछ लोगों को बचाया था और दुधिया पर्वत पर कायम किया था मीरदाद की कहानी वहीँ से शुरू होती है ....नूह ने इस दुनिया से जाने के वक़्त अपने बेटे को बुला कर कहा था पर्वत की सबसे ऊँची छोटी पर एक घर बनाना ,जहाँ चुने हुए नौ लोगों को रखना ,जो हमेशा नौ की गिनती में रहेंगे ....अगर कोई एक दुनिया से चल जाएगा तो उसकी जगह भरनी होगी ,वह नोवाँ खुदा खुद ही भेज देगा ,जो खाली जगह को भरेगा वह नौ हमेशा सही रास्ता बताने वालें होंगे
कहते हैं बेटे ने घर के लोगों को बुलाया चाहे वहां कई और भी लोग थे लेकिन घर के आदमी आठ थे नूह ने कहा था वह नोवाँ आदृश्य है ,उसे सिर्फ मैं देख सकता हूँ वह हमेशा मेरे साथ रहा है उसी नोवें को कभी न भूलना और हमेशा उसकी जगह बनाए रखना
इस तरह तरह एक ऊँचे पर्वत पर एक शिखर पर एक स्थान बना था फिर एक आदमी दुनिया से चला गया उसकी जगह खाली हो गयी तब एक अजनबी वहां आया कहने लगा मैं खाली जगह भरने आया हूँ
उस स्थान का चाहे यह नियम था कि खाली जगह भरने के लिए जो भी दरवाज़े पर आएगा वही खुदा का भेज हुआ होगा लेकिन तब उस स्थान का मुखिया एक दुनियादार था उसे उस जाने वाले अजनबी का हुलिया पसंद नहीं आया, उसके बदन पर कोई कपडा नहीं था और सारा बदन खरोंचा हुआ था जिस में से खून रिस रहा था वह बड़ी मुश्किल राहों से गुजरता ,मरता जीता मुश्किल से इस जगह पहुंचा था मुखिया ने उसको रखने से इनकार कर दिया लेकिन वह अजनबी वहीँ खड़ा रहा और आखिर मुखिया ने उसको वहां दास बना कर रख लिया
सात बरस गुजर गए ,लेकिन जब आठवां बरस आया तब उस स्थान के सात लोग उस अजनबी के जादू में लिपटे हुए थे उस स्थान को छोड़ कर चले गए ...अजनबी ने मुखिया को श्राप दिया एक दिन आएगा जब तू प्रेत सा बन जाएगा
उन वादियों के लोग इस बात की गवाही देते हैं जो पर्वत के पैरों में बिछी हुई थी उन्होंने उस स्थान के मुखिया को पहाड़ी रास्तों पर भटकते हुए देखा था लेकिन जब भी कोई उसके सामने पड़ता वह लोप हो जाता
इस चली आई पहाड़ी कहानी को मीरदाद किताब लिखने वाले को इस क़दर बैचेन कर दिया कि पहाड़ी पगडंडियों पर घूमते हुए वह उस प्रेत को सोचने लगा इसी बेचनी में उसने उस पर्वत की राह पकड़ी जिसके शिखर पर पहुँचना बहुत मुश्किल था
वह एक छड़ी हाथ में लेकर और रोटी के टुकड़े बंध कर पर्वत पर चढ़ने लगा राह सीधे सीधे पत्थरों की बनी हुई थी इसके शिखर पर पहुंचना ज़िन्दगी का खतरा था रास्ते में अजीब चीजे मिलती गयी उसकी छड़ी ,उसकी रोटी और उसके तन के कपडे सभी उस से जुदा होते गए वह एक जगह बेहोश सा गिर गया होश में आया तब उसने देखा एक कोई बहुत बूढ़ाआदमी उसके चेहरे पर पानी छिड़क रहा है और उसके जख्मों के पौंछ रहा है
उस बूढ़े आदमी ने कहा --मैं तेरा ही इन्तजार कर रहा था ,करीब एक सौ पचास बरस हो गए हैं यह बात पक्की थी कि एक दिन तुम्हे यहाँ आना था और नंगे ,भूखे ,और खाली हाथ ,तभी तो रास्ते में तुम्हारे कपडे उतार लिए गए ,तुम्हारी छड़ी छीन ली गयी और रोटी के टुकड़े भी .मैं एक अमानत लेकर यहाँ बैठा हुआ एक किताब जो तुम्हे सौपनी है ,इसलिए कि तुम उसको दुनिया को दे सको
और उस बूढ़े आदमी ने कहा मेरा नाम श्मदाम है मैं ही बदनसीब इस स्थान का मुखिया हूँ यह किताब मैं जब तेरे हाथ में दूंगा मैं उसी क्षण पत्थर हो जाउंगा और इस प्रेत ज़िन्दगी से मुक्त हो जाउंगा
शमदाम ने वह किताब मिखाइल नेइमी को पकड़ा दी उसकी एक अमानत किताब को लेने वाला हैरान था ,फिर उसने सारे खण्डहर को छान मारा ,वहां कोई नहीं था वह शमदाम न जाने कौन सी जगह पत्थर हो कर पड़ा था
यह कहानी है उस किताब की जहाँ से किताब की इब्तदा होती है .सारी किताब एक बात चीत की सूरत में है इसी बात चीत में ज़िन्दगी के सारे पहलु समाये हैं ---मोहब्बत .मालिक और गुलाम का रिश्ता .ताखलिकी ,खमोश ,पैसा साहूकार और कर्जदार ज़िन्दगी और मौत के बीच में चलता हुआ वक़्त और पछतावा ...
यह किताब अमृता ने तब पढ़ी जब वह एक रात सो रही थी उन्होंने उसका हर्फ हर्फ पी लिया जागी तो कागज कहीं नहीं था लेकिन उसका लफ्ज़ लफ्ज़ उनके सामने था उन्होंने वहीँ कागज पर उतार लिया और वह कागज़ न जाने कब तक यूँ ही हाथ में ले कर बैठी रही जब इमरोज़ कमरे में आये तो उन्होंने उनसे कहा देखो मेरे साथ क्या हुआ ..देखो यह कागज़ यह मैंने लिखा नहीं जब मैं सो रही थी तब यह एक फरमान की तरह मुझे मिला ..जानती हूँ सभी फरमान अपने अन्दर से हो उठते हैं कहीं बाहर से नहीं आते ...पर इसको देखो पढो ...

कुछ घड़ियाँ बड़ी मासूम होती है
मैंने दिल के कंधे पर हाथ रखा
कहा --अब मिटटी क्या तलाशता है योगी ?

