Wednesday, April 18, 2012

एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,
लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं।
सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक है
और चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का।
सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती है
और चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति।
दोनों शक्तियाँ स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक हैं
अन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,
इंसान के भीतर पड़ी पनपती रहती है।
यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती है
और पिता-पितामह के करमों से भी।
हमारे अपने देश में, कई जातियों में
एक बड़ी रहस्यमय बात कही जाती है,
हर बच्चे के जन्म के समय,
कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना।
इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,
किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रिय
से रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती है
और आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती है...
मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथा
बहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मत
की लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए,
पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,
ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियों
से न रूठने का संकेत है।...........

मर्द ने अपनी पहचान मैं लफ़्ज़ में पानी होती है, औरत ने मेरी लफ़्ज़ में...
‘मैं’ शब्द में ‘स्वयं’ का दीदार होता है, और ‘मेरा’ शब्द ‘प्यार’ के धागों में लिपटा हुआ होता है...

लेकिन अंतर मन की यात्रा रुक जाए तो मैं लफ़्ज़ महज अहंकार हो जाता है और मेरा लफ़्ज़ उदासीनता। उस समय स्त्री वस्तु हो जाती है, और पुरुष वस्तु का मालिक।
मालिक होना उदासीनता नहीं जानता, लेकिन मलकियत उसकी वेदना जानती है।

रजनीश जी के लफ़्ज़ों में ‘‘वेदना का अनुवाद दुनिया की किसी भाषा में नहीं हो सकता। इसका एक अर्थ ‘पीड़ा’ होता है, पर दूसरा अर्थ ‘ज्ञान’ होता है। यह मूल धातु ‘वेद’ से बना है, जिस से विद्वान बनता है—ज्ञान को जानने वाला। वेदना का अर्थ हो जाता है —जो दुख के ज्ञान को जानता है।’’ सो इस वेदना के पहलू से कुछ उन गीतों को देखना होगा, जो धरती की और मन की मिट्टी से पनपते हैं।

लोकगीत बहुत व्यापक दुख से जन्म लेता है, वह उस हकीकत की ज़मीन पर पैर रखता है, जो बहुत व्यापक रूप में एक हकीकत बन चुकी होती है।
इसी तरह कहावतें भी ऐसे संस्कारों से बनती हैं, जि पर्त दर पर्त बहुत कुछ अपने में लपेट कर रखती हैं। जैसे कभी बंगाल में कहावत थी—‘‘जो औरत पढ़ना लिखना सीखती है, वह दूसरे जन्म में वेश्या होकर जन्म लेती है।

हमारे देश की अलग-अलग भाषाओं के होठों पर ऐसी कितनी कहावतें और गीत सुलगते हैं। आम स्त्री की हालत का अनुमान कुछ उन्हीं से लगाना होगा...  अमृता के लिखे शब्द उनकी लिखी पुस्तकों से ....

Thursday, March 8, 2012


सोचती हूँ-खुद के तखै़युल से, अपने देश से, अपने देश के लोगो से, और तमाम दुनिया के लोगों से-यानी खुदा की तखलीक से मेरी मुहब्बत का गुनाह सचमुच बहुत बड़ा है, बहुत संगीन.....
यह मुहब्बत- नज़्मों कहानियों, उपन्यासों और वक्त-वक्त पर लिखे गए मज़मूनों के अक्षरों में  उतरती रहीअपने लेखन के शुरुआती दिनों से जुड़ा एक प्रसंग अमृता प्रीतम ने एक पत्रिका के स्तम्भ में बताया:-
“वो दिन आज भी मेरी आँखों के सामने आ जाता है… और मुझे दिखती है मेरे पिता के माथे पर चढ़ी हुई त्यौरी. मैं तो बस एक बच्ची ही थी जब मेरी पहली किताब 1936 में छपी थी. उस किताब को बेहद पसंद करते हुए मेरी हौसलाफजाई के लिए महाराजा कपूरथला ने मुझे दो सौ रूपये का मनीआर्डर किया था. इसके चंद दिनों बाद नाभा की महारानी ने भी मेरी किताब के लिए उपहारस्वरूप डाक से मुझे एक साड़ी भेजी.
कुछ दिनों बाद डाकिये ने एक बार फिर हमारे घर का रुख किया और दरवाज़ा खटखटाया. दस्तक सुनते ही मुझे लगा कि फिर से मेरे नाम का मनीआर्डर या पार्सल आया है. मैं जोर से कहते हुए दरवाजे की ओर भागी – “आज फिर एक और ईनाम आ गया!”
इतना सुनते ही पिताजी का चेहरा तमतमा गया और उनके माथे पर चढी वह त्यौरी मुझे आज भी याद है.
मैं वाकई एक बच्ची ही थी उन दिनों और यह नहीं जानती थी कि पिताजी मेरे अन्दर कुछ अलग तरह की शख्सियत देखना चाहते थे. उस दिन तो मुझे बस इतना लगा कि इस तरह के अल्फाज़ नहीं निकालने चाहिए. बहुत बाद में ही मैं यह समझ पाई कि लिखने के एवज़ में रुपया या ईनाम पाने की चाह दरअसल लेखक को छोटा बना देती है.”

Wednesday, February 1, 2012

 मिट्टी के इस चूल्हे में से
हम कोई चिनगारी ढूँढ़ लेंगे
एक-दो फूँफें मार लेंगे
बुझती लकड़ी फिर से बाल लेंगे

मिट्टी के इस चूल्हे में
इश्क़ की आँच बोल उठेगी
मेरे जिस्म की हँडिया में
दिल का पानी खौल उठेगा

आ साजन, आज पोटली खोल लें
हरी चाय की पत्ती की तरह
वहीं तोड़-गँवाई बातें
वही सँभाल सुखाई बातें
इस पानी में डाल कर देख,
इसका रंग बदल कर देख

गर्म घूँट इक तुम भी पीना,
गर्म घूँट इक मैं भी पी लूँ
उम्र का ग्रीष्म हमने बिता दिया,
उम्र का शिशिर नहीं बीतता
 
 
सोच की इकाई को तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी...

बात चाहे जिस्म की किसी क़ाबलियत की हो, या मस्तक की किसी क़ाबलियत की, पर दोनों तरह की क़ाबलियत को, एक दूसरी की मुख़ालिफ़ करार देकर, एक को ‘जीत गई’ और एक को ‘हार गई’ कहने वाली यह भयानक साज़िश थी, जो इकाई के चाँद सूर्य को हमेशा के लिए एक ग्रहण लगा गई...

और आज हमारी दुनिया मासूम खेलों के मुक़ाबले से लेकर भयानक युद्धों के मुक़ाबले तक ग्रहणित है...

पर इस समय मैं ज़हनी क़ाबलियत के चाँद सूर्य को लगे हुए ग्रहण की बात करूँगी, जिसे सदियों से ‘शास्त्रार्थ’ का नाम दिया जा रहा है।

अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने के लिए नहीं होते हैं। वे तो एक मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति को, दूसरी मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति में मिलाने के लिए होते हैं, ताकि हमारी प्राप्तियाँ बड़ी हो जाएँ...

अदबी मुलाक़ातें दो नदियों के संगम हो सकते हैं, पर एक भयानक साज़िश थी कि वे शास्त्रार्थ हो गए...

ज्ञान की नदियों को एक-दूसरे में समाना था, और एक महासागर बनना था, पर जब उनके बहाव के सामने हार-जीत के बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, तो वे नदियाँ सूखने लगीं... नदियों की आत्मा सूखने लगी...

जीत अभिमानित हो गई, और हार क्रोधित हो गई...
अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है, और क्रोध भी एक भयानक अग्नि है, जो हर प्राप्ति को राख कर देता है...शक्ति कणों की लीला से अमृता की लिखी कुछ पंक्तियाँ ....

Wednesday, January 4, 2012

घर, क़बीला, समाज, मज़हब और सिसायत भी हमारे चाँद-सूरज होते हैं, और इनको लगे ग्रहण के वक़्त जब किसी शायर, आशिक और दरवेश का जन्म होता है तो यह हकीकत है कि दर्द का मोती उसके मस्तक में पड़ जाता है...
चेतना की यात्रा बहुत लम्बी होती है-
घर, क़बीले को जब टूटते रिश्तों का ग्रहण लगता है, तो जिस चेतना का जन्म होता है, उसके दर्द की इन्तहाँ अपनी तरह की होती है..
समाज को जब तरह-तरह की नाइन्साफ़ियों का ग्रहण लगता है, तो चेतना के अहसास की शिद्दत अपनी तरह की होती है..
मज़हब के चाँद को जब फ़िरक़ापरस्ती का ग्रहण लगता है, तो आसमान की आत्मा कैसे तड़पती है,यह चेतना अपनी तरह की होती है...
और सिसायत के सूरज को जब सत्ता की हवस का ग्रहण लगता है, तो धरती की आत्मा कैसे बिलखती है, यह चेतना अपनी तरह की होती है..
दुनिया के अदबी इतिहास को दर्द के मोती मिलते हैं, पर कोई नहीं जानता कि किसी कलमवाले की चेतना को ज़िन्दगी के कितने ग्रहण देखने और झेलने पड़ते हैं....अमृता का लिखा अक्षरों की लीला से ..
 
