Monday, December 1, 2008

"शाह की कंजरी"

रंजना जी ने अपनी पिछली पोस्ट में अमृता जी की कहानी "दो औरतें" का जिक्र कुछ इस तरह किया था:

"चेतन- अचेतन मन से जुड़े हुए यह किस्से कभी कभी कलम तक पहुँचने में बरस लगा देते हैं ..इस का सबसे अच्छा उदाहरण अमृता ने अपनी कहानी "दो औरतों" में दिया है ...जो वह पच्चीस साल बाद अपनी कलम से लिख पायी ....इस में एक औरत शाहनी है और दूसरी वेश्या शाह की रखेल यह घटना उनकी आँखों के सामने लाहौर में हुई थी ....वहां एक धनी परिवार के लड़के की शादी थी और घर की लडकियां गा बजा रही थी ...उस शादी में अमृता भी शामिल थी ...तभी शोर मचा कि लाहौर की प्रसिद्ध गायिका तमंचा जान वहां आ रही है ,,जब वह आई तो बड़ी ही नाज नखरे वालीं लगीं ...उसको देख कर घर की मालकिन का रंग उड़ गया पर थोडी में ठीक भी हो गया ,आख़िर वह लड़के की माँ थीं ...तमंचा जान जब गा चुकी तो शाहनी ने सौ रूपये का नोट उसके आँचल में डाल दिया ...यह देख कर तमंचा जान का मुहं छोटा सा हो गया ..पर अपना गरूर कायम रखने के लिए उसने वह नोट वापस करते हुए कहा कि ..."रहने दे शाहनी आगे भी तेरा ही दिया खाती हूँ ."....इस प्रकार ख़ुद को शाह से जोड़ कर जैसे उसने शाहनी को छोटा कर दिया ....अमृता ने देखा कि शाहानी एक बार थोड़ा सा चुप हो गई पर अगले ही पल उसको नोट लौटा कर बोली ...."न न रख ले री ,शाह से तो तुम हमेशा ही लेगी पर मुझसे फ़िर तुझे कब मिलेगा ""...यह दो औरतों का अजब टकराव था जिसके पीछे सामाजिक मूल्य था ,तमंचा चाहे लाख जवान थी कलाकार थी पर शाहनी के पास जो माँ और पत्नी का मान था वह बाजार की सुन्दरता पर बहुत भारी था ...अमृता इस घटना को बहुत साल बाद अपनी कहानी में लिख पायी ..."

इसे पढ़ कर लगा कि इस कहानी को भी यहां प्रस्तुत किया जाये। अमृता जी की यह कहानी हिंदी में "शाह की कंजरी" नाम से छपी है। अमृता जी के महिला पात्र मुझे हमेशा से ही बहुत सम्मोहित करते हैं। "नागमणी" यानि "चक३६" के पात्र अलका के बारे में तो आपने यहां पढ़ा ही होगा कि यह अपने समय से एक शताब्दी पहले लिखा गया।  अमृता जी के सभी महिला पात्र मुझे पूरी तरह आधुनिक  लगते हैं । शाहनी और नीलम भी अवाक कर देतीं हैं। इस कहानी के बारे में अमृताजी ने एक जगह पर लिखा:

१९८७ में जब मेरी कहानी "शाह की कंजरी" टेलिविज़न पर "कश़मकश" सीरिज़ में टेलिकास्ट हुई, तो यह कहानी बहुत चर्चित हुई थी। कहानी के तीनों किरदार बहुत अच्छे पेश हो पाये थे।  लेकिन देखा उसकी जो चर्चा हो रही थी वह कहानी की गहरायी तक नहीं उतर पा रही थी।

वो कहानी मैंने अपनी आंखों के सामने घटित होते देखी थी, सन १९४५ में जब लाहौर में एक शादी वाले घर से निमंत्रण आया था, और मैं उस दिन वहां शामिल थी, जब घर में शादी ब्याह के गीतों वाला दिन बैठाया जाता है। उस दिन घर की मालकिन भी उस समागम में थी, और लाहौर की वो मशहूर नाजनीना भी, जिसे मल्लिकाये तरन्नुम कहा जाता था। और सब जानते थे कि वह घर के मालिक की रखैल थी।

उस नाज़नीना के पास सब कुछ था, हुस्न भी, नाज़ नखरा भी, बेहद खूबसूरत आवाज भी, लेकिन समाज का दिया हुआ वहा आदरणिय स्थान नहीं था, जो एक पत्नी के पास होता है। और जो पत्नी थी उसके पास ना जवानी थी, न कोई हुनर, लेकिन उसके पास पत्नी होने का आदरणिय स्थान था। पत्नी होने का भी और मां होने का भी।

दोनों औरतों के पास अपनी अपनी जगह थी, और अपना अपना दर्द। लेकिन एक का दर्द दूसरी के दर्द से टूटा हुआ था। दर्द का एक टुकड़ा दर्द के दूसरे टुकड़े को समझने में असमर्थ था।

दोनों के पास अपना अपना बल था, पर अपनी अपनी अपाहिज अवस्था का।

दोनों के पास एक एक सहारा था, जो कभी उनकी नजर में बेहद कीमती हो जाता था, और कभी बिल्कुल नाचीज़ सा।

हार का एहसास दोनों को था। लेकिन कभी एक का सहारा उसे जीत की गलतफहमी सी दे जाता और कभी दूसरी का सहारा उसे जीत की खुशफहमी में डाल देता।

यह एक भयानक टाकराव था - अपनी अपनी हार का, जो अपने अपने दर्द का इज़हार चाहता था। लेकिन समाज से नहीं, सिर्फ किसी उससे, जो दोनों के दर्द को अपने गले से लगा सके।

और यह हकीकत है कि पूरे पच्चीस साल दोनों क दर्द, मेरे दिल के एक कोने में बैठा रहा। और पच्चीस साल बाद १९७० में मैं यह कहानी लिख पायी थी- शाह की कंजरी ।

अमृता जी की इसी कहानी को यहां पेश किया किया जायेगा अगली पोस्टों में...

शाह की कंजरी - एक परिचय

शाह की कंजरी - पहला भाग

शाह की कंजरी - दूसरा भाग

शाह की कंजरी - अंतिम  भाग

4 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत आत्मिक तृप्ति मिलती है अमृता जी के बारे में पढ़ कर ! कहानी का हमेशा की तरह इन्तजार रहेगा !

रामराम !

Manvinder said...

bahut sunder likha hai...maine bhi ise pada hai......tv per bhi dekha thaa kashmakash ka parsaarn......

Red Soul said...

I love this blog :)

सुशील कुमार छौक्कर said...

इस बार तो मुझे भी इंतजार है इस कहानी का। बैशक मैने पहले ये पढी हुई है। पर कुछ याद नही आ रहा है। पर "रहने दे शाहनी आगे भी तेरा ही दिया खाती हूँ ." ये लाईन पढकर लगा कि हाँ पढी हुई है। पर दुबारा पढना जरुर चाहूँगा। और साथ ये भी कहूँगा कि ये नजर अमृता जी की हो सकती है जो इस अहसास पर भी कहानी लिख सकती थी।