उसने उतरते सूरज की चिलम पकड़ी
कहने लगा --फिर तू ही बता मैं क्या करूँ ?
मैंने कहा --वह खुदा की जात का बंदा है
उसकी हयाती पर फतवा था
कि दुश्मनों के देश से आती हवाओं को
वह खैर खबर पूछ लेता था
और किसी राहगीर के हाथों
चार हर्फ भी भेज देता था ...

अब जब वह कब्र में सो रहा है
तू वहां दिया जलाने कैसे जाएगा ?
कि राहों में वर्दियों का पहरा है
और वर्दियों वाले
मोहब्बत की शिनाख्त नहीं करते
और जाने कितनी हयातियाँ
यूँ ही बेशिनाखत जीती और मर जाती है
तूने मोहब्बत का योग लिया है योगी !
अब ख़ामोशी की कफनी पहन लेनी है
और सिर्फ ख़ामोशी की चिलम पीनी है !

"चिरागों की रात" अमृता प्रीतम द्वारा लिखित से कुछ पंक्तियाँ )

Monday, February 22, 2010

राँझा -राँझा कहन्दी नि मैं आपे रांझा होई से आगे ...

पैरों की कंकड़ी निकालती ,झाड़ियों का सहारा लेती जब मैं पहाड़ की चोटी के करीब पहुँच गयी तो ऊपर से आती चिरागों की रोशनी ने जैसे मेरा हाथ थाम लिया मैंने उसका सहारा लेते हुए छोटी पर कदम रखा तो सामने वही गडरिया बाबा दिखाई दिया |उसने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा--- पहुँच गयी है !
मैंने चिरागों की रोशनी में उसकी और देखा वह कहने लगा दूध ले आया था दो बड़ी बड़ी मश्के उठा कर अभी गुफा में रखी है ,और अब लौटने लगा था |
मैं हैरान हुई कि मुझे तो रास्ते में कहीं नहीं दिखाई दिया ,फिर इतनी जल्दी कैसे पहुँच गया ,दूध की मश्के भी उतार आया .पूछा तुम कौन से रास्ते से आये बाबा ? मैंने तो तुम्हे कहीं रास्ते में नहीं देखा ?
वह हँस दिया --बेटी मेरे लिए तो सारे रास्ते पहचाने हुए हैं तुम्हे तो मैंने कुछ आसान रास्ते से आने के लिए कह दिया था ,लेकिन मैं तो खड़ी चढ़ाई से भी आ सकता हूँ और जल्दी पहुँच गया
मुझे लगा जैसे वह मेरा ही कोई पुरखा हो इस लिये आराम से उसकी बाहँ पकड़ी और कहा यह तो मैं जानती हूँ बाबा कि आज की रात यहाँ चिरागों की रात है और यहाँ कर आशिक और दरवेश अपने अपने कलाम का चिराग जलाते हैं ..लेकिन क्या यह सच है ?क्या यहाँ कई बार मीर दाद की आवाज़ भी सुनाई देती है ?
गडरिया बाबा हँस दिया कहने लगा तुम जानती हो कि लामा लोग एक बार बहुत ऊँची और बहुत सी मुशकिल पहाड़ी पर साल में इक बार जाते हैं ,जहाँ महात्मा बुद्ध की आवाज़ सुनाई देती है
मैंने कहा --हाँ बाबा सुना पड़ा तो है ,लेकिन .....
वह कहने लगा -फिर आज की रात खुद देख लेना और सुन लेना कि यहाँ मीर दाद की आवाज़ आती है ? वह न पैदा हुआ था , न यहाँ मरा है ,इसलिए यहं कोई मजार नहीं है ,कोई दरगाह नहीं है ,बस मीर दाद का आस्तना है
मैंने कहा हाँ बाबा जानती हूँ वही तो जल प्रलय के समय नुह की किश्ती में बैठा था ....
बाबा हंसने लगा ,कहने लगा चोरी का मुसाफ़िर .किसी ने उसको इस किश्ती में बैठते हुए नहीं देखा था और कहता है जो भी दुखों में किसी किश्ती का चप्पू थाम लेगा ,मैं उसकी किश्ती में बैठ जाऊँगा ..किश्ती को पार लगाने के लिए
लगा ,बाबा भी मेरी तरह एतकाद से भरा हुआ है
इतने में एक दरवेश के गाने की आवाज़ आई ,जरा दूर से चिरागों की लपट के ऊपर से तैरती हुई ....
मेरा दीन भी तू ,ईमान भी तू
मेरा इश्क भी तू ,इरफ़ान भी तू

गडरिया बाबा पूछने लगा -----तुम पहचानती हो इस आवाज़ को कि यह किसकी है ?
मैंने कहा हाँ बाबा ,पहचानती हूँ ,यह गुलाम फरीद की आवाज़ है ,जो कभी रेत थलों में ...
और मेरी बात काट कर कहने लगा मैं सब जानता हूँ ,यह बड़ी अजमतों वाला है ..रेत थल में जिस भानु पर आशिक हो गया वह मेरे ही काबिले की बेटी थी ..मेरे काबिले ने बड़ी हील हुज्जत की ,लेकिन इसकी अजमते देख कर अपनी भानु उसको दे दी .निकाह के लिए
मन में आया गडरिया बाबा के पैर छुं लूँ पर उसने मेरे झुके हुए हाथ पकड़ लिए ,कहने लगा जिसका मुर्शिद मीरदाद हो ,उसको यह शोभा नहीं देता कि कोई उसके पैरों को हाथ लगाए ,यह तो मठ वालों की जरुरत होती है जो मठों के मुजावर होते हैं
और गडरिया बाबा हँस कर जल्दी से पहाड़ की पगडण्डी उतरने लगा ...

Tuesday, February 16, 2010


जवानी आई रे
मेरे बचपन के इस गांव में
बातें उडती है
इन बहती हुई हवाओं में

वह ऊँचे ऊँचे पहाड़ों में घिरी हुई वादी थी ,जहाँ सूरज तेजी से उतर जाता है .लेकिन वहां अभी उसके सुर्ख रंग ने नदी के पानी में एक तिलस्म बिछाया हुआ था | देखा वादी के गांव की एक मासूम सी लड़की नदी के पानी से खेलती हुई यह गा रही थी .और हवा के एक झोंके से याद आया यही वह वक़्त है जो कभी मुझ पर आया था .लेकिन नहीं जानती ,वह कब मुझे छोड़ कर चला गया ,कहाँचला गया -अब लगा ,वह तो इस नदी के किनारे से बेगाना हो कर मुझसे खेल रहा है ..
तभी पास से एक गडरिया गुजरा ,मैंने रास्ते के मुसाफिर की तरह उस से दुआ सलाम कहा.... उसने कहा उस लड़की को देख रही हो वह मेरी बेटी है ,बहुत मासूम है अभी नहीं जानती कि अगर कभी उसने भी मेरी तरह दरवेशों के टीले पर जाना है तो उसका रास्ता बहुत मुश्किल है ....दुश्वार रास्ता
मुझे लगा ,मुझे इस रास्ते पर जाने वाला कोई मित्र मिल गया .पूछा ..बाबा !क्या तुम दरवेशों के टीले का रास्ता जानते हो ?
वह बदन की झुरियों तक हँस पड़ा ,पूछने लगा --तुम वहां जाने के लिए आई हो ?