जब छोटी-सी थी, तब सांझ घिरने लगती, तो मैं खिड़की के पास खड़ी-कांपते होठों से कई बार कहती-अमृता ! मेरे पास आओ।
शायद इसलिए कि खिड़की में से जो आसमान सामने दिखाई देता, देखती कि कितने ही पंछी उड़ते हुए कहीं जा रहे होते...ज़रूर घरों को-अपने-अपने घोंसलों को लौट रहे होते होंगे...और मेरे होठों से बार-बार निकलता-अमृता, मेरे पास आओ ! लगता, मन का पंछी जो उड़ता-उड़ता जाने कहां खो गया है, अब सांझ पड़े उसे लौटना चाहिए...अपने घर-अपने घोसले में मेरे पास... वहीं खिड़की में खड़े-खड़े तब एक नज़्म कही थी-कागज़ पर भी उतार ली होगी, पर वह कागज़ जाने कहां खो गया, याद नहीं आता...लेकिन उसकी एक पंक्ति जो मेरे ओठों पर जम-सी गई थी-वह आज भी मेरी याद में है। वह थी-‘सांझ घिरने लगी, सब पंछी घरों को लौटने लगे, मन रे ! तू भी लौट कर उड़ जा ! कभी यह सब याद आता है-तो सोचती हूं-इतनी छोटी थी, लेकिन यह कैसे हुआ-कि मुझे अपने अंदर एक अमृता वह लगती-जो एक पंछी की तरह कहीं आसमान में भटक रही होती और एक अमृता वह जो शांत वहीं खड़ी रहती थी और कहती थी-अमृता ! मेरे पास आओ !
अब कह सकती हूं-ज़िंदगी के आने वाले कई ऐसे वक़्तों का वह एक संकेत था-कि एक अमृता जब दुनिया वालों के हाथों परेशान होगी, उस समय उसे अपने पास बुलाकर गले से लगाने वाली भी एक अमृता होगी-जो कहती होगी-अमृता, मेरे पास आओ !..
गले से गीत टूट गए
चर्खे का धागा टूट गया
और सखियां-जो अभी अभी यहां थीं
जाने कहां कहां गईं...

हीर के मांझी ने-वह नौका डुबो दी
जो दरिया में बहती थी
हर पीपल से टहनियां टूट गईं
जहां झूलों की आवाज़ आती थी...

वह बांसुरी जाने कहां गई
जो मुहब्बत का गीत गाती थी
और रांझे के भाई बंधु
बांसुरी बजाना भूल गए...

ज़मीन पर लहू बहने लगा-
इतना-कि कब्रें चूने लगीं
और मुहब्बत की शहज़ादियां
मज़ारों में रोने लगीं...

सभी कैदों में नज़र आते हैं
हुस्न और इश्क को चुराने वाले
और वारिस कहां से लाएं
हीर की दास्तान गाने वाले...अक्षरों के साए से कुछ अंश ...

Friday, December 9, 2011

सुना है
राजनीति एक क्लासिक फिल्म है
हीरो: बहुमुखी प्रतिभा का मालिक
रोज अपना नाम बदलता है
हीरोइन: हकूमत की कुर्सी वही रहती है
ऐक्स्ट्रा: लोकसभा और राजसभा के मैम्बर
फाइनेंसर: दिहाड़ी के मज़दूर,
कामगर और खेतिहर
(फाइनांस करते नहीं,
करवाये जाते हैं)
संसद: इनडोर शूटिंग का स्थान
अख़बार: आउटडोर शूटिंग के साधन
यह फिल्म मैंने देखी नहीं
सिर्फ़ सुनी है
क्योंकि सैन्सर का कहना है —
'नॉट फॉर अडल्स।'

Friday, November 18, 2011

 
कोरे काग़ज़ एक युवा मन की कितनी कातरता, कितनी बेचैनी उसमें उभरकर आयी है इसका अनुमान आप उपन्यास प्रारम्भ करते ही लगा लेगें। चौबीस वर्षीय पंकज को जब यह पता चलता है कि उसकी माँ उसकी माँ नहीं है तब अपनी असली माँ अपने असली बाप को जानने की तड़प उसे दीवानगी की हदों तक ले जाती है।


यह सत्ताईस अक्टूबर का दिन था-माँ की ज़िन्दगी का बचा-खुचा-सा।
माँ की देह में अभी पाँचों तत्त्व जुड़े हुए थे, पर जोड़नेवाले प्राणों के धागें की गाँठ बस खुलने को ही थी। उसने काँपते होठों से पाँच ख़्वाहिशें ज़ाहिर कीं-
शायद एक-एक तत्त्व की एक-एक ख़्वाहिश थी। सबसे पहली ख़्वाहिश कि मैं पीपलवाले मन्दिर में जाकर पण्डित निधि महाराज को बुला लाऊँ। और साथ ही, दूसरी ख़्वाहिश थी कि लौटते हुए ताज़े फूलों का एक हार ख़रीद लाऊँ।

पीपलवाला मन्दिर दूर नहीं, हमारी गली के मोड़ पर है, इसलिए तेज़ क़दमों से जाने में सिर्फ़ तीन मिनट लगे, और लौटते हुए लगभग अस्सी बरस के निधि महाराज को कन्धे का सहारा देकर चलने में लगभग पन्द्रह मिनट। एक फूलवाला मन्दिर के चबूतरे के पास ही बैठकर फूल बेचता है, इसलिए फूलों का हार उतनी देर में ख़रीद लिया, जितनी देर में निधि महाराज ने उठकर पावों में खड़ाऊँ पहनी...
माँ ने प्राणों के धागे की गाँठ शायद कसकर पकड़ी हुई थी। मैं जब वापस आया, माँ की देह के पाँचों तत्व अभी भी जुड़े हुए थे...

निधि महाराज को आसन देकर, मैंने माँ की तरफ़ देखा। मां ने काँपते हुए हाथों से सामने दीवार पर लगी हुई, मेरे पिता की तस्वीर की ओर इशारा किया। मैंने दीवार से तस्वीर उतारी और माँ के बिस्तर पर ले आया।
तस्वीर को छाती के पास टिकाकर, माँ ने सिरहाने की ओर इशारा किया, सिरहाने के नीचे पड़ी हुई चाबी की ओर। और फिर कमरे के कोने में गड़े हुए लकड़ी के सन्दूक़ की ओर।

अब माँ की अगली दो ख़वाहिशें और थीं। यह कि सन्दूक़ में से मैं मौलियों से बँधे हुए काग़ज़ भी निकाल लाऊँ, और किनारीवाला एक दुपट्टा भी।
माँ है सो माँ ही कहूँगा, पर उम्र के लिहाज़ से नानी या दादी भी कह सकता था। हैरानी इसलिए हुई, जब माँ ने वह किनारी जड़ा दुपट्टा अपने सिर पर ओढ़ लिया।
मौलियों में बँधे हुए काग़ज़ उसने एक बार अपने हाथों में भरे, फिर मेरी दोनों हथेलियों पर रख दिये। कहा, ‘‘तुम्हारी अमानत है।’’

उस वक़्त माँ ने नहीं, निधि महाराज ने कहा, ‘‘पंकज बेटा ! यह मकान की वसीयत है। दूसरे काग़ज़ भी ज़रूरी हैं। सँभालकर रखना है।’’ साथ ही, माँ का इशारा पाते ही निधि महाराज ने मेरे सिर पर हाथ रखा, कुछ कहा, कुछ आशीर्वाद जैसा। पर संस्कृत का वह श्लोक मेरी समझ से दूर मात्र मेरे कानों का स्पर्श पाकर रह गया।
फिर माँ ने पतझड़ के पत्तों जैसे हाथों में फूलों का हार थामा और मेरे पिता की तस्वीर पर चढ़ा दिया। फिर निधि महाराज की ओर देख टूटती-सी आवाज़ में कहने लगी, ‘‘आज सत्ताईस तारीख़...आज बृहस्पति तुला में आया है...आज मेरा संजोग है...’’

निधि ने दोनों हाथ आशीष की मुद्रा में ऊपर उठाये।
माँ ने अभी-अभी जब एकटक मेरी ओर देखा था, उसकी देह का स्पन्दन-शायद सारे अंगों में से निकलकर, उसकी आँखों में इकट्ठा हो गया था। पर अब उसकी आँखें बन्द थीं....
अपनी साँस मुझे चलती हुई नहीं, रुकती हुई-सी लगी।
घर की यह कोठरी शायद शान्त समाधि की अवस्था में पहुँच जाती, पर निधि महाराज के संस्कृत के श्लोकों ने सारी कोठरी में एक हलचल-सी पैदा कर दी....

हार के फूलों की सुगन्ध भी एक हलचल की तरह कमरे में फैल रही थी...
माँ के हाथ हिले-नमस्कार की मुद्रा में, और निधि महाराज के पैरों की तरफ़ जा झुके। साथ ही, हाथों में पहनी हुई सोने की दो चूड़ियाँ निधि महाराज के चरणों के पास रख दीं...
माँ के होंठ-चेहरे की झुर्रियों में दो झुर्रियों की तरह ही सिकुड़े हुए थे, पर उनमें से जैसे एक आवाज़ झरी, ‘‘मेरा पंकज मुझे अग्नि देगा...’’

जवाब में निधि महाराज ने श्लोकों की लय को थामकर कहा, ‘‘इच्छा पूरी होगी।’’
लगा-माँ के चेहरे की खिंची हुई झुर्रियाँ शान्त और सहज हो गयी हैं। आवाज़ भी सहज लगी, ‘‘गंगाजल....’’
जानता था-माँ ने आले में गंगाजल का लोटा रख छोड़ा है, मैंने चम्मच से माँ के मुँह में गंगाजल डाला।
होंठों में स्पन्दन-सा हुआ, जो पानी की कुछ बूँदों के साथ शान्त हो गया।
फिर कोई आवाज़ नहीं आयी। यहीं गंगाजल की कुछ बूँदें शायद माँ की पाँचवीं और आख़िरी ख़्वाहिश थी...
और लगा-प्राणों का धागा अब पाँच तत्त्वों को खोल रहा था...

पाँच तत्त्व-अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश हैं, और माँ की पाँच ख़्वाहिशें शायद एक-एक तत्त्व की एक-एक इच्छा की तरह थीं, पर नहीं जान पाया कि कौन-सी ख़्वाहिश कौन-से तत्त्व ने की थी...सिर्फ़ यही जाना कि पाँचों ख़्वाहिशें पूरी हो गयीं थीं, और अब पाँचों तत्त्व खुल-बिखर रहे थे...
निधि महाराज ने घी का एक दीया जलाकर माँ के सिरहाने के पास रख दिया।
बाहरवाले कमरे में अचानक किसी के आने की आहट महसूस हुई, शायद माँ की पड़ोसन रक्खी मौसी आयी थी, और साथ में गली-मोहल्ले का कोई और भी...पर मैं उधर देखता कि तभी दहलीज़ की ओर एक अपरिचित-सी आवाज़ सुनाई दी, ‘‘नमस्कार महाराज !’’

निधि महाराज ने दरवाज़े की ओर देखा, दोनों हाथ उठाकर नमस्कार स्वीकार किया, और आसन से उठकर उस ओर बढ़े....
मैंने अपरिचित आवाज़ वाले को पहचान लिया। दूर के रिश्ते से मेरा चाचा है वह-जनक चाचा। दो गलियों के फ़ासले पर रहता है। पता था कि उन लोगों का हमारे घर आना-जाना नहीं था, तो भी हैरानी नहीं हुई। ऐसे वक़्त शायद उसका आना स्वाभाविक ही था।
पर हैरानी हुई-इस शोक में शरीक होने के लिए आया है चाचा। अन्दर कोठी की तरफ़ नहीं आया वह। दरवाज़े में से ही पीछे बाहर के कमरे की ओर लौटता हुआ, निधि महाराज से कहने लगा, ‘‘पता लगा था कि बचेगी नहीं, इसलिए मैं आपसे बात करने के लिए मन्दिर गया था...’’

निधि महाराज दहलीज़ को लाँघकर बाहर के कमरे में जाकर खड़े हो गये। उन्हीं की आवाज़ आयी, ‘‘कहिए !’’
जवाब में चाचा की आवाज़ सुनाई दी, ‘‘आप वेदों के ज्ञाता हैं महाराज ! आपसे भी कहना होगा ? आप सब जानते हैं।’’
निधि महाराज की मुस्कराहट दिखाई नहीं दी, पर जितनी भी अक्षरों में से दिखाई दे सकती है, वह दिख गयी। कह रहे थे,‘‘यदि सब जानता हूं, तो फिर कुछ कहने की ज़रूरत नहीं ।’’
निधि महाराज ने कुछ न कहने का जैसे आदेश ही दिया था, पर कहनेवाले ने फिर भी कहा, ‘‘बस यही शंका निवृत करनी थी, महाराज ! कि देह को अग्नि देनी होगी, जिसके लिए कुल के बेटे को बुलाने के लिए अभी सन्देश भेजना होगा। आप जानते हैं कि मेरा बेटा शहर में नहीं रहता....’’

निधि महाराज की उम्र अस्सी के क़रीब है, इसलिए उनकी आवाज़ में एक लड़खड़ाहठ-सी रहती है, पर इस वक़्त जो आवाज़ सुनी वह ऊँची नहीं थी, लेकिन बहुत सख़्त थी-
‘‘कुल का बेटा उसके पास खड़ा है, कहीं से बुलाना नहीं पड़ेगा।’’
जवाब में चाचा का स्वर काँप उठा, ‘‘क्या कह रहे हैं महाराज ! क्या पंकज अग्नि देगा ?’’
‘‘हाँ, पंकज अग्नि देगा।’’ निधि महाराज ने जवाब दिया, और साथ ही कहा, ‘‘आप लोग शव-यात्रा में आना चाहें तो ज़रूर आएँ ! मृतक आपके कुल की गृहलक्ष्मी है।’’

‘‘क्या कह रहे हैं महाराज !’’-लगा, चाचा की आवाज़ हकला गयी। कह रहा था, ‘‘यह अधर्म होगा महाराज ! गृहलक्ष्मी को दत्तक पुत्र अग्नि नहीं दिखा सकता....दत्तक पुत्र वंश का नाम धारण कर सकता है, ज़मीन-जायदाद में से हिस्सा ले सकता है, पर अग्नि नहीं दे सकता...’’
‘‘दे सकता है...’’ निधि महाराज का स्वर उठा। शायद उन्हें कुछ और कहना था, पर उनकी बात को काटती-सी चाचा की आवाज़ आयी, ‘‘यह कौन से वेद में लिखा हुआ है, महाराज ?’’
निधि महाराज का स्वर जितना धीमा था, उतना ही सहज और सख़्त भी, ‘‘जिस दिन वेदों के पठन के लिए आओगे, उस दिन बताऊँगा। इस वक़्त जा सकते हो। चार बजे शव-यात्रा के लिए आ जाना।’’

लगा-एक मृत देह के सिरहाने जल रहे दीये की बाती की तरह, मैं भी चुपचाप जल रहा था...
मैं कौन हूँ ? यह दत्तक पुत्र क्या होता है ? माँ ने निधि महाराज को बुलाकर यह क्यों कहा कि पंकज अग्नि देगा ? क्या उसे मालूम था कि कोई चाचा आकर मुझे अग्नि देने से रोकेगा ?
कुछ समझ में नहीं आया-सिर्फ़ यही जान पाया कि कुछ दीये आरती के थाल में रखने के लिए होते हैं, और कुछ दीये सिर्फ़ मरनेवालों के सिरहाने के पास रखने के लिए...
और मैं शायद आरती के थाल में रखा जानेवाला दीया नहीं हूँ...
आज अचानक कोई पाताल-गंगा, धरती पर आकर, मेरे पैरों के आगे बहने लगी है..
लगता है-मेरी उम्र के पूरे चौबीस बरस, मेरे सामने एक-एक करके इस नदी में बहते जा रहे हैं...
आज घर में बहुत-सी आवाज़ें इकट्ठी हो गयी थीं। रक्खी मौसी की आवाज़ भी। मेरे सिर को सलहाकर रोती रही। गली के और जाने किस-किस घर से आये मर्दों की आवाजें भी थीं...पर इस वक़्त तक, साँझ सँवला जाने तक, वे सारी आवाज़ें उस पाताल-गंगा में बहती हुई मुझमें बहुत दूर निकल गयी हैं.....

लेकिन सुबह जो जनक चाचा अग्नि देने का अधिकार लेकर आया था, उसकी आवाज़ फिर नहीं फूटी...शायद पाताल-गंगा के किसी पिछले मोड़ पर ही पानी में गिर गयी थी, मैंने देखी नहीं।
निधि महाराज ने मेरे हाथ से माँ के पार्थिव शरीर को अग्नि दिखायी। उस वक़्त उनकी आवाज़ नहीं काँपी, हाँ मेरा हाथ अवश्य काँप गया था..

लगा-‘माँ’ लफ़्ज़ भी पाताल-गंगा में बह रहा है।
नहीं जानता कि कोई रिश्ता किस तरह पानी में बह सकता है...
आज सन्ध्या-पूजन के बाद निधि महाराज आये थे। उनके अँगोछे में कुछ फल थे, मिठाई भी। मुझे ज़बरदस्ती कुछ खिलाया। बोले-यह मन्दिर का प्रसाद है...
पूछा, ‘‘महाराज ! जो बता सकती थी, वह चौबीस बरस चुप रही। अब हमेशा के लिए चुप हो गयी है। आप बताइए ! वह मेरी कौन थी ?’’

‘‘वह तुम्हारी माँ थी पंकज !’’ निधि महाराज ने मेरे पास बैठकर मेरे सिर पर हाथ रखा।
मैंने कहा, ‘‘जानता हूँ, उसकी पहचान इसी लफ़्ज़ में है। पर आज अचानक मुझसे यह पहचान क्यों छीनी जा रही है ?’’
निधि महाराज हँस दिये। जवाब देने की बजाय पूछने लगे, ‘‘पहचान कौन देता है बेटा ?’’
कहा, ‘‘शायद जन्म ही यह पहचान देता है....’’

कहने लगे, ‘‘अन्तरात्मा यह पहचान देती है। तुम उससे पूछो कि वह तुम्हारी कौन थी ?’’
कहा, ‘‘पर अन्तरात्मा उसी ने बनायी थी। उसी ने यह अक्षर सिखाया। मेरे लिए वह पूर्ण सत्य था, पर आज किसी ने उस पूर्ण सत्य को झूठ क्यों कहना चाहा ?’’
‘‘झूठ, लोभ सिखाता है बेटा ! अन्तरात्मा नहीं सिखाती।’’
‘‘किस चीज़ का लोभ ?’’
‘‘इस मकान का, पैसे का....’’