मैंने कहा हाँ बाबा ,बरसों से चली हूँ वहां जाने के लिए |
कहने लगा मैं तो रोज़ जाता हूँ वहां भेड़ों का दूध ले कर लेकिन तुम्हे एक बात बताना ....खाली हाथ आई हो न ?
हाँ बाबा देखो मैं खाली हाथ आई हूँ ..
गडरिया बाबा मुझे गौर से देखता रहा और कहने लगा -तुमने शोहरत का कोई छाप छल्ला तो नहीं पहना न ?
मैंने दोनों हाथ आगे किये ,खाली उँगलियों और खाली बाहों वाले
वह फिर मेरे माथे की तरफ देखता रहा ,और पूछने लगा --कोई मगरुरी का कण तो माथे पर नहीं रखा हुआ है ना ?
मैं हँस दी और कहा --राँझा -राँझा कहन्दी नि मैं आपे रांझा होई
अब गडरिया बाबा भी हंसने लगा और कहा लोग कितना कितना भार उठाये फिरते हैं ,तभी तो टीले तक नहीं पहुँच पाते .अच्छा फिर अंजुरी आगे कर
मैंने दोनों हाथों की अंजुरी बना कर आगे की तो उसने कंधे पर डाली हुई छोटी सी मश्क से मेरी अंजुरी को दूध से भर दिया साथ ही कहा कि पीती जाओ जाओ जितना पी सकती फिर चल देना उस सफ़ेद पर्वतकी पगडण्डी पर ..
डूबते सूरज की लाली अब जाने पहाड़ों की ओट में हो गयी थी ,रास्ता बिलकुल अँधेरा हो गया और मैं पगडण्डी को पैरों से टटोलती चलने लगी
आसमान पर चाँद भी खो गया था कोई बताने पूछने वाला वहां नहीं था
इतने में दूर से आवाज़ आई आज तो शगुनों वाली रात है ...
मैंने चारों तरफ दूर तक देखा ,कोई नहीं था लेकिन आवाज़ वाले ने कहा सूरज की बेटी ने जब चाँद को देख लिया ,तो उसको चाँद का विरह सताने लगा बाप ने जब बेटी की यह हालत देखी तो इक रथ तैयार किया जिसमें बुध और शुक्र नाम के दो धोड़े बंधे हुए थे ,और बाप ने बेटी को रथ में बैठा कर चाँद के घर भेज दिया वह रात थी जब चाँद के पास सूरज की बेटी आई तो उसको गले से लगा कर वह किसी कन्दरा में चला गया
मैंने कहा तभी चाँद की फांक भी कहीं नहीं दिखाई देती और और पूछा --देवी तुम कौन हो ?जो अँधेरी रात में राह गीरों का दिल रखने के लिए यहकहानी सुनाती हो ?
वह हँस दी और कहने लगी तुमने मुझे पहचाना नहीं ?मैं सूर्य सावित्री हूँ ,वही ऋग्वेद की सूर्य सावित्री
मेरा सिर नमन से झुक गया .अब कोई आवाज़ कहीं नहीं थी ..मुश्किल पगडण्डी वाले रास्ते पर भी दोनों तरफ पेड़ उगे हुए थे कभी कभी हाथ डालने के लिए और चढ़ाई वाले रास्ते पर जरा साँस लेने के लिए ....

आगे जारी है .....

Friday, January 22, 2010

लोगों के मन का कोई रिश्ता नहीं होता |सिर्फ घडी दो घडी के लिए वे रिश्ते का भ्रम डालना चाहते हैं | इसलिए लोग चुप रहते हैं ...पर जब किसी को रिश्ते से डर लगता हो .तो ख़ामोशी इस डर को बढ़ा देती है ,इसलिए उसको बोलना पड़ता है ,डर को तोडना पड़ता है ..पर कई रिश्ते ऐसे होते हैं जो न लफ़्ज़ों की पकड में आते हैं न किसी और की पकड में ...

मैंने पल भर के लिए --आसमान को मिलना था
पर घबराई हुई खड़ी थी ....
कि बादलों की भीड़ से कैसे गुजरूंगी ..

कई बादल स्याह काले थे
खुदा जाने -कब के और किन संस्कारों के
कई बादल गरजते दिखते
जैसे वे नसीब होते हैं राहगीरों के

कई बादल शुकते ,चक्कर खाते
खंडहरों के खोल से उठते ,खतरे जैसे
कई बादल उठते और गिरते थे
कुछ पूर्वजों कि फटी पत्रियों जैसे

कई बादल घिरते और घूरते दिखते
कि सारा आसमान उनकी मुट्ठी में हो
और जो कोई भी इस राह पर आये
वह जर खरीद गुलाम की तरह आये ..

मैं नहीं जानती कि क्या और किसे कहूँ
कि काया के अन्दर --एक आसमान होता है
और उसकी मोहब्बत का तकाजा ..
वह कायनाती आसमान का दीदार मांगता है

पर बादलों की भीड़ का यह जो भी फ़िक्र था
यह फ़िक्र उसका नहीं --मेरा था
उसने तो इश्क की कानी खा ली थी
और एक दरवेश की मानिंद उसने
मेरे श्वाशों कि धुनी राम ली थी
मैंने उसके पास बैठ कर धुनी की आग छेड़ी
कहा ---ये तेरी और मेरी बातें ....
पर यह बातें --बादलों का हुजूम सुनेगा
तब बता योगी ! मेरा क्या बनेगा ?

वह हंसा ---
नीली और आसमानी हंसी
कहने लगा --
ये धुंए के अम्बार होते हैं ---
घिरना जानते
गर्जना भी जानते
निगाहों की वर्जना भी जानते
पर इनके तेवर
तारों में नहीं उगते
और नीले आसमान की देही पर
इल्जाम नहीं लगते ..

मैंने फिर कहा --
कि तुम्हे सीने में लपेट कर
मैं बादलों की भीड़ से
कैसे गुजरूंगी ?
और चक्कर खाते बादलों से
कैसे रास्ता मागूंगी?

खुदा जाने --
उसने कैसी तलब पी थी
बिजली की लकीर की तरह
उसने मुझे देखा ,
कहा ---
तुम किसी से रास्ता न मांगना
और किसी भी दिवार को
हाथ न लगाना
न ही घबराना
न किसी के बहलावे में आना
बादलों की भीड़ में से
तुम पवन की तरह गुजर जाना ....