‘‘पर बात धर्म की हुई थी, पैसे की नहीं....’’
‘‘पैसे का लोभ धर्म की आड़ लेता है...’’
‘‘पर उसने मुझे दत्तक पुत्र कहा था। दत्तक पुत्र क्या होता है ?’’
निधि महाराज जवाब को सवाल में बदलना जानते हैं। कहने लगे, ‘‘पीरों-फ़कीरों ने जिस्म को ख़ुदा का हुजरा कहा है, आत्मा की कोठरी। तुम बताओ, महान कोठरी होती है कि आत्मा ?’’
कहा, ‘‘कोठरी महान होती है, लेकिन आत्मा के कारण।’’

निधि महाराज फिर मुस्कराये। कहने लगे, पुत्र तन की कोठरी से भी जन्म ले सकता है, आत्मा से भी। पर यह दुनिया कोठरी को मान्यता देती है, आत्मा को नहीं। भूल जाती है कि कोठरी, आत्मा के कारण महान होती है...
‘‘मैं निधि महाराज का दर्शन-शास्त्र समझने की अवस्था में नहीं था, इसलिए फिर पूछा, ‘‘क्या मैंने इस माँ की कोख से जन्म नहीं लिया था ?’’

‘‘तुमने उसकी आत्मा से जन्म लिया था..’’
‘‘सो गोद लिये गये पुत्र को दत्तक पुत्र कहते हैं ?’’
‘‘कहने दो, जो कहते हैं...’’
लगा-पाताल गंगा में मैंने अपने बहते हुए रिश्ते को उस लकड़ी की तरह थामा हुआ है जिसके सहारे मैं शायद डूबने से बच सकता हूँ...

पूछा, ‘‘मेरी यह माँ और मेरा यह बाप मुझे कहाँ से लाया था ?’’
निधि महाराज क्षण-भर के लिए अन्तर्धान हो गये, फिर कहने लगे, ‘‘पिता को तुम्हारा सुख नसीब नहीं था। उनके निधन के बाद तुम्हारी माँ ने तुम्हें पाया था।’’

कहाँ से ? यह सवाल पाताल-गंगा में गोता लगाने जैसा सवाल था, इसलिए होंठों में हरकत नहीं हुई।
निधि महाराज ही कहने लगे, ‘‘उस वक़्त भी तुम्हारे इस चाचा ने बहुत मुसीबत खड़ी की थी। इस मकान का लोभ जो था ! सो उसने धर्म की आड़ ली कि विधवा स्त्री कोई पुत्र गोद नहीं ले सकती...’’
‘‘क्या ऐसी भी कोई वेद-आज्ञा है ?’’

‘‘इन्होंने वेद कब पढ़े हैं ! विधवा का धन, उसके दूर-नजदीक के सम्बन्धियों के हाथों से न निकल जाए, इसलिए ब्राह्मण-पूजा के वेदों में बारह प्रकार के पुत्र माने गये हैं। एक, जिसे जन्म दिया जाए। दूसरा, अपनी बेटी का पुत्र। तीसरा, अपनी पत्नी का दूसरे पुरुष से पैदा हुआ पुत्र। चौथा, अपनी कुँवारी कन्या का पुत्र। पाँचवाँ, पत्नी के पुनर्विवाह से हुआ पुत्र। छठा, दूसरे को गोद दिया गया पुत्र। सातवाँ, किसी माता-पिता से ख़रीदा हुआ पुत्र। आठवाँ, शुभ गुणों के कारण किसी को माना हुआ पुत्र। नौवाँ, किसी अनाथ बच्चे को पुत्र समान सोचा गया पुत्र। दसवाँ, विवाह के वक़्त गर्भवती स्त्री का पुत्र। ग्यारहवाँ, अपनी स्त्री से ऐसे पुरुष द्वारा उत्पन्न हुआ पुत्र जिसका पता न लगाया जा सके। और बारहवाँ, किसी कारण माँ-बाप का त्याग दिया गया पुत्र, जिसका पालन-पोषण किया जाए।’’

साँसें गोता खाने लगीं। पाताल, गंगा में नहीं, हैरानी में। मन आस-पास के समाज से निकलकर उस वक़्त की तरफ़ देखने लगा-जब कुँवारी कन्या का पुत्र भी दम्पती के लिए पुत्र हुआ करता था, और जब विवाह के वक़्त गर्भवती पत्नी का पुत्र भी पुत्र होता था...
आजकल के अख़बारों में मैंने प्रायः उन नालियों का ज़िक्र पढ़ा हुआ है, जिनमें सद्यःजात शिशु मृत अथवा जीवित मिलते हैं...
शायद माथा नहीं पर मन ज़रूर निधि महाराज के ज्ञान के आगे झुक गया।

सिर्फ़ इतना ही कहा, ‘‘माँ कई बार अपनी एक परलोक सिधार गयी बेटी का ज़िक्र किया करती थी। कहा करती थी, मरकर वही तुम्हारी सूरत में पैदा हो गयी-वही आँखें वही माथा वह हँसी...’’
साथ ही, ख़याल आया-जब माँ मेरी सूरत मृत बहन की सूरत के साथ मिलाती थी; तब सब स्वाभाविक लगता था। उसने मुझे कभी नहीं बताया कि मैं उसका गोद लिया हुआ पुत्र था। पर...
मुझे जैसे हँसी आ गयी। निधि महाराज से कहा, ‘‘आत्मा पुत्र को जन्म देती है, पर साथ ही शायद भ्रम भी पातली है। माँ यह भूल गयी कि उसकी मृत बेटी की सूरत लेकर मैं कैसे जन्म ले सकता हूँ।’’

निधि महाराज कुछ नहीं बोले। मैं ही माँ के उदास मन की बातें सुना-सुना कर माँ के भ्रम पर हँसता-सा रहा।
उन्होंने सिर्फ़ यह बताया कि तुम्हें गोद लेते वक़्त, तुम्हारे दूर के इस चाचा ने जो दुहाई दी थी, उस बात का खण्डन भी धर्म के नाम पर किया गया था। वह सच भी था। तुम्हारे पिता की मृत्यु अचानक हुई थी, मृत्यु से पहले उन्होंने तुम्हें गोद लेने का निश्चय किया हुआ था। इसलिए माँ भले ही विधवा थी, जब उसने तुम्हें गोद लिया तो उसके निश्चय में तुम्हारे पिता का निश्चय भी शामिल था। दोष मुझ पर भी लगाया गया था कि मैंने पूजा के लोभ में आकर तुम्हारी माँ को इस अधर्म से रोका नहीं था, पर झूठे दोष से क्या होता है...

उस वक़्त निधि महाराज ने अपने अँगोछे की गाँठ में बँधी हुई सोने की चूड़ियाँ मेरी हथेली पर रख दीं, जो आज सुबह माँ ने उनके चरणों में चढ़ायी थीं। कहने लगे, ‘‘चूड़ियाँ तुम्हारी माँ को बहुत प्यारी थीं। उसकी चल बसी बेटी की निशानी थीं ये। यह निशानी अब तुम्हारे पास रहनी चाहिए...’’
संकोच-सा हुआ। कहा, ‘‘पर यह माँ का दान है...’’

निधि महाराज हँस दिये-‘‘दान का हक़ सिर्फ़ तुम्हारी माँ को था, मुझे नहीं है ? तुम यह मेरा दान समझ लो। यह मेरी अन्तरात्मा की आवाज़ है कि चूड़ियाँ इसी घर में रहनी चाहिए। इस घर में जब घर की बहू आएगी, ये उसके हाथों में होनी चाहिए....’’
आज तक ब्राह्मण-लोभ की बात, जो भी देखी-सुनी थी, निधि महाराज ने मेरी आँखों के सामने उसका खण्डन कर दिया। इसलिए मन फिर एक बार उनके आगे झुक गया।

आज के तूफान के बाद, मैं इस सुख का पल सँभालकर अंजुलि में भर लेना चाहता था, पर हाथों में सामर्थ्य नहीं थी। मुँह से निकला, ‘‘आपने माँ से कभी नहीं पूछा था कि मैं कौन हूँ ?’’
निधि महाराज ने नज़र भरकर मेरी ओर देखा। बोले, ‘‘मैं सिर्फ़ यह जानता हूँ कि तुम एक धर्म-प्राण माँ के पुत्र हो। आज तुमने अपनी माँ के शब्द सुने थे,

जब उसने तुम्हारे पिता की तस्वीर को फूलों का हार पहनाया था ? वह फूलों की जयमाला थी। उसने कहा था-आज सत्ताईस तारीख़ है, आज बृहस्पति तुला में आया है, आज मेरा संजोग है...’’
माँ ने कहा था, पर उसकी बात मेरी समझ से बाहर रही आयी। इस वक़्त भी याद नहीं थी। निधि महाराज ने उसके शब्द दोहराये, तो याद आयी। मैंने पूछा, ‘‘मैं कुछ नहीं समझा था, इसका क्या मतलब था ?’’

‘‘वह तुम्हारे पिता के निधन के बाद सिर्फ़ तुम्हारा मुँह देखकर जीती रही। तुम्हें पालने के लिए, तुम्हें पढ़ाने के लिए, तुम्हें बड़ा करने के लिए। वैसे वह तुम्हारे पिता से बिछुड़कर जीना नहीं चाहती थी। वह इस दुनिया से विदा होकर, अगली दुनिया में तुम्हारे पिता से मिलने का इन्तज़ार कर रही थी...उसे मालूम था कि आज के दिन बृहस्पति तुला राशि में आएगा, और जिनके विवाह बहुत देर से रुके हुए हैं, उनके संजोग बनेंगे। उसने अपनी मृत्यु को भी तुम्हारे पिता के साथ संयोग का दिन माना। सोचा, अब वह अगली दुनिया में जाकर तुम्हारे पिता से मिल सकेगी। इसीलिए उसने किनारीवाला दुपट्टा ओढ़ा। तुम्हें पालकर बड़ा करनेवाले कर्तव्य से वह मुक्त हो गयी थी। उसके लिए यह मृत्यु उसके संयोग का दिन था। इसलिए कहता हूँ कि वह धर्मात्मा थी...’’