अमृता ( मैं तुम्हे फिर मिलूंगी से )

Thursday, January 7, 2010

कन्नड़ के एक माने हुए अदीब श्री शिवराम कारंत से जब किसी ने कहा कि अगर आप इजाजत दें ,तो मैं आपका ज़िन्दगी नामा लिखना चाहता हूँ तो उसी वक़्त कारंत हँस दिए कहने लगे भाई !तुम्हे मेरा कत्ल करने की क्या जरुरत है ,जबकि मैं खुद अपना कत्ल कर सकता हूँ ....दुनिया के किसी हथियार को कोई कत्ल मुआफ नहीं किया जा सकता .लेकिन कलम वह हथियार है जिसको इखलाक की अदालत में कलमकार को अपन कत्ल मुआफ होता है ...हम जो भी अपनी दास्तान लिखते हैं ज़िन्दगी की खुद अपने कातिल होते हैं ,लेकिन इखलाक की अदालत में हम बाइज्जत बरी होते हैं ......
यही वजह थी कि जब सारा ने अमृता को बहुत उदास ख़त लिखे तो उन्होंने सारा से कहा तुम अपनी कलम से पूरी दास्तान लिखो ...दुनिया में बहुत थोड़े अदीब हैं ,जो अपने हाथों पर अपने खून की मेहँदी लगा सकते हैं और अमृता का यह मानना था कि सारा उन थोड़े गिने चुने लोगों में से थी ..उसने लिखा ..अमृता !!सदियों से मुझे एक आंसू की तलाश है, लेकिन अगर बुत रोया तो मैं कंकरों से भर जाऊँगी ....
काश !मेरे लहू में कोई आवाज़ न खिले !
छाओं का दर्द पेड़ों में रह गया है
मैं मिटती जा रही हूँ !काश .कोई मुझे लिख दे ,मैं पागल नहीं होना चाहती
कोई है ,जो मेरे मौसम सहे !कोई है ,जो मेरे दिल के अंधेरों पर जबान रख दे
पानियों पर मेरे कदम की मोहर सब्त है और रवानी मेरी रूह है
मैं एडी से लेकर आँख तक पहुंची हूँ ,मगर बहुत प्यासी हूँ
तन्हाई मुझे तारीक कर रही है --
वक़्त का सांप मिटटी पे लहराया है ,और जख्मों की कोई मौत नहीं होती ...

हमारी जमीन से दो तरह की गर्द उठती है ,एक सुर्ख रंग की है और एक स्याह रंग की ॥सुर्ख रंग की गर्द वह होती है ,जिसको शोहरत कहते हैं और स्याह रंग की गर्द वह जिसको इल्जाम कहते हैं ..जिनके बदन यह गर्द लिपटती है अगर स्याह रंग की हो तो लोग अपना बदन चुरा कर चलते हैं और सुर्ख रंग की हो तो लोग उसको कीमखाब की तरह तरह पहन कर चलते हैं ...

लेकिन दुनिया में थोड़े से लोग होते हैं जो उस गर्द को चाहे वह स्याह हो या सुर्ख ,अपनी आत्मा के पानी से ।अपने बदन को धो सकते हैं .और सारा उन दुनिया के थोड़े लोगों में से एक थी ....

अमृता !!जी चाहता है मौत का घुंघट अपने हाथों से उठा दूँ और आँखों की कचहरी से दूर निकल जाऊं .काश मेरी मिटटी रूठ जाए !सुनसान आँखों में कौन रहने आएगा |आँखों की स्याही से बन्दों को लिख रही हूँ .....आंसू तो दिल की धड़कन में चुभ रहे हैं ,और आँखे हैं कि करबला का मैदान बनी हुई है ...
खुदा की इबादत का इतिहास उतना लम्बा है ,जितना इंसान के जिहन में खुदा के तस्सुवर का ..इस इतिहास में कुछ बदलता है अगर तो वह है इबादत का अंदाज़ .बुत पूजा से बुत शिकनी तक का यह अंदाज़ बदलता रहता है ,लेकिन हर अंदाज़ को इबादत का लकब जरुर नसीब होता है .।

अगर हर्फ नहीं नसीब हुआ होता सारा की इबादत को तो जिसने सजदे में झुक कर नहीं खुद सजदा हो कर कहा ....

ऐ खुदा ! क्या मैं तेरी जकाह हूँ ?या एक सजदा हूँ ?
ऐ खुदा ! तू मेरा इनकार है .और मैं तेरा इकरार हूँ ..
ऐ खुदा ! छातियों से एडी तक मैं तेरी हूँ
मैं नादानी से बच्चे जनती हूँ
और तू फजल से हुक्म जनता है
ऐ खुदा ! मैं अपनी कोख से चलती
और तेरा नाम जनती
ऐ खुदा ! मैंने अपनी नस्ल पर तेरा नाम लिखा है ...

सारा शायद जानती थी कि जिसने अपनी नस्ल पर खुदा का नाम लिखा है ,उसकी इस जुरुत को इबादत का नाम नहीं दिया जायेगा और इस लिए वह हँस दी और कहने लगी ..

ऐ खुदा ।मैं बहुत कडवी हूँ ,पर तेरी शराब हूँ !

और इस शराब का घूंट पीने के लिए होंठो को उस इंसानकी जरुरत थी ,जिस इंसान में खुदा बसता हो ..और वह इंसान कहीं नहीं था ..

सारा ने जाने किस इलहाई मोहब्बत से कहा था .."ऐ खुदा !तू चाँद की स्याही से रात लिखता है ....लेकिन खुदा के बन्दों ने रात की स्याही से सारा के दिन लिख दिए

Saturday, January 2, 2010

सारा का पहला ख़त अमृता को १६ सितम्बर १९८० में मिला उस में लिखा था ...

अमृता बाजी ! मेरे तमाम सूरज आपके
मेरे परिंदों की शाम भी चुरा ली गयी है !आज दुःख भी रूठ गया है कहते हैं ...

फैसले कभी भी फासलों के सपुर्द मत करना !
मैंने तो फासला आज तक नहीं देखा
यह कैसी आवाजें हैं जैसे रात जले कपड़ों में घूम रही है
जैसे कब्र पर कोई आँखे रख गया हो !

मैं दीवार के करीब मीलों मील चली और इंसानों से आज़ाद हो गयी
मेरा नाम कोई नहीं जानता ..दुश्मन इतने वसीह क्यों हो गए हैं
मैं औरत --अपने चाँद में आसमान का पैबंद क्यों लगाऊं !

मील पत्थर ने किसका इन्तजार किया !
औरत रात में रच गयी अमृता बाजी !
आखिर खुदा अपने मन में क्यों नहीं रहता !

आग पूरे बदन को छू गयी है
संगे मील .मीलों चलता है और साकत है
मैं अपनी आग में एक चाँद रखती हूँ
और नंगी आँख से मर्द कमाती हूँ
लेकिन मेरी रात मुझसे पहले जाग गयी है
मैं आसमान बेच कर चाँद नहीं कमाती .....

ख़त उर्दू में था .अमृता इमरोज़ की मदद से इसको पढ़ रही थी उन्होंने ख़त पर हाथ रख दिया ..और इमरोज़ से कहा ठहरो और नहीं ...और वह लड़की कह रही थी ..मैं आसमान बेचकर चाँद नहीं कमाती ..अमृता की रगों में उतरने लगी ...लगा आसमान फरोशों की इस दुनिया में यह सारा नाम की लड़की कहाँ से आ गयी ? आ गयी है तो इस दुनिया में जीएगी कैसे ?आगे लिखा था उस ख़त में ...

कदम कदम पर घूँघट की फरमाइश है ,
लेकिन मेरे नजदीक शर्म का एक अँधेरा है ........."

सारा की एक नज्म में ठीक इसी अँधेरे की तफसील है "शर्म क्या होती है औरत ! शर्म मरी हुई गैरत होती है "
इमरोज़ ख़त पढ़ रहे थे --जिस्म के अलावा मैं शेर भी कहती हूँ .शहवत में मरे हुए लोग मुझे दाद देते हैं तो मेरे गुनाह जल उठते हैं ...अमृता बाजी ! दिल बहुत उदास है ,सो आपसे बात कर ली आज कल मेरे पास दीवारें हैं और वक़्त है ...हमने तो आपकी मोहब्बत में किनारे गंवा दिए और समुन्द्र की हामी भर ली .....आँखे मुझे क्यों नापती है ?क्या इंसान के जिस्म में ही सारे राज रह गए हैं ?
मिटटी बोली लगाती है मौसम की ...सच्च है .कायनात के खातमे पर जो चीज रह जायेगी ,वह सिर्फ वक़्त होगा ...मैं अपने रब का ख्याल हूँ ,और मरी हुई हूँ ...

अमृता ने तड़प कर ख़त रख दिया और जैसे कभी खुद से कहती थी ..आओ अमृता मेरे पास आओ ..वैसे कहा आओ !सारा मेरे पास आओ ...
और सारा की एक नजम अमृता ने यूँ पढ़ी ....

अभी औरत ने सिर्फ रोना ही सीखा है
अभी पेड़ों ने फूलों की मक्कारी ही सीखी है
अभी किनारों ने सिर्फ समुन्द्र को लूटना सीखा है
औरत अपने आंसुओं से वुजू कर लेती है
मेरे लफ़्ज़ों ने कभी वुजू नहीं किया
और रात खुदा ने मुझे सलाम किया ...

अमृता के साथ मेरे दिल ने भी सारा से कहा ! आज खुदा से मिल कर मैं भी तुम्हे सलाम कहती हूँ ....

Thursday, November 19, 2009

तेरी यादें ...
बहुत दिन बीते जलावतन हुई
जियीं की मरी ---कुछ पता नही |

सिर्फ़ एक बार --एक घटना घटी
ख्यालों की रात बड़ी गहरी थी
और इतनी स्तब्ध थी
कि पत्ता भी हिले
तो बरसों के कान चौंकते |

फ़िर तीन बार लगा
जैसे कोई छाती का
द्वार खटखटाता
और दबे पांव
छत पर चढ़ता कोई
और नाखूनों से
पिछली दिवार को कुरेदता
तीन बार उठ कर
मैंने सांकल टटोली
अंधेरे को जैसे
एक गर्भ पीड़ा थी
वह कभी कुछ कहता
और कभी चुप होता
ज्यों अपने आवेश को
दांतों में दबाता
फ़िर जीती जागती एक चीज
और जाती जागती एक आवाज़

"मैं काले कोसों से आई हूँ
प्रहरियों की आँख से
इस बदन को चुराती
धीमे से आती
पता है मुझे
कि तेरा दिल आबाद है
पर कहीं वीरान सूनी
कोई जगह मेरे लिए !"

सूनापन बहुत है पर तू "
चौंक कर मैंने कहा __
तू जलावतन _
नहीं कोई जगह नहीं
मैं ठीक कहती हूँ _
कि तेरे लिए कोई जगह नहीं
यह मेरे तर्क ,
मेरे आका के हुक्म हैं !

और फ़िर जैसे
सारा अंधियारा कांप जाता है
वह पीछे लौटी
पर जाने से पहले
कुछ पास आई
और मेरे वजूद को
एक बार छुआ है
धीरे से
ऐसे,जैसे कोई
वतन की मिटटी को छूता है ...

अमृताकी इस रचना में एक बेबसी जिस तरह से उभर कर आई है वह दिल को छू लेती है .....और बहुत कुछ कह जाती है ..उनकी रचनाओं में सहज हीदिल की बात कही गई होती है जो हर किसी से अपनी बात समझा जाती है ..यह रचना भी उनकी श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है ....शुक्रिया

Friday, November 6, 2009

अमृता की कवितायेँ खुद में एक कहानी है ,एक एक लफ्ज़ अपनी बात इस तरह से कहता है जैसे ज़िन्दगी का एक सच मुकम्मल रूप से सच है ..और हर बार उनका लिखा कोई न कोई नया अर्थ दे जाता है ...आज इसी श्रृंखला में उनकी एक और कविता ..डेढ़ घंटे की मुलाकात ..जैसे ज़िन्दगी इसी लिखे में पूरी गुजर गयी हो ..और एक नया अर्थ दे गयी हो ....

डेढ़ घंटे की मुलाक़ात
जैसे बादल का एक टुकडा
आज सूरज के साथ टांका ,
उधेड़ हारी हूँ
पर कुछ नहीं बनता
और लगता है
कि सूरज के लाल कुरते में
यह बादल किसी ने बुन दिया है |

डेढ़ धंटे की मुलाक़ात
सामने उस चौक में
एक संतरी कि तरह खड़ी
और मेरी सोचों का गुजरना
उसने हाथ दे कर रोक दिया
खुदा जाने मैंने क्या कहा था
और जाने खुदा
तूने क्या सुन लिया |

डेढ़ घंटे की मुलाक़ात
सोचती हूँ
आदिवासी औरत की तरह
मैं एक चिलम सुलगा लूँ
और डेढ़ घंटे का तम्बाकू
इस आग में रख कर पी लूँ

इस से पहले
कि मेरी सोच घबरा जाए
और गलत मोड़ मुड जाए
इस से पहले
कि बादल को उतारते
यह सूरज टूट जाए
इस से पहले कि
मुलाक़ात की याद
एक नफरत में बदल जाए

डेढ़ धंटे का धुंआ
कुछ मैं पी लूँ
कुछ पवन पी ले
इस से पहले
कि इसका लफ्ज़
मेरी या तेरी जुबान पर आये
इससे पहले
कि मेरा या तेरा कान
इस जिक्र को सुने

और इस से पहले की मर्द
औरत जात की तौहीन बन जाए
और इस से पहले कि औरत
मर्द जात की ताक का का कारण बने
इस से पहले ......इस से पहले ........!!!!!!