मैं बोल नहीं सका। मन का सवाल गूँगा-सा होकर निधि महाराज के मुँह की ओर ताकता रहा...
वह चले गये हैं...
सामने फिर अँधेरे की पाताल-गंगा बह रही है।
नहीं जानता कि मन का कौन-सा चिन्तन इस पाताल-गंगा में डूब जाएगा, और कौन-सा उस दूसरे किनारे पर जा लगेगा।

Monday, November 7, 2011

बृहस्पतिवार का व्रत’ कहानी उस ज़मीन पर खड़ी है, जिससे मैं वाकिफ नहीं थी। एक बार एक अजनबी लड़की ने आकर मिन्नत-सी की कि मैं उसकी कहानी लिख दूँ। और एक ही साँस में उसने कह दिया—‘मैं कॉलगर्ल हूँ।’ उसी से, तन-बदन बेचने वाली लड़कियों के रोज़गार का कुछ अता-पता लिया, और उसके अंतर में पलती हुई उस पीड़ा को जाना, जो घर का एक स्वप्न लिए हुए, मन्नत-मुराद माँगती हैं किसी आने वाले जन्म के लिए....


आज बृहस्पतिवार था, इसलिए पूजा को आज काम पर नहीं जाना था...
बच्चे के जागने की आवाज़ से पूजा जल्दी से चारपाई से उठी और उसने बच्चे को पालने में से उठाकर अपनी अलसाई-सी छाती से लगा लिया, ‘‘मन्नू देवता ! आज रोना नहीं, आज हम दोनों सारा दिन बहुत-सी बातें करेंगे...सारा दिन....’’
यह सारा दिन पूजा को हफ्ते में एक बार नसीब होता था। इस दिन वह मन्नू को अपने हाथों से नहलाती थी, सजाती थी, खिलाती थी और उसे कन्धे पर बिठाकर आसपास के बगीचे में ले जाती थी।
यह दिन आया का नहीं, माँ का दिन होता था...
आज भी पूजा ने बच्चे को नहला-धुलाकर और दूध पिलाकर जब चाबी वाले खिलौने उसके सामने रख दिए, तो बच्चे की किलकारियों से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया.....
चैत्र मास के प्रारम्भिक दिन थे। हवा में एक स्वाभाविक खुशबू थी, और आज पूजा की आत्मा में भी एक स्वाभाविक ममता छलक रही थी। बच्चा खेलते-खेलते थककर उसकी टाँगों पर सिर रखकर ऊँघने लगा, तो उसे उठाकर गोदी में डालते हुए वह लोरियों जैसी बातें करने लगी—‘मेरे मन्नू देवता को फिर नींद आ गई...मेरा नन्हा-सा देवता...बस थोड़ा-सा भोग लगाया, और फिर सो गया...’’

पूजा ने ममता से विभोर होकर मन्नू का सिर भी चूम लिया, आँखें भी, गाल भी, गरदन भी—और जब उसे उठाकर चारपाई पर सुलाने लगी तो मन्नू कच्ची नींद के कारण रोने लगा।
पूजा ने उसे उठाकर फिर कन्धे से लगा लिया और दुलारने लगी, ‘‘मैं कहीं नहीं जा रही, मन्नू ! आज मैं कहीं नहीं जाऊँगी...।’’
लगभग डेढ़ वर्ष के मन्नू को शायद आज भी यह अहसास हुआ था कि माँ जब बहुत बार उसके सिर व माथे को चूमती है, तो उसके बाद उसे छोड़कर चली जाती है।
और कन्धे से कसकर चिपटे हुए मन्नू को वह हाथ से दुलारती हुए कहने लगी, ‘‘हर रोज तुम्हें छोड़कर चली जाती हूँ न...जानते हो कहाँ जाती हूँ ? मैं जंगल में से फूल तोड़ने नहीं जाऊँगी, तो अपने देवता की पूजा कैसे करूँगी ?’’
और पूजा के मस्तिष्क में बिजली के समान वह दिन कौंध गया, जब एक ‘गेस्ट हाउस’ की मालकिन मैडम डी. ने उसे कहा था—‘‘मिसिज़ नाथ ! यहाँ किसी लड़की का असली नाम किसी को नहीं बताया जाता। इसलिए तुम्हें जो भी नाम पसन्द हो रख लो।’’

और उस दिन उसके मुँह से निकला था—‘‘मेरा नाम पूजा होगा।’’
गेस्ट हाउस वाली मैडम डी. हँस पड़ी थी—‘‘हाँ, पूजा ठीक है, पर किस मन्दिर की पूजा ?’’
और उसने कहा था—‘‘पेट के मन्दिर की।’’
माँ के गले से लगी बाँहों ने जब बच्चे को आँखों में इत्मीनान से नींद भर दी, तो पूजा ने उसे चारपाई पर लिटाते हुए, पैरों के बल चारपाई के पास बैठकर अपना सिर उसकी छाती के निकट, चारपाई की पाटी पर रख दिया और कहने लगी—‘‘क्या तुम जानते हो, मैंने अपने पेट को उस दिन मन्दिर क्यों कहा था ? जिस मिट्टी में से किसी देवता की मूर्ति मिल जाए, वहाँ मन्दिर बन जाता है—तू मन्नू देवता मिल गया तो मेरा पेट मन्दिर बन गया....’’
और मूर्ति को अर्ध्य देने वाले जल के समान पूजा की आँखों में पानी भर आया, ‘‘मन्नू, मैं तुम्हारे लिए फूल चुनने जंगल में जाती हूँ। बहुत बड़ा जंगल है, बहुत भयानक, चीतों से भरा हुआ, भेड़ियों से भरा हुआ, साँपों से भरा हुआ...’’
और पूजा के शरीर का कंपन, उसकी उस हथेली में आ गया, जो मन्नू की पीठ पर पड़ी थी...और अब वह कंपन शायद हथेली में से मन्नू की पीठ में भी उतर रहा था।

उसने सोचा—मन्नू जब खड़ा हो जाएगा, जंगल का अर्थ जान लेगा, तो माँ से बहुत नफरत करेगा—तब शायद उसके अवचेतन मन में से आज का दिन भी जागेगा, और उसे बताएगा कि उसकी माँ किस तरह उसे जंगल की कहानी सुनाती थी—जंगल की चीतों की, जंगल के भेड़ियों की और जंगल के साँपों की—तब शायद....उसे अपनी माँ की कुछ पहचान होगी।
पूजा ने राहत और बेचैनी का मिला-जुला साँस लिया। उसे अनुभव हुआ जैसे उसने अपने पुत्र के अवचेतन मन में दर्द के एक कण को अमानत की तरह रख दिया हो....
पूजा ने उठकर अपने लिए चाय का एक गिलास बनाया और कमरे में लौटते हुए कमरे की दीवारों को ऐसे देखने लगी जैसे वह उसके व उसके बेटे के चारों ओर बनी हुई किसी की बहुत प्यारी बाँहें हों...उसे उसके वर्तमान से भी छिपाकर बैठी हुई....

पूजा ने एक नज़र कमरे के उस दरवाजे की तरफ देखा—जिसके बाहर उसका वर्तमान बड़ी दूर तक फैला हुआ था....
शहर के कितने ही गेस्ट हाउस, एक्सपोर्ट के कितने ही कारखाने, एअर लाइन्स के कितने ही दफ्तर और साधारण कितने ही कमरे थे, जिनमें उसके वर्तमान का एक-एक टुकड़ा पड़ा हुआ था....
परन्तु आज बृहस्पतिवार था—जिसने उसके व उसके वर्तमान के बीच में एक दरवाज़ा बन्द कर दिया था।
बन्द दरवाज़े की हिफाजत में खड़ी पूजा को पहली बार यह खयाल आया कि उसके धन्धे में बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है ?
इस बृहस्पतिवार की गहराई में अवश्य कोई राज़ होगा—वह नहीं जानती थी, अतः खाली-खाली निगाहों से कमरे की दीवारों को देखने लगी...
इन दीवारों के उस पार उसने जब भी देखा था—उसे कहीं अपना भविष्य दिखाई नहीं दिया था, केवल यह वर्तमान था...जो रेगिस्तान की तरह शहर की बहुत-सी इमारतों में फैल रहा था....
और पूजा यह सोचकर काँप उठी कि यही रेगिस्तान उसके दिनों से महीनों में फैलता हुआ—एक दिन महीनों से भी आगे उसके बरसों में फैल जाएगा।

और पूजा ने बन्द दरवाज़े का सहारा लेकर अपने वर्तमान से आँखें फेर लीं।
उसकी नज़रें पैरों के नीचे फर्श पर पड़ीं, तो बीते हुए दिनों के तहखाने में उतर गईं।
तहखाने में बहुत अँधेरा था....बीती हुई ज़िन्दगी का पता नहीं क्या-क्या, कहाँ-कहाँ पड़ा हुआ था, पूजा को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।
परन्तु आँखें जब अँधेरे में देखने की अभ्यस्त हुईं तो देखा—तहखाने के बाईं तरफ, दिल की ओर, एक कण-सा चमक रहा था।
पूजा ने घुटनों के बल बैठकर उसे हाथ से छुआ।
उसके सारे बदन में एक गरम-सी लकीर दौड़ गई और उसने पहचान लिया—यह उसके इश्क का ज़र्रा था, जिसमें कोई आग आज भी सलामत थी।