Wednesday, June 3, 2009

"तूने इश्क भी किया
तो कुछ इस तरह
जैसे इश्क मेंह है
और तुम्हे भीगने का डर है !"

हर अतीत एक वो डायरी का पुराना पन्ना है ....जिस को हर दिल अजीज यदा कदा पलटता है और उदास हो जाता है .कई बार उस से कुछ लफ्ज़ छिटक कर यूँ बिखर जाते हैं ...कोई नाम उन में चमक जाता है ,पर कोई विशेष नाम नहीं ,क्यों कि मोहबत का कोई एक नाम नहीं होता ,उसके कई नाम होते हैं ....
वैसे तो अमृता का दूसरा मतलब ही मोहब्बत है ,पर उनके कुछ लिखे कुछ पन्ने जो मोहब्बत को एक नए अंदाज़ से ब्यान करते हैं ...उनको यहाँ कुछ बताने की कोशिश की है .. ....काया विज्ञान कहता है :यह काया पंचतत्वों से मिल कर बनी है --पृथ्वी ,जल ,वायु ,अग्नि ,और आकाश ...
लेकिन इन पांच तत्वों के बीच इतना गहन आकर्षण क्यों है कि इन्हें मिलना पड़ा ?
कितने तो भिन्न है यह ,कितने विपरीत ....
कहाँ ठहरा हुआ सा पृथ्वी तत्व ,
तरंगित होता जल तत्व
दहकता हुआ अग्नि तत्व
प्रवाह मान वायु तत्व
और कहाँ अगोचर होता आकाश तत्व ,
कोई भी तो मेल नहीं दिखता आपस में
यह कैसे मिल बैठे ..? कौन सा स्वर सध गया इनके मध्य ..? निश्चित ही इन्हें जोड़ने वाला ,मिलाने वाला कोई छठा तत्व भी होना चाहिए ...अभी यह प्रश्न सपन्दित हुआ ही था कि दसों दिशाएँ मिल कर
गुनगुनाई ..प्रेम ..वह छठा तत्व है प्रेम ....यह सभी तत्व प्रेम में है एक दूसरे के साथ ,इस लिए ही इनका मिलन होता है ..यह छठा तत्व जिनके मध्य जन्म लेता है .वे मिलते ही हैं फिर ,उन्हें मिलना ही होता है ,मिलन उनकी नियति हो जाती है !मिलन घटता ही है ..कहीं पर भी ..किसी भी समय ...इस मिलन के लिए स्थान अर्थ खो देता है ..और काल भी ..स्थान और काल की सीमायें तोड़ कर भी मिलना होता है ....फिर किसी भी सृष्टि में चाहे ,किसी भी पृथ्वी पर चाहे ....फिर पैरों के नीचे कल्प दूरी बन कर बिछे हों .निकट आना होता है उन्हें ....
यह सच ही है जो कोई प्रेम को जी लेता है ,उस में देवत्व प्रगट हो जाता है ..फिर दसों दिशाएँ मुस्करा उठती हैं ...हम सब भी आपस में प्रेम करतीं है ,तभी हम मिलती हैं ..इंसान के भीतर ...और जन्म देती है ग्यारहवीं दिशा को .......प्रेम में डूबी हम जहाँ मिलती है वही" परम प्रेम "घटित होता है ..और वहीँ "परमात्मा का वास ......"
जब यह प्रेम ,इंसान और इंसान के बीच जन्मता है तो बाँध लेता है ..और जब इंसान और कायनात के बीच फैलता है तो मुक्त कर देता है .प्रेम ही बंधन ...प्रेम ही मुक्ति ...

कोई कोई दिल न जाने मोहब्बत की कैसी भूख ले कर इस दुनिया में आता है ,जिसने अपनी कल्पना की पहचान तो कर ली .एक परछाई की तरह .लेकिन रास्ता चलते हुए उसने वह परछाई कभी देखी नहीं ...उस दिल ने वह पग -डंडियाँ खोज ली जिन पर वह सहज चल सकता है ,लेकिन वह राह खोज लेना उसके बस में नहीं है वह उसकी कल्पित मोहब्बत की राह है ..मोह की कला ,किसी किसी के अक्षरों की इतनी प्यारी पगडंडियाँ होती है जो किताबों से उठ कर कई बार इंसान के पैरों के आगे बिछ जाती है ..

मैंने तो कहा था --
तू साथ चलती रहे
और मैं कभी न थकूं !

मैंने यह कब कहा था --
कि अपनी राह के आगे कोई घर न हो
पैरों तले भटकन का लम्बा सफ़र बिछ जाए
एक बोसे के चोर बनने की खातिर
बेगानी ओट से पनाह मांगे !

मैंने तो कहा था ---
आ मोहब्बत का हासिल हो जाएँ
मैं यह कब कहा था
कि इश्क को हादसे से पहले
हादसा मान लें
मनफी होने के संशय में
बरसों पहले उदास हो जाएँ
जिन सपनों के बीज करवट बदलते हैं
उन्हें ठहरी हवा में भी न बो सकें !

मैंने तो यह कहा था ..
हुस्न एक बुझ रहा दीया है
आ बुझने से पहले
मेह की तरह बरस जाए
मैंने यह कब कहा था
कि बूंद सा गर्म राख पर गिरें
सुर -सुर करते खत्म हो जाये
साबित होने के दंभ में
खंडहर से खड़े दिखे !

Wednesday, May 6, 2009

पिछली कड़ी में " कलम मेरी कुम्हारिन हुई " में कुछ अमृता जी कि लिखी पंक्तियाँ जो मुझे विशेष रूप से पसंद है वह मैंने वहां पोस्ट की ,पर देखा हर किसी को किसी न किसी पंक्ति ने छुआ ,अमृता का लिखा यही असर करता है ,कि व्यक्ति विशेष अपने आस पास खुद को उसी से जुड़ा हुआ महसूस करता है ....आज इसी कड़ी में कुछ और असर दिल पर अपनी छाप छोड़ जाने वाली पंक्तियों का जिक्र कुछ इन्हीं पक्तियों की तरह ...