और इसी रोशनी में नरेन्द का नाम चमका—नरेन्द्रनाथ चौधरी का जिससे उसने बेपनाह मुहब्बत की थी।
और साथ ही उसका अपना नाम भी चमका—गीता, गीता श्रीवास्तव।
वह दोनों अपनी-अपनी जवानी की पहली सीढ़ी चढ़े थे—जब एक-दूसरे पर मोहित हो गए थे।
परन्तु चौधरी और श्रीवास्तव दो शब्द थे-जो एक-दूसरे के वजूद से टकरा गए थे
उस समय नरेन्द्र ने अपने नाम से चौधरी व गीता ने अपने नाम से श्रीवास्तव शब्द झाड़ दिया था।
और वह दोनों टूटे हुए पंखों वाले पक्षियों की तरह हो गए थे।
चौधरी श्रीवास्तव दोनों शब्दों की एक मजबूरी थी—चाहे-अलग-अलग तरह की थी। चौधरी शब्द के पास अमीरी का गुरूर था। इसलिए उसकी मजबूरी उसका यह भयानक गुस्सा था, जो नरेन्द्र पर बरस पड़ा था। और श्रीवास्तव के पास बीमारी और गरीबी की निराशा थी—जिसकी मजबूरी गीता पर बरस पड़ी थी, और पैसे के कारण दोनों को कॉलेज की पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी।

और जब एक मन्दिर में जाकर दोनों ने विवाह किया था, तब चौधरी और श्रीवास्तव दोनों शब्द उनके साथ मन्दिर में नहीं गए थे। और मन्दिर से वापस लौटते कदमों के लिए चौधरी-घर का अमीर दरवाज़ा गुस्से के कारण बन्द हो गया था और श्रीवास्तव-घर का गरीबी की मजबूरी के कारण।
फिर किसी रोज़गार का कोई भी दरवाज़ा ऐसा नहीं था, जो उन दोनों ने खटखटाकर न देखा हो। सिर्फ देखा था कि हर दरवाज़े से मस्तक पटक-पटककर उन दोनों मस्तकों पर सख्त उदासी के नील पड़ गए थे।
रातों को वह बीते हुए दिनों वाले होस्टलों में जाकर, किसी अपने जानने वाले के कमरे में पनाह माँग लेते थे और दिन में उनके पैरों के लिए सड़कें खुल जाती थीं।
वही दिन थे—जब गीता को बच्चे की उम्मीद हो आई थी।

गीता की कॉलेज की सहेलियों ने और नरेन्द्र के कॉलेज के दोस्तों ने उन दिनों में कुछ पैसे इकट्ठे किए थे, और दोनों ने जमुना पार की एक नीची बस्ती में सरकण्डों की एक झुग्गी बना ली थी—जिसके बाहर चारपाई बिछाकर गीता आलू, गोभी और टमाटर बेचने लगी थी, और नरेन्द्र नंगे पाँव सड़कों पर घूमता हुआ काम ढूँढ़ने लगा था।
खैरायती हस्पताल के दिन और भी कठिन थे—और जब गीता अपने सात दिन के मन्नू को गोद में लेकर, सरकण्डों की झुग्गी में वापस आई थी—तो बच्चे के लिए दूध का सवाल भी झुग्गी में आकर बैठ गया था।
और कमेटी के नलके से पानी भरकर लाने वाला समय।

पूजा के पैरों में दर्द की एक लहर उठकर आज भी, उसके पैरों को सुन्न करती हुई, ऊपर की रीढ़ की हड्डी में फैल गई, जैसे उस समय फैलती थी, जब वह गीता थी, और उसके हाथ में पकड़ी हुई पानी की बाल्टी का बोझ, पीठ में भी दर्द पैदा करता था, और गर्भ वाले पेट में भी।
पूजा ने तहखाने में पड़े हुए दिनों को वहीं हाथ से झटककर अँधेरे में फेंक दिया और उस सुलगते हुए कण की ओर देखने लगी, जो आज भी उसके मन के अँधेरे में चमक रहा था।
जब वह घबराकर नरेन्द्र की छाती से कसकर लिपट जाती थी—तो उसकी अपनी छाती में से सुख पिघलकर उसकी रगों में दौड़ने लगता था।

पूजा के पैरों से फिर एक कंपन उसके माथे तक गया—जब तहखाने में पड़े हुए दिनों में से—अचानक एक दिन उठकर काँटे की तरह उसके पैरों में चुभ गया—जब नरेन्द्र को हर रोज़ हल्का-हल्का बुखार चढ़ने लगा था, और वह मन्नू को नरेन्द्र की चारपाई के पास डालकर नौकरी की तलाश करने चली गई थी।
उसे यह विचार आया कि वह इस देश में जन्मी-पली नहीं थी, बाप की तरफ से वह श्रीवास्तव कहलाती थी, परन्तु वह नेपाल की लड़की थी, माँ की तरफ से नेपाली, इस कारण उसे शायद अपने या किसी और देश के दूतावास में ज़रूर कोई नौकरी मिल जाएगी—और इसी सिलसिले में वह सब्जी बेचने का काम नरेन्द्र को सौंपकर हर रोज़ नौकरी की तलाश में जाने लगी थी।

‘मिस्टर एच’—पूजा को यह नाम अचानक इस तरह याद आया जैसे वह जीवन के जलकर राख हुए कुछ दिनों को कुरेद रही हो, और अचानक उसका हाथ उस राख में किसी गर्म अंगारे को छू गया हो।
वह उसे एक दूतावास के ‘रिसेप्शन रूम’ में मिला था। एक दिन कहने लगा, ‘‘गीता देवी ! मैं तुम्हें हर रोज़ यहाँ चक्कर लगाते देखता हूँ। तुम्हें नौकरी चाहिए ? मैं तुम्हें नौकरी दिलवा देता हूँ। यह लो, तुम्हें पता लिख देता हूँ, अभी चली जाओ। आज ही नौकरी का प्रबन्ध हो जाएगा...’’ और पूजा, जब गीता होती थी, कागज़ का वह टुकड़ा पकड़कर, अचानक मेहरबान हुई किस्मत पर हैरान खड़ी रह गई थी।

वह पता एक गेस्ट हाउस की मालकिन—‘मैडम डी.’ का था, जहाँ पहुँचकर वह और भी हैरान रह गई थी, क्योंकी नौकरी देने वाली मैडम डी. उसे ऐसे तपाक से मिली जैसे पुराने दिनों की कोई सहेली मिली हो। गीता को एक ठण्डे कमरे में बिठाकर उसने गर्म चाय और भुने हुए कबाब खिलाए थे।
नौकरी किस-किस काम की होगी, कितने घंटे वह कितने तनख्वाह—जैसे सवाल उसकी होंठों पर जितनी बार आते रहे, मैडम डी. उतनी बार मुस्करा देती थी। कितनी देर के बाद उसने केवल यह कहा था—‘‘क्या नाम बताया था ? मिसिज़ गीता नाथ ? परन्तु इसमें कोई आपत्ति तो नहीं अगर मैं मिसिज़ नाथ की अपेक्षा तुम्हें मिस नाथ कहा करूँ ?’’
गीता हैरान हुई, पर हँस पड़ी—‘‘मेरे पति का नाम नरेन्द्र नाथ है। इसी कारण अपने आपको मिसिज़ नाथ कहती हूँ। आप लोग मुझे मिस नाथ कहेंगे तो आज जाकर उन्हें बताऊँगी कि अब मैं उनकी पत्नी के साथ-साथ उनकी बेटी हो गई हूँ।’’
मैडम डी. कुछ देर तक उसके मुँह की तरफ देखती रही, कुछ बोली नहीं, और जब गीता ने पूछा, ‘‘तनख्वाह कितनी होगी ?’’ तो उसने जवाब दिया था—‘‘पचास रुपए रोज़।’’

‘‘सच ?’’ कमरे के सोफे पर बैठी गीता—जैसे खुशी से दोहरी होकर मैडम डी. के पास घुटनों के बल बैठ गई थी।
‘‘देखो ! आज तुमने कोई अच्छे कपड़े नहीं पहने हैं ! मैं तुम्हें अपनी एक साड़ी उधार देती हूँ, तुम साथ वाले बाथरूम में हाथ धोकर वह साड़ी पहन लो।’’ मैडम डी. ने कहा, और गीता मन्त्रमुग्ध-सी उसके कहने पर जब कपड़े बदलकर आई तो मैडम डी. ने पचास रुपए उसके सामने रख दिए, ‘‘आज की तनख्वाह।’’
इस परी-कहानी जैसी नौकरी के जादू के प्रभाव से अभी गीता की आँखें मुँदी जैसी थीं कि मैडम डी. उसका हाथ पकड़कर उसे ऊपर की छत के उस कमरे में छोड़ आई, जहाँ परी-कहानी का एक राक्षस उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।
कमरे के दरवाज़े पर बार-बार दस्तक सुनी, तो पूजा ने इस तरह हाँफते हुए दरवाज़ा खोला जैसे वह तहखाने में से बहुत-सी सीढ़ियाँ चढ़कर बाहर आई हो।
‘‘रात की रानी—दिन में सो रही थी ?’’ दरवाज़े से अन्दर आते हुए शबनम ने हँसते-हँसते कहा, और पूजा के बिखरे हुए बालों की तरफ देखते हुए कहने लगी, ‘‘तेरी आँखों में तो अभी भी नींद भरी हुई है, राम के खसम ने क्या सारी रात जगाए रखा था ?’’

शबनम को बैठने के लिए कहते हुए पूजा ने ठण्डी साँस ली, ‘‘कभी-कभी जब रात का खसम नहीं मिलता, तो अपना दिल ही अपना खसम बन जाता है, वह कम्बख्त रात को जगाए रखता है...।’’
शबनम हँस पड़ी, और दीवान पर बैठते हुए कहने लगी, ‘‘पूजा दीदी ! दिल तो जाने कम्बख्त होता है या नहीं, आज का दिन ही ऐसा होता है, जो दिल को भी कम्बख्त बना देता है। देख, मैंने भी तो आज पीले कपड़े पहने हुए हैं और मन्दिर में आज पीले फूलों का प्रसाद चढ़ाकर आई हूँ...।’’
‘‘आज का दिन ? क्या मतलब ?’’ पूजा ने शबनम के पास दीवान पर बैठते हुए पूछा।
‘‘आज का दिन, बृहस्पतिवार का। तुझे पता नहीं ?’’
‘‘सिर्फ इतना पता है कि आज के दिन छुट्टी होती है’’—पूजा ने कहा। तो शबनम हँसने लगी—‘‘देख ले। हमारे सरकारी दफ्तर में भी छुट्टी होती है....।’’

‘‘मैं सोच रही थी कि हमारे धन्धे में इस बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है...’’
‘‘हमारे संस्कार’’ शबनम के होंठ पर एक बल खाकर हँसने जैसे हो गए। वह कहने लगी—‘‘औरत चाहे वेश्या भी बन जाए परन्तु उसके संस्कार नहीं मरते। यह दिन औरत के लिए पति का दिन होता है। पति व पुत्र के नाम पर वह व्रत भी रखती है, पूजा भी करती है—‘‘छः दिन धन्धा करके भी वह पति और पुत्र के लिए दुआ माँगती है...’’
पूजा की आँखों में पानी-सा भर आया—‘‘सच।’’ और वह धीरे से शबनम को कहने लगी—‘‘मैंने तो पति भी देखा है, पुत्र भी। तुमने तो कुछ भी नहीं देखा...’’
‘‘जब कुछ न देखा हो, तभी तो सपना देखने की जरूरत पड़ती है...’’ शबनम ने एक गहरी साँस ली, ‘‘इस धन्धे में आकर किसने पति देखा है...?’’ और कहने लगी—‘‘जिसे कभी मिल भी जाता है, वह भी चार दिन के बाद पति नहीं रहता, दलाल बन जाता है...तुझे याद नहीं, एक शैला होती थी...’’

‘‘शैला ?’’ पूजा को वह साँवली और बाँकी-सी लड़की याद हो आई, जो एक दिन अचानक हाथ में हाथी-दाँत का चूड़ा पहनकर और माँग में सिन्दूर भरकर, मैडम को अपनी शादी का तोहफा देने आई थी, और गेस्ट हाउस में लड्डू बाँट गई थी। उस दिन उसने बताया था कि उसका असली नाम कान्ता है।
शबनम कहने लगी—‘‘वही शैला, जिसका नाम कान्ता था। तुझे पता है उसका क्या हुआ ?’’
‘‘कोई उसका ग्राहक था, जिसने उसके साथ विवाह कर लिया था...’’
‘‘ऐसे पति विवाह के मन्त्रों को भी धोखा दे देते हैं। उससे शादी करके उसे बम्बई ले गया था, यहाँ दिल्ली में उसे बहुत-से लोग जानते होंगे, बम्बई में कोई नहीं जानता, इसलिए वहाँ वे नेक ज़िन्दगी शुरू करेंगे...’’
‘‘फिर ?’’ पूजा की साँस जैसे रुक-सी गई।
‘‘अब सुना है कि वहाँ बम्बई में वह आदमी उस ‘नेक ज़िन्दगी’ से बहुत पैसे कमाता है’’...

पूजा के माथे पर त्योरियाँ पड़ गईं, वह कहने लगी, ‘‘फिर तू मन्दिर में उस तरह का पति क्यों माँगने गई थी ?’’
शबनम चुप-सी हो गई, फिर कहने लगी, ‘‘नाम बदलने से कुछ नहीं होता। मैंने नाम तो शबनम रख लिया है, परन्तु अन्दर से वही शकुन्तला हूँ—जो बचपन में किसी दुष्यन्त का सपना देखती थी...अब ये समझ लिया है कि जैसे शकुन्तला की ज़िन्दगी में वह भी दिन आया था, जब दुष्यन्त उसे भूल गया था...मेरा यह जन्म उसी दिन जैसा है।’’
पूजा का हाथ अनायास ही शबनम के कन्धे पर चला गया और शबनम ने आँखें नीची कर लीं। कहने लगी—‘‘मैं जानती हूँ...इस जन्म में मेरा यह शाप उतर जाएगा।’’

पूजा का निचला होंठ जैसे दाँतो तले आकर कट गया। कहने लगी—‘‘तू हमेशा यह बृहस्पतिवार का वृत रखती है ?’’
‘‘हमेशा...आज के दिन नमक नहीं खाती, मन्दिर में गुण और चने का प्रसाद चढ़ाकर केवल वही खाती हूँ...बृहस्पति की कथा भी सुनती हूँ, जप का मन्त्र भी लिया हुआ है....और भी जो विधियाँ हैं...’’शबनम कह रही थी, जब पूजा ने प्यार से उसे अपनी बाँहों में ले लिया और पूछने लगी—‘‘और कौन-सी विधियाँ ?’’
शबनम हँस पड़ी, ‘‘यही कि आज के दिन कपड़े भी पीले ही रंग के होते हैं, उसी का दान देना और वही खाने....मन्त्र की माला जपने और वह भी सम में....इस माला के मोती दस, बारह या बीस की गिनती में होते हैं। ग्यारह, तेरह या इक्कीस की गिनती में नहीं—यानी जो गिनती—जोड़ी-जोड़ी से पूरी आए, उसका कोई मनका अकेला न रह जाए...’’
शबनम की आँखों में आँसू आने को थे कि वह ज़ोर से हँस पड़ी। कहने लगी, ‘‘इस जन्म में तो यह ज़िन्दगी का मनका अकेला रह गया है, पर शायद अगले जन्म में इसकी जोड़ी का मनका इसे मिल जाए...’’ और पूजा की ओर देखते हुए कहने लगी, ‘‘जिस तरह दुष्यन्त की अँगूठी दिखाकर शकुन्तला ने उसे याद कराया था—उसी तरह शायद अगले जन्म में मैं इस व्रत-नियम की अँगूठी दिखाकर उसे याद करा दूँगी कि मैं शकुन्तला हूँ...’’
 पूजा की आँखे डबडबा आई ..आज से पहले उसने किसी के सामने ऐसे आँखे नहीं भरी थी कहने लगी तू जो शाप उतार रही है  ,वह मैं चढ़ा रही हूँ ..मैंने इस जन्म में पति भी पाया ,पुत्र भी ..पर ..

सच तेरे  पति को बिलकुल मालुम नहीं ? शबनम से हैरानी से पूछा 
बिलकुल पता नहीं ..जब मैंने यह कहा था की मुझे दूतावास में काम मिल गया है तब बहुत डर गयी थी जब उसने दूतावास का नाम पूछा था उस समय एक बात सूझ गयी मैंने कहा की मुझे एक जगह बैठने का काम नहीं मिला है काम इनदरेक्ट है मुझे कई कम्पनियों में जाना पड़ता है उनसे इश्तिहार लाने होते हैं ...जिन में इतनी कमीशन मिल जाती है जो ऑफिस में बैठने में नहीं मिलती ..पूजा ने बताया और कहने लगी वह बहुत बीमार था इस लिए हमेशा डाक्टरों और दवाई की बाते होती रहती थी ...फिर डाकटर ने उसको सोलन भेज दिया हस्पताल में क्यों की घर में रहने से बच्चो को बीमार होने का खतरा रहता ..इस लिए अभी तक शक का कोई मौका नहीं मिला उसको ...
शबनम ने कहा की कई लड़कियों ने जिन्होंने घर में बताया हुआ है वह किसी एक्सपोर्ट कंपनी में काम करती है उनके घर वाले सब जानते हैं पर चुप रहते हैं ...
पूजा ने कहा अगर नरेंदर को पता चल जाये तो वह तो आत्महत्या कर लेगा वह जी नहीं पायेगा 
पर जब वह हस्पताल से वापस आएगा .और किसी दिन उसको कुछ पता चल गया तो .....शबनम की बात सुन कर  पूजा कहने लगी कुछ पैसा इक्कठा हो जाए तो दो तीन रिक्शा किराए पर दाल दूंगी पैसे आ जायेंगे 
शबनम ने यह सुन कर कहा की यह काम कोई आसान नहीं है वह दिन बीत गए जब यह मजदुर अपने मालिकों को कुछ कमा कर देते थे ..पूजा चिंता में डूब गयी ....तो शबनम ने कहा तुम्हे अगर यह धंधा छोड़ना भी है तो अभी इस साल मत सोचना यह १९८२ में सीजन का साल है शहर में ट्रेड फेयर लगने वाला है जितनी कमाई इस साल होगी उतनी पांच सालों में नहीं हो सकती है ...एक बार हाथ में पैसा इकट्ठा हो जाये ....
पूजा इस साल के पैसो की गिनती सी करने लगी ..जब मन्नू के जागने की आवाज़ आई तो वह जल्दी से दीवान से उठते हुए शबनम से बोली --तू जाना मत ,कुछ खा कर जाना .."और साथ ही हंस पड़ी ..तुम्हारे व्रत के खाने में नमक खाना मना है न , इसलिए किसी चीज में इस दुनिया का नमक नहीं डालूंगी ..."

Tuesday, August 30, 2011




ज़िन्दगी के उन अर्थों के नाम—
जो पेड़ों के पत्तों की तरह
चुपचाप उगते हैं और
झड़ जाते हैं !