जीने लगो
तो करना
फूल ज़िन्दगी
के हवाले
जाने लगो
तो करना
बीज धरती के हवाले

अमृता ने क्या कब हवाले कर दिया अपने लिखे के जरिये वह जो पढ़े समझे वही जाने ..

उनकी कहानी पांच बरस लम्बी सड़क से कुछ पंक्तियाँ है ...चिंतन की माखी डंक मारती ,लेकिन शहद भी इकठ्ठा करती है ..सड़कें वहीँ की वहीँ रहती है ,सिर्फ राही गुजर जाते .राही भी सिर्फ चलते हैं ,पहुँचते कहीं नहीं ..
धरतीकी भांति मन के सफ़र की सड़क भी गोल होती है ,अपने से चलती है अपने तक पहुंचती है
चिमटे से कोयला तो पकडा जा सकता है ,पर आग की लपटें नहीं पकड़ी जा सकती ,आग की लपट सिर्फ आग की लपट से ही पकड़ी जा सकती है ..

यहाँ अगर किसी को चलना है तो किसी और से पैर ले कर चलता है ..पहला दूसरे से .दूसरा तीसरे से ,तीसरा चौथे से ,उधार पैर ले कर अपाहिज हो कर ..

कहानी सड़क नंबर ५ से ..


ताकत ,जब इंसान अपन भीतर से पाता ,तो उसको इस तरह से प्यार करता है जैसे कोई महबूबा को प्यार करता है .पर जब अपने भीतर से पाने की जगह वह दुनिया से पाता है ,तो उसको इस तरह से प्यार करता है जैसे कोई वेश्या से प्यार करता है
कोई रिश्ता शरीर पर पहने हुए कपडे की तरह होता है जो कभी भी शरीर से उतरा जा सकता है ,पर कोई रिश्ता नसों में चलने वाले लहू की तरह होता है जिसके बगैर इंसान जीवित नहीं रह सकता है ..
और कोई रिश्ता शरीर पर पैदा हुई खुजली की तरह होता है ......

उपन्यास (" धरती सागर और सीपियाँ )

मनुष्य को समाज चाहिए ,लेकिन समाज को मनुष्य नहीं चाहिए ..

सड़क नम्बर ५ से

सारी दुनिया कपडों में बंटी हुई है ..धरती के टुकड़े भी भेसो से पहचाने जाते हैं ,अपने अपने झंडों से ..और उनकी रक्षा भी मनुष्य नहीं करते ,वर्दियां करती है .भला कहीं सचमुच का मनुष्य सचमुच के मनुष्य को मार सकता है ? यह सिर्फ वर्दियों .पोशाकों और झंडों की लड़ाई है .
ज्ञान को धारण करना शिव के सामान सिर पर गंगा धारण करने के बराबर है ,हम सब रेत को बुहार रहे हैं ...यह और बात है कि कोई हल जुआ ले कर रेत बुहारता है ,कोई तराजू बाट लेकर और कोई कागज कलम ले कर .

उपन्यास यात्री से ली गयी पंक्तियाँ, क्या यह आज के वक़्त के सच को उजागर नहीं करती क्या ?

आज और कल में एक गरीबी का लम्बा फासला होता है जो कई बार एक जन्म में तय नहीं होता ,पर समझ की हद में आ कर कई बातें ऐसी भी होती है जो समझ के परे होती हैं ....घर बदल सकते हैं ,पर इस से क्या होता है ..कहीं भी जाओ ,वही घरों के कोने होते हैं और वही कोनों के अँधेरे .और वही अंधेरों में लटकने वाले सवाल ....
कई बातें ऐसी होती है ,जिन्हें शब्दों की सजा नहीं देनी चाहिए ..देखा जाए तो यह धरती मजबूरियों का लम्बा इतिहास है
दुर्योधन की भरी सभा में द्रौपदी ने पूछा था कि युधिष्टर जब स्वयं को हार चुके ,तब मुझे दांव पर लगाने का उन्हें क्या अधिकार था ? और यह सवाल हजारों सालों से हवा में खडा हुआ है ..

एतराज़ का सम्बन्ध कानून से होता संकोच का मन से ..
यह युग का अंतर है .आज की मोहब्बत को कोई हवन कुंड नहीं कहता .आज के राक्षसों को कोई राक्षस नहीं कहता है .आज की भलाई को कोई वरदान नहीं कहता ..आज की बुराई कोई कोई श्राप नहीं कहता है ...
खामोशी का दोष बहुत बड़ा और बहुत दूर तक फैला हुआ है ,इंसान के बिस्तर से दुनिया के राजसिहासन तक ....
कई सवाल सदियों से हवा में खड़े हुए हैं ..पर इंसान सदियों से चुप है ..
इन गलत राहो पर चलने के लिए इंसान को हिम्मत नहीं चाहिए ,इन पर न चलने के लिए हिम्मत चाहिए ..
अगर भगवान पत्थर का बनाया जा सकता है .तो इन्साफ क्यों नहीं ! जबकि वही तो सच होगा ..
जीभ सिर्फ हुकोमतों की होती है ,इन्सान तो कब का चुप है ...

उपन्यास यह सच है
से यह पंक्तियाँ न जाने कितने सवाल जहाँ में छोड़ जाती है .....और तब एक सोच पैदा होती है ...

भारत की गलियों में भटकती हवा
चूल्हे की आग को कुरेदती
उधार लिए अन्न का एक ग्रास तोड़ती
और घुटनों पे हाथ रख कर
फिर उठती है ..

चीन के पीले
और जर्द होंठों के छाले
आज बिलख कर
एक आवाज़ देते हैं
वह जाती और हर एक गले से सख्ती
और चीख मार कर वियतनाम में गिरती है

श्मशान घरों में से एक गंध सी आती
और सागर पार बैठे
श्मशान घरों के वारिस
बारूद के इस गंध को
शराब की गंध में भिगोते हैं
बिलकुल उसी तरह ,जिस तरह
कि श्मशान घरों के दूसरे वारिस
भूख की गंध को तक़दीर की गंध में भिगोते हैं

और इजराइल की नई सी माटी
या पुराने रेत अरब की
जो खून में भीगती
और जिसकी गंध
खामखाँ सहादत के जाम में डूबती

छाती की गलियों में भटकती हवा
यह सभी गंधे सूंघती और सोचती
कि धरती के अनगन से
सूतक की महक कब आएगी
कोई इडा - किसी माथे की नाडी
----कब गर्भवती होगी ?
गुलाबी मांस का सपना --
----आज सदियों के ज्ञान से
वीर्य की बूंद मांगता है .....

अपने आस पास के देशों और माहौल में यही सब तो आज भी हम देख रहे हैं ..चाहे वह स्वात घाटी हो या नेपाल का कोई कोना या श्रीलंका का जंगल ..सब किसी आस में है ....