सूरज रोज़ ढूंढता है
मुँह कहीं नहीं दिखता है
तेरा मुँह, जो रात को
इक़रार देता है
तड़प किसे कहते हैं,
तू यह नहीं जानती
किसी पर कोई अपनी
ज़िन्दगी क्यों निसार करता है
अपने दोनों जहाँ
कोई दाँव पर लगाता है
नामुराद हँसता है
और हार जाता है
अप्सरा ओ अप्सरा!
शहज़ाही ओ शहज़ादी!
इस तरह लाखों ख्याल
आयेंगे, चले जायेंगे




अमृता ने अपने जीवन के संदर्भ में लिखा हैः-

‘‘ ---इन वर्षो की राह में, दो बडी घटनायें हुई। एक- जिन्हें मेरे दुःख सुख से जन्म से ही संबंध था, मेरे माता पिता, उनके हाथों हुई। और दूसरी मेरे अपने हाथों । यह एक-मेरी चार वर्ष की आयु में मेरी सगाई के रूप में, और मेरी सोलह सत्तरह वर्ष की आयु में मेरे विवाह के रूप में थी। और दूसरी- जो मेरे अपने हाथों हुई- यह मेरी बीस-इक्कीस वर्ष की आयु में मेरी एक मुहब्बत की सूरत में थी।---’’
अपने विचारों को कागज पर उकेरने की प्रतिभा उनमें जन्मजात थी। मन की कोरें में आते विचारों को डायरी में लिखने से जुडे एक मजेदार किस्से को उन्होंने इस प्रकार लिखा हैः-
‘‘--पृष्ठभूमि याद है-तब छोटी थी, जब डायरी लिखती थी तो सदा ताले में रखती थीं। पर अलमारी के अन्दर खाने की उस चाभी को शायद ऐसे संभाल-संभालकर रखती थी कि उसकी संभाल किसी को निगाह में आ गयी ।(यह विवाह के बाद की बात है)। एक दिन मेरी चोरी से उस अलमारी का वह खाना खोला  गया और डायरी को पढा गया। और फिर मुझसे कई पंक्तियों की विस्तार पूर्ध व्याख्या मांगी गयी। उस दिन को भुगतकर मैंने वह डायरी फाड दी, और बाद में कभी डायरी न लिखने का अपने आपसे इकरार कर लिया।---’’
विख्यात शायर साहिर लुधियानवी से अमृता का प्यार तत्कालीन समालोचकों का पसंदीदा विषय था। साहिर के साथ अपने लगाव को उन्होंने बेबाकी से अपनी आत्मकथा में इस प्रकार व्यक्त किया है।

मेरे इस जिस्म में
तेरा साँस चलता रहा
धरती गवाही देगी
धुआं निकलता रहा
उमर की सिगरेट जल गयी
मेरे इश्के की महक
कुछ तेरी सान्सों में
कुछ हवा में मिल गयी,
‘‘ पर जिंदगी में तीन  समय ऐसे आए हैं-जब मैने अपने अन्दर की सिर्फ औरत को जी भर कर देखा है। उसका रूप इतना भरा पूरा था कि मेरे अन्दर के लेखक का अस्तित्व मेरे ध्यान से विस्मृत हो गया--दूसरी बार ऐसा ही समय मैने तब देखा जब एक दिन साहिर आया था तो उसे हल्का सा बुखार चढा हुआ था। उसके गले में दर्द था-- सांस खिंचा-खिंचा थां उस दिन उसके गले और छाती पर मैने ‘विक्स’ मली थी। कितनी ही देर मलती रही थी--और तब लगा था, इसी तरह पैरों पर खडे़ खडे़ पोरों से , उंगिलयों  से और हथेली से उसकी छाती को हौले हौले मलते हुये सारी उम्र गुजार सकती  हूं। मेरे अंदर की सिर्फ औरत को उस समय दुनिया के किसी कागज कलम की आवश्यकता नहीं थी।---
लाहौर में जब कभी साहिर मिलने के लिये आता था तो जैसे मेरी ही खामोशी से निकला हुआ खामोशी का एक टुकड़ा कुर्सी पर बैठता था और चला जाता था---वह चुपचाप सिगरेट पीता रहता था, कोई आधा सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नया सिगरेट सुलगा लेता था।और उसके जाने के बाद केवल सिगरेट के बड़े छोटे टुकडे़ कमरे में रह जाते थे। कभी --एक बार उसके हाथ छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी जो तय नहीं होती थी-- तब कल्पना की करामात का सहारा लिया था। उसके जाने के बाद, मै उसके छोडे हुये सिगरेट को संभाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक-एक टुकडे़ को अकेले जलाती थी, और जब उंगलियों के बीच पकड़ती थी तो बैठकर लगता था जैसे उसका हाथ छू रही हूं---- ’’
साहिर के प्रति उनके मन में प्रेम की अभिव्यक्ति उनकी अनेक रचनाओं में हुयी हैः-
‘‘---देश विभाजन से पहले तक मेरे पास एक चीज थी जिसे मैं संभाल -संभाल कर रखती थी। यह साहिर की नज्म ताजमहल थी जो उसने फ्रेम कराकर मुझे दी थी। पर देश के विभाजन के बाद जो मेरे पास धीरे धीरे जुडा है आज अपनी अलमारी का अन्दर का खाना टटोलने लगी हूं तो दबे हुए खजाने की भांति प्रतीत हो रहा है---
---एक पत्ता है जो मैं टॉलस्टाय की कब्र परसे लायी थी और एक कागज का गोल टुकडा है जिसके एक ओर छपा हुआ है’-एशियन राइटर्स कांफ्रेस और दूसरी ओर हाथ से लिखा हुआ है साहिर लुधियानवी यह कांफ्रेंस के समय का बैज है जो कांफ्रेस में सम्मिलित होने वाले प्रत्येक लेखक को मिला था। मैने अपने नाम का बैज अपने कोट पर लगाया हुआ था और साहिर ने अपने नाम का बैज अपने कोट पर । साहिर ने अपना बैज उतारकर मेरे कोट पर लगा दिया और मेरा बैज उतारकर अपने कोट पर लगा लिया और------’’


विभाजन का दर्द अमृता ने सिर्फ सुना ही नहीं देखा और भोगा भी था। इसी पृष्ठभूमि पर उन्होंने  अपना उपन्यास ‘पिंजर’ लिखा। 1947 में 3 जुलाई को अमृता ने एक बच्चे को जन्म दिया और उसके तुरंत बाद 14 अगस्त 1947 को विभाजन का मंजर भी देखा जिसके संदर्भ में उससे लिखा किः-
‘‘ दुखों की कहानियां कह- कहकर लोग थक गए थे, पर ये कहानियां उम्र से पहले खत्म होने वाली नहीं थीं। मैने लाशें देखीं थीं , लाशों जैसे लोग देखे थे, और जब लाहौर से आकर देहरादून में पनाह ली, तब ----एक ही दिन में सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक रिश्ते कांच के बर्तनों की भांति टूट गये थे और उनकी किरचें लोगों के पैरों में चुभी थी और मेरे माथे में भी ----- ’’
जीवन के उत्तरार्ध में अम्रता जी इमरोज के बहुत नजदीक रहीं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है........
‘‘मुझ पर उसकी पहली मुलाकात का असर- मेरे शरीर के ताप के रूप में हुआ था। मन में कुछ घिर आया, और तेज बुखार चढ़ गया। उस दिन- उस शाम उसने पहली बार अपने हाथ से मेरा माथा छुआ था- बहुत बुखार है? इन शब्दों के बाद उसके मुहं  से केवल एक ही वाक्य निकला था- आज एक दिन में मैं कई साल बडा हो गया हूं।
--कभी हैरान हो जाती हूं - इमरोज ने मुझे कैसा अपनाया है, उस दर्द के समेत जो उसकी अपनी खुशी का मुखालिफ हैं-- एक बार मैने हंसकर कहा था, ईमू ! अगर मुझे साहिर मिल जाता , तो फिर तू न मिलता- और वह मुझे , मुझसे भी आगे , अपनाकर कहने लगा:-मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज पढ़ते हुए ढूंढ लेता! सोचती हूं - क्या खुदा इस जैसे इन्सान से कहीं अलग होता है--’’
अमृता प्रीतम ने स्वयं अपनी रचनाओं में व्यक्त अधूरी प्यास के संदर्भ में लिखा है कि
‘‘गंगा जल  से लेकर वोडका तक यह सफरनामा है मेरी प्यास का।’’

अम्रता की रचनाओं में विभाजन का दर्द और मानवीय संवेदनाओं का सटीक चित्रण हुआ है। इनके संबंध में नेपाल के उपन्यासकार धूंसवां सायमी ने 1972 में लिखा थाः-
‘‘ मैं जब अम्रता प्रीतम की कोई रचना पढता हूं, तब मेरी भारत विरोधी भावनाऐं खत्म हो जाती हैं।’’
इनकी कविताओं के संकलन ‘धूप का टुकडा’ के हिंदी में अनुदित प्रकाशन पर कविवर सुमित्रानन्दन पन्त ने लिखा थाः-
‘‘अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर , प्रेम और सौन्दर्य की धूप छांव वीथि में विचरने के समान है इन कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव धनी, संस्कृत तथा शिल्प समृद्ध बनेगा--- ’’


मैं और कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
पर चेतना के धागे
कायनात के कण होते हैं
मैं उन कणों को चुनूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी

       अमृता के आज जन्मदिन पर विशेष यादें ...............इनको कितना भी दुहरा लो ...पर यह हमेशा कुछ नयी सी बात कहती लगती है