Thursday, April 30, 2009

अक्ल इल्म की माटी भीगी
कलम मेरी कुम्हारिन हुई
गीत जिस तरह जाम ,चाक से ----
अभी अभी हो गये हो उतारे ...

दिल की भट्ठी आग जलाई
दोनों हाथ उम्र खर्च कर
एक शराब हज़ार - आताशा
महफ़िल में हम ले कर आये

सदियों ने निश्वास लिया इक
कैसा शाप दिया है हमको
जीवन बाला रूठ गयी है
एक घूंट न होंठ छुआये..

इस दावत को क्या संज्ञा दे

इश्क शराब इस तरह लगती
हर इक जाम की आंखों में हो
जैसे कुछ आंसू भर आये ..


"हर एक जाम की आंखों में हो ,जैसे कुछ आंसूं भर आए ."...........एक कलम का सच जो सदियों दिल को अपनी भावों की गहराई में डुबोता रहेगा ......अमृता की कलम का जादू कब नहीं दिल को छू गया है ...

"किसी भी मनुष्य को अगर अपनी सही जीवनी लिखनी हो ,तो उस को चाहिए वह खाली कागजों पर लहू मल दे लहू से भीगे हुए पन्नों पर यह साफ़ पढा जा सकता है कि लहू रोटी की फ़िक्र में कैसे सूखता रहा था ,यह लहू हजारों चिंताओं में कैसे सहमत रहा था और यह लहू ज़ंग के मैदान में किस तरह बहता -बिखरता रहा था ,और ,या नसों में व्यर्थ घूमता रहा था ...."

अमृता की लिखी यह पंक्तियाँ उनके लिखे उपन्यास जिलावतन से हैं ...

अमृता जी का लिखा अक्सर भटकते दिल का सहारा बन जाता है ..इन पंक्तियों में ज़िन्दगी को दर्शन दे सकने का होंसला है और दर्द से पीड़ित मानव दिल की व्यथा भी है ...एक पाठक ने तो यहाँ तक कहा कि अमृता के लिखे में कहावतें बन सकने का जज्बा है ......आज उन्हीं के लिखे उपन्यासों और नज्मों की वह पंक्तियाँ जो ..दिल में कभी सकून कभी दर्द की लहर पैदा कर देती हैं ....


"हमारी मंडियों में गेहूं भी बिकता है ,ज्वार भी बिकती है ,और औरत भी बिकती है .....आर्थिक गुलामी जब औरत को दास बनाती है ,वही दासता फिर मानसिक गुलामी बन जाती ..मानसिक गुलामी जब नासूर बनती है तब लोग नासूर के बदन पर पवित्रता कि रंगीन पोशाक पहना देते हैं ,और यह पवित्रता जो खुद मुख्तारी में से नहीं ,मज़बूरी में से जन्म लेती है .समाजी खजाने का सिक्का बन जाती है ,और समाज हर औरत को इस सिक्के से तोलता हैं .."
कहानी ( *आखिरी ख़त से )

"औरत का पाप फूल के समान होता है ,पानी में डूबता नहीं ,तैर कर मुहं से बोलता है ..मर्दों का क्या है ,उनके पाप तो पत्थरों के समान पानी में डूब जाते हैं ..."

कहानी ( *न जाने कौन रंग रे से )

"मर्द मर जाए तो भले ही औरत के सभी अंग जीवित रहते हैं ,पर उनकी कोख अवश्य मर जाती है .."

कहानी (* तीसरी औरत से )

"इस दुनिया के सुनार सोने में खोट मिलातें हैं ,दुनिया उनसे कुछ नहीं कहती है पर जब इस दुनिया के प्रेमी सोने में सोना मिलाते हैं ,तो दुनिया उनके पीछे पड़ जाती है .."

कहानी (*मिटटी की जात से )

"मिटटी की जात किसी ने न पूछी ..एक कल्लर घोडी पर चढ़ कर एक चिकनी मिटटी को ब्याहाने आ गया"

कहानी (* मिटटी की जात से )


"ब्याह के पेशे में किसी की तरक्की नहीं होती ....बीबियाँ सारी उम्र बीबियाँ ही रहती है ..खाविंद सारी उम्र खाविंद ही बने रहते हैं ..तरक्की हो सकती है ,पर होते कभी देखा नहीं ..यही कि आज जो खाविंद लगा हुआ है ,कल महबूब बन जाए .कल जो महबूब बने ,परसों वह खुदा बन जाए .रिश्ता जो सिर्फ रस्म के सहारे खडा रहता है ,चलते चलते दिल के सहारे खडा हो जाए ...आत्मा के सहारे ......"

कहानी (* मलिका से )

कुछ उदासियों की कब्रें होतीं हैं ,जिनमे मरे हुए नहीं जीवित लोग रहते हैं ..अर्थों का कोई खड्का नहीं होता है .वे पेडों के पत्तों की तरह चुपचाप उगते हैं .और चुपचाप झड़ जाते हैं ...

कहानी (* दो खिड़कियाँ से )

औरत जात का सफरनामा : कोख के अँधेरे से लेकर कब्र के अँधेरे तक होता है ?

उपन्यास (* दिल्ली की गलियाँ से )

औरत की कोख कभी बाँझ नहीं होगी ॥अगर औरत कि कोख बाँझ हो गयी तो ज़िन्दगी के हादसे किसके साथ खेलेंगे ?

उपन्यास (* बंद दरवाजा से )


है न इन पंक्तियों में कुछ कहने का वह अंदाज़, जो अपनी ही ज़िन्दगी के करीब महसूस होता है .....उनका कहना था कि आज का चेतन मनुष्य उस पाले में ठिठुर रहा है ,जिस में सपनों की धूप नहीं पहुंचती ..समाजिक और राजनीतिक सच्चाई के हाथों मनुष्य रोज़ कांपता है टूटता है ...सोचती हूँ कोई भी रचना ,कोई भी कृति ,धूप की एक कटोरी के पीने के समान है या धूप का एक टुकडा कोख में डालने की तरह है और कुछ नहीं ,सिर्फ़ ज़िन्दगी का जाडा काटने का एक साधन ...

उन्हीं की लिखी एक नज्म है ,जो उनकी यह पंक्तियाँ पढ़ कर याद आई ...

बदन का मांस
जब गीली मिटटी की तरह होता
तो सारे लफ्ज़ ----
मेरे सूखे होंठों से झरते
और मिटटी में
बीजों की तरह गिरते ....
मैं थकी हुई धरती की तरह
खामोश होती
तो निगोड़े
मेरे अंगों में से उग पड़ते
निर्लज्ज
फूलों की तरह हँसते
और मैं ..........
एक काले कोस जैसी
महक महक जाती .....


जारी है आगे भी